ईरान की इस्लामी क्रान्ति के इतिहास में एक अमर दिन 13 आबान बराबर चार नवंबर है।

इस दिन अलग अलग वर्षों में तीन बड़ी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं घटीं। इन तीनों घटनाओं में अमरीका की संलिप्तता ही इन घटनाओं का मुख्य बिन्दु है। यही कारण है कि ईरान की इस्लामी क्रान्ति व इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था में 13 आबान को साम्राज्य से संघर्ष का राष्ट्रीय दिवस घोषित किया गया है। इन तीनों घटनाओं में अमरीका के मुक़ाबले में ईरानी जनता की जागरुकता व सूझबूझ ध्यान योग्य है। 4 नवंबर 1964 को स्वर्गिय इमाम ख़ुमैनी को तुर्की देशनिकाला, दिया गया  4 नवंबर 1978 को तेहरान में क्रान्तिकारी छात्रों का जनसंहार किया गया और 4 नवंबर 1979 को तेहरान में क्रांतिकारी मुसलमान छात्रों द्वारा जासूसी का पर्याय बन चुके अमरीकी दूतावास पर नियंत