मुहर्रम का महीना, दुख, दर्द और पीड़ा की याद दिलाता है।

यह महीना याद दिलाता है कि अत्याचारी शासक यज़ीद ने पैग़म्बरे इस्लाम के नाती और उनके परिजनों व साथियों को तीन दिन का भूख प्यास इसी महीने में शहीद कर दिया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी शहादत से जीवन से अंधकार को मिटाते अत्याचार का चिराग़ बुझा दिया। उन्होंने करबला की तपती रेत पर कलमये ला इलाहा इलल्लाह लिख दिया। ईश्वर पवित्र क़ुरआन में यह सवाल करते हुए कि क्या ईश्वर के मार्ग में जेहाद करने वाले और घर में चैन से बैठे लोग बराबर हैं? ईश्वर के मार्ग में जेहाद के महत्व को उजागर करता है। वह स्वयं कहता है कि इस प्रकार कदापि नहीं है। सूरए निसा की आयत संख्या 95 में ईश्वर कहता है कि ईश्वर ने अपनी जान व माल से जेहाद करने वालों को बैठे रहने वालों पर विशिष्टता दी है और हर एक से नेकी का वादा किया है। उसने मुजाहिद को बैठे रहने वालों के मुक़ाबले में बड़ा पारितोषिक दिया है।

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मुजाहिद वह होता है जो अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध उठ खड़ा हो और अत्याचार तथा अत्याचारियों के सामने डट जाता है क्योंकि अत्याचार पर चुप्पी तथा अत्याचारियों से सांठगांठ का अर्थ अत्याचारियों के साथ अत्याचार में साथ देने जैसा है। पवित्र क़ुरआन में लगभग 290 आयतों में अत्याचार के विषय पर प्रकाश डाला गया है, इसमें बयान किया गया है कि और होशियार हो जाओ तुम लोग अत्याचारियों की ओर झुकाव पैदा न करना कि नरक की आग तुम्हें छू लेगी और ईश्वर के अतिरिक्त तुम्हारा कोई अभिभावक नहीं होगा और तुम्हारी सहायता भी नहीं की जाएगी।

जब यज़ीद धर्म में अपनी मनमानी करता रहा और उसने समस्त बाधाओं व सीमाओं को तार तार कर दिया और मानवीय व इस्लामी मूल्य बदल गये तब उपदेशों और अच्छी बातों का कोई प्रभाव नहीं रह गया था। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यह जानते हुए कि सशस्त्र दुश्मन पर विदित विजय संभव नहीं है इसीलिए उन्होंने आंदोलन का बिगुल बजा दिया। उन्होंने शहादत का चयन करके वह महान कार्य किया जिससे हमेशा के लिए वे अमर हो गये। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम एक बयान में कहते हैं कि कितने आश्चर्य की बात यह है कि मुझे दो चीज़ों के बीच में एक के चयन पर विवश कर दिया गया है, मौत और अपमान अर्थात घुटने टेकना, ईश्वर की सौगंध मैं अपमान और बेइज़्ज़ती की कभी भी स्वीकार नहीं करूंगा। मेरी पवित्रता, मेरे परिवार की सज्जनता और शुद्धता, मेरा साहस और मेरी प्रतिष्ठा हमको इस बात की कदापि अनुमति नहीं देगी कि बेइज्ज़ती का अनुसरण करने को मैं इज़्ज़त की मौत पर प्राथमिकता दूं।

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इसी तर्क के साथ शहीद भोर की पहली किरण की भांति आसमान में चमकता है और सुबह का संदेश देता है। ईश्वर शुभ सूचना देता है कि शहीद की शहादत निश्चित रूप से उसके जीवन से बहुत अधिक प्रभावी और मूल्यवान होती है। ईश्वर कहता है कि जो व्यक्ति ईश्वर के मार्ग में मारा जाए और शहीद हो, उसको मुर्दा न समझो, वह जीवित और अमर है किन्तु तुम इसकी सच्चाई नहीं जानते।

