पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) के पर पौत्र इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के शुभ जन्म दिवस पर आपकी सेवा में हार्दिक बधाई पेश करते हैं। 

एक कथन के अनुसार 128 हिजरी क़मरी को ज़िलहिज की 20 तारीख़ को इमाम मूसा काज़िम (अ) का जन्म हुआ था।  आपका जन्म पवित्र नगरों मक्का और मदीना के बीच स्थित “आबवा” नामक एक गांव में हुआ था।  अपने पिता इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की शहादत के पश्चात जनता के ईश्वरीय मार्गदर्शन का दायित्व इमाम मूसा काज़िम के कांधों पर आ गया।  इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की इमामत का काल सन 148 हिजरी क़मरी से 183 हिजरी कमरी अर्थात 35 वर्ष का था।  उन्होंने अपना अधिकांश समय क़ैद में गुज़ारा।

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इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की विशेषताओं और उनके नैतिक गुणों के बारे में बहुत कुछ किताबों में मिलता है।  इब्ने तल्हा नामक एक वरिष्ठ सुन्नी धर्मगुरू इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के बारे में कहते हैं कि वे महान व्यक्तित्व के स्वामी थे।  वे अपने समय के महान उपासक थे।  इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम रातों को लंबे समय तक ईश्वर की उपासना करते और दिन में रोज़े रखा करते थे।  उनके साथ यदि कोई बुराई करता तो उसका बदला वे भलाई से देते।  जो उनपर अत्याचार करता उसे वे क्षमा कर दिया करते थे।  इमाम काज़िम इसलिए धैर्य एवं संयम से काम लेते थे क्योंकि उनकी दृष्टि में मानवीय एवं नैतिक गुणों के प्रचार को हर वस्तु पर वरीयता प्राप्त थी। उनका विश्वास था कि लोगों के साथ दोस्ती और भाईचारा जीवन को सुंदर और आकर्षक बनाता है, संबंधों को मज़बूत करता है, हृदयों को आशान्वित करता है और समाज में सौहार्दपूर्ण वातावरण उत्पन्न करता है। आपकी दृष्टि में लोगों के साथ भलाई और दोस्ती मानवता की पहचान है।  वे अपने क्रोध को नियंत्रित रखते इसीलिए उन्हें काज़िम अर्थात क्रोध को पी जाने वाला कहते थे।  अधिक इबादत करने के कारण इमाम मूसा काज़िम को “अब्दे सालेह” के नाम से भी पुकारा जाता था।  इराक में वे बाबुल हवाएज के नाम से भी याद किये जाते हैं।

यहां पर पैग़म्बरे इस्लाम के मश्हूर कथन का उल्लेख करते हैं जिसे हदीसे सक़लैन के नाम से जाना जाता है।  सक़लैन नाम से प्रसिद्ध हदीस में पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपने पवित्र परिजनों को क़ुरआन के बराबर बताया है।  उन्होंने मुसलमानों का आह्वान किया है कि जबतक वे इन दोनों से जुड़े रहेंगे तबतक वे गुमराह नहीं होंगे और यह दोनों भी कभी एक दूसरे से अलग नहीं होंगे।  हदीसे सक़लैन का उल्लेख करते हुए पैग़म्बरे इस्लाम कहते हैं कि मैं अपने पीछे तुम्हारे बीच दो मूल्यवान चीज़ें छोड़े जा रहा हूं।  एक ईश्वर की किताब दूसरे मेरे परिजन।  पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं कि जबतक तुम इन दोनों को पकड़े रहोगे कभी भी गुमराह नहीं होगे यहां तक कि इन्ही के माध्यम से तुम मुझतक स्वर्ग में आओगे।  हम इस पवित्र दिन इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के माध्यम से ईश्वर से दुआ करते हैं।  पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों और पवित्र क़ुरआन से जुड़े रहने का अर्थ होता है पवित्र क़ुरआन की शिक्षाओं को व्यवहारिक बनाना और पवित्र परिजनों अनुसरण करना।