बुद्धिजीवियों ने शहीद को इतिहास के दिल की भांति बताया है। जिस प्रकार से दिल सूखी हुई रगों को ख़ून और जीवन प्रदान करता है, वह समाज भी जो अपनी गतिविधियों और जीवन से रुका रहता है, शहीदों के ख़ून से तरोताज़ा और प्रफुल्लित हो जाता है। शहादत का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि वह एक पीढ़ी को आत्म विश्वास और ईमान प्रदान करता है, शहादत को बलिदान का परिपूर्ण प्रदर्शन कहा जाता है। शहीद के व्यवहार में इसी बलिदान और जागरूकता की वजह से उसका स्थान ऊंचा और श्रेष्ठ होता है। शहीदों और बलिदानियों की उपस्थिति न केवल उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की पूरिपूर्णता का कारण बनता है बल्कि इसके दूसरों पर सार्थक प्रभाव भी पड़ते हैं। इसके कारण समाज और समाज के लोगों में मूल परिवर्तन पैदा होते हैं। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का पवित्र ख़ून, जीवन प्रदान करने वाला एक स्रोत है जो समय बीतने के साथ राष्ट्रों की रगों में जारी होता है और उनको जीवन की विभूति से ओतप्रोत करता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अमर हैं। प्रतिवर्ष व पूरी शक्ति और वैभव के साथ लोगों को अपने समय के सत्य के मोर्चे की सहायता करने का अह्वान करते हैं।

आशूर के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने करबला के मैदान में ऐसी हृदय विदारक घटनाएं देखी कि उनको बयान करने से क़लम अक्षम है। उस दिन दानवता और हैवानियत अपने चरम पर पहुंच गयी थी। इमाम हुसैन और उनके साथियों के लिए पानी बंद कर दिया गया। इब्ने ज़ियाद के सिपाहियों में से एक हुरमुला ने करबला के मरुस्थल में इमाम हुसैन के छह महीने के दूध पीते बच्चे को तीन दिन का भूखा और प्यास तीन मुंह वाले तीर से शहीद कर दिया करबला में हज़रत इमाम हुसैन का 18 साल का वह जवान बेटा मारा गया, जो शक्ल व सूरत और बात चीत करने में पैग़म्बरे इस्लाम की भांति था। इब्ने ज़ियाद के सिपाहियों ने हज़रत अली अकबर के सीने पर भाला मारा। भाले का टुकड़ा सीने में टूट गया, बेटा ज़मीन पर एड़िया रगड़ रहा था। वह आवाज़ दे रहा था कि बाबा मेरी मदद कीजिए, जवान बेटे की आवाज़ सुनकर बूढ़े इमाम हुसैन गिरते पड़ते किसी तरह रणक्षेत्र में पहुंचे और कहा बेटा कोई अंतिम इच्छा ही तो कहो इसपर उन्होंने कहा बाबा मेरे सीने में भाला लगा हुआ है आप उसे निकाल दिजिए, इमाम हुसैन ने आस्तीन को उपर चढ़ाया और बिसमिल्लाह कह कर जैसे ही भाला निकाला भाले के साथ कलेजा निकल आया, इमाम हुसैन ने आसमान की ओर देखकर कहा कि मेरे बेटे तेरे बाद अब जीना कैसा।

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यज़ीद के सैनिकों ने इसी को काफ़ी नहीं समझा, उन्होंने इमाम हुसैन के भाई हज़रत अब्बास के दोनों हाथ काट दिए और उनकी आंख में ज़हर से भरा तीर मारा। यज़ीदी सैनिकों ने इमाम हुसैन और उनके साथियों व परिजनों को शहीद करने को ही पर्याप्त नहीं समझा बल्कि उनके शवों पर घोड़े दौड़ा दिए और उनके ख़मों को आग लगा दी। बच्चों और बच्चियों को कोड़े मारे और बच्चियों के कानों से बुंदे छीन लिए। करबला के मैदान में इब्ने ज़ियाद के सैनिकों ने वह कौन से अपराध किए। इमाम हुसैन ने देखा कि उनके साथी पूरी उत्सुकता के साथ आगे बढ़ बढ़कर अपनी जानों को न्योछावर कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि मुझपर जो भी कठिनाइयां और मुसिबतें पड़ीं, क्योंकि यह सब ईश्वर की नज़रों के सामने हैं।