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राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का जीवन काल बहुत कठिन था। उनके काल में बनी अब्बास के कई अत्याचारी शासक गुज़रे। उस समय इन अत्याचारी शासकों ने लोगों की हत्या करके बहुत से जनआंदोलनों का दमन कर दिया था। दूसरी ओर इन्हीं अत्याचारी शासकों के काल में जिन क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की गई वहां से मिलने वाली धन-सम्पत्ति इन शासकों की शक्ति में वृद्धि का कारण बन रही थी।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की इमामत अर्थात जनता के मार्गदर्शन के ईश्वरीय दायित्व का काल बहुत उतार-चढ़ाव भरा रहा।  उनके काल में अब्बासी शासकों की सत्ता अपने चरम पर थी। अब्बासी शासक हारून रशीद जैसे व्यक्ति ने विदित में धार्मिक मुखौटे के साथ अपनी धूर्ततापूर्ण एवं कुटिल चालों के माध्यम से अपनी ग़लत नीतियों को जारी रखने और अपने अत्याचारों को और विस्तृत करने के प्रयास किये। अब्बासी शासकों ने विदित में अपने धार्मिक मुखौटे एवं नारों के साथ सत्ता की बागडोर हाथ में ले ली परंतु लोगों पर अत्याचार करके और इस्लामी शिक्षाओं व आदेशों को परिवर्तित करके अपने दावों के बिल्कुल विपरीत कार्य किया।  उनका पूरा प्रयास था कि वे  स्वयं को पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके पवित्र परिजनों का प्रेमी दर्शायें परंतु व्यवहारिक रूप में उन्होंने इसके बिल्कुल ही विपरीत किया।  इन शासकों ने पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के साथ बहुत अत्याचार किया।

वह काल कि जब शासकों का अत्याचार अपने चरम पर था, इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम शासकों के अत्याचारों पर ख़ामोश नहीं रहे बल्कि उनका विरोध करते रहते थे।  यही कारण था कि तत्कालीन शासकों ने इमाम मूसा काज़िम (अ) का विरोध तेज़ कर दिया। वे इमाम की हर गतिविधि पर नज़र रखने लगे।  इमाम तथा जनता के बीच दूरी बढ़ती गई।  इसके बावजूद इमाम लोगों का दूर से मार्गदर्शन करते रहे।  उन्हें जेल में डाल दिया गया।  इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने जेल से हारून को जो ख़त लिखा था उसका एक भाग यह है कि हे हारून, मेरी ऊपर कठिनाइयों का जो एक दिन गुज़रता है वह तेरे लिए खुशी का दिन होता है लेकिन एक दिन वह भी आएगा  कि जब हमसब एक स्थान पर एकत्रित होंगे।  वह स्थान जहां पर नुक़सान का पता पलेगा।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के काल के एक शासक का नाम हारून रशीद था। हारून रशीद जिस भूभाग पर शासन करता था वह बहुत ही विस्तृत था।  हारून रशीद के शासन के विस्तार का अनुमान उसी के एक कथन से लगाया जा सकता है।  हारून रशीद एक अंहकारी शासक था।  वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानता था।  हारून को अपने विशाल शासन पर बहुत घमंड था।  वह बादलों को संबोधित करते हुए कहता था कि हे बादलों बरसो, क्योंकि जहां भी तुम्हारी बारिश की बूंदे गिरेंगी, चाहे वह पूरब हो या पश्चिम, वे सब मेरे ही शासन के भूभाग में गिरेंगी और उस भूमि का लगान मेरे ही पास लाया जायेगा। इतना सब होने के बावजूद हारून का शासन केवल लोगों पर था उनके मन पर नहीं।  एक बार की बात है कि इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम काबे के किनारे बैठे हुए थे।  उस जगह से जब हारून का गुज़र हुआ तो उसने इमाम को संबोधित करते हुए कहा कि तुमही वह हो जिसकी बैअत लोग छिपकर करते हैं।  हारून के जवाब में इमाम मूसा काज़िम ने कहा कि हां।  हम वह है जिनकी हुकूमत लोगों के दिलों पर है और तू वह है जो केवल लोगों के शरीर पर हुकूमत करता है।