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन को 1400 वर्ष का समय बीत रहा है, जैसे लग रहा है कि वह दौर फिर से लौट आया है। अत्याचारी हमले कर रह हैं और सभी लोगों को घुटने टेकने और नत्मस्तक होने को कहते हैं। आज यमन, सीरिया, इराक, फ़िलिस्तीन और म्यांमार में जो कुछ हो रहा है, वह यज़ीदी दौर की याद दिला रहा है। तकफ़ीरी आतंकवादी लोगों के गले काट रहे हैं, लोगों को ज़िंदा जला रहे हैं, म्यांमार में महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा है, ज़िदा बच्चों को जलते हुए घर में डाल दिया जा रहा है, तकफ़ीरी आतंकवादी निहत्थे लोगों को गोलियों से भून रहे हैं, पवित्र रौज़ों की रक्षा करने वालों पर हमले करते हैं, सऊदी अरब के पाश्विक हमले में एक दूध पीता यमनी बच्चा अपने बाप की गोद में दम तोड़ जाता है, सीरिया और इराक़ में दाइश दर्जनों लोगों के सिर काट देते हैं, रोहिंग्या मुसलमानों को ज़िंदा आग के हवाले किया जा रहा है।

जी हां, करबला के मैदान में अत्याचार अपने चरम पर था किन्तु यह अत्याचार वहीं समाप्त नहीं हुआ बल्कि जारी रहा। कुछ वर्ष पहले ही सद्दाम ने आधुनिक हथियारों से लैस होकर ईरान की नई क्रांति को तबाह करने के लिए हमला कर दिया। सद्दाम को पूरी दुनिया का समर्थन प्राप्त था किन्तु उसे जनता के भीषण प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, लाखों की संख्या में महिलाओं और युवाओं ने रणक्षेत्र की ओर रुख किया जिससे सद्दाम के हाथों के तोते उड़ गये। ईरानी युवा और महिलाएं या हसैन और या फ़ातेमा के नारे से सद्दाम के अतिक्रमणकारी सैनिकों के सामने डट गये। क्रोध में आकर सद्दाम ने व्यापक स्तर पर 3500 से अधिक बार रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया। सद्दाम की इस पाश्विक कार्यवाही में हज़ारों लोग हताहत हो गये।

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ईरान के विरुद्ध इराक़ द्वारा थोपा गया युद्ध आठ साल तक जारी रहा शहीदों के ख़ून और उनके बलिदान के कारण इस्लामी क्रांति आज अपने पैरों पर खड़ी है बल्कि यह क्रांति दुनिया के अन्य देशों के लिए आदर्श में परिवर्तित हो चुकी है।

नवीं मुहर्रम की रात युद्ध के मोर्चे पर एक जवान ज़ियारते आशूरा पढ़ रहा था। जैसे ही वह इस वाक्य पर पहुंच कि ए काश हम भी आप के साथ करबला के मैदान में होते तो आपके साथ हम भी कामयाब होते, प्रसिद्ध संघर्षकर्ता डाक्टर चमरान की आंखों से तेज़ आंसू जारी हो गये वह युद्ध के मोर्चे के बाहर से, धीरे से उठे और आसमान की ओर हाथ उठाकर इमाम हुसैन से अपने दिल की बातें करने लगे, हे मेरे सरदार, हे इमाम हुसैन हम करबला के मैदान में नहीं थे ताकि आप की सेना में शामिल होकर यज़ीदी सेना से युद्ध करते, आज हम उसी नारे और उम्मीद के साथ ख़ोज़िस्तान पहुंच गये, आशा है कि यहां मेरी दिल की कामना पूरी होगी, मैं शहीद होउंगा, क्या यह हो सकता कि जैसे करबला के मैदान में हर शहीद के पास आप पहुंचे, उनको चूमा और उनको विदा दी, जब मैं शहीद हूं तो आप मेरे शव के पास भी पहुंचें और अपना हाथ मेरे सीने पर रखें और मुझे अपने हाथों से तृप्त करें।

 

Sep २७, २०१७ १३:१८ Asia/Kolkata
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