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इमाम मूसा काज़िम को लोगों के बीच भारी लोकप्रियता प्राप्त थी।  तत्कालीन समाज के हर वर्ग के लोग उनको पसंद करते थे।  लोग उनसे मिलने के लिए व्याकुल रहा करते थे।  क्योंकि वे पैग़म्बरे इस्लाम के वंशज थे इसलिए समाज में उनका बहुत मान-सम्मान था।  समाज में इमाम मूसा काज़िम के प्रभाव का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि हारून के दरबार के कुछ लोग छिपकर उनसे मिला करते थे।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने अत्याचारी अब्बासी शासन के साथ हर प्रकार के सहयोग पर प्रतिबंध लगा रखा था इसलिए कि इससे अत्याचारियों के आधार सुदृढ़ होते थे परन्तु कुछ ऐसे आसाधारण अवसर भी थे कि जब इमाम ने अपने साथियों द्वारा सरकारी पदों पर आसीन होने का विरोध नहीं किया। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने अपने योग्य एवं प्रतिभाशाली साथियों को प्रशिक्षण दिया था कि वे प्रशासनिक अधिकारियों पर सकारात्मक प्रभाव डालें।  इस प्रकार इमाम, ईश्वरीय उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में उनकी उपस्थिति से लाभ उठाते थे। हारून के शासन में एक अधिकारी थे अली बिन यक़तीन।  वे इमाम मूसा काज़िम के साथियों में से एक थे।  ईश्वर की कृपा, इमाम अलैहिस्सलाम के मार्गदर्शन और अपनी समझदारी से यक़तीन ने इमाम के ईश्वरीय उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु महत्वपूर्ण योगदान दिया।

एक दिन अली बिन यक़तीन अपने स्वामी इमाम मूसा काज़िम के पास आये और उन्होंने शासन के साथ सहयोग बंद करने की इच्छा प्रकट की।  उनकी इस बात पर इमाम काज़िम ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी।  इमाम मूसा काज़िम ने कहा कि शासक के दरबार में तुम्हारी उपस्थिति से तुम्हारे धार्मिक भाईयों को आसानी है। आशा है कि ईश्वर तुम्हारे माध्यम से लोगों की समस्याओं का निवारण करेगा तथा शत्रुओं के षडयंत्रों पर पानी फेर देगा।  हे अली बिन यक़तीन! जान लो कि अत्याचारियों के दरबार में सेवा का प्रायश्चित यह है कि पीड़ितों को उनके अधिकार दिलवाए जाएं।  तुम वचन दो कि जब कभी भी धर्म में निष्ठा रखने वाला कोई व्यक्ति तुम्हारे पास आए तो उसकी आवश्यकता को पूरा , उसके अधिकार को स्वीकार तथा उसका सम्मान करेगे। जान लो कि जो भी पीड़ित का अधिकार उसे दिलाता है और उसके मन को शान्ति पहुंचाता है तो वह सबसे पहले ईश्वर को, फिर पैग़म्बरे इस्लाम को और उसके बाद हमें प्रसन्न करता है।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के शुभ जन्म दिवस के अवसर पर पुनः आपकी सेवा में बधाई प्रस्तुत करते हुए उनका एक कथन पेश करते हैं।  इमाम कहते हैं कि ईश्वर के धर्म को गहराई से समझने का प्रयास करो क्योंकि सही ढंग से समझकर ही मनुष्य ईश्वर की सही उपासना कर सकता है और लोक- परलोक में उच्य स्थान प्राप्त करेगा।

 

 

 

 

Sep ११, २०१७ १५:१६ Asia/Kolkata
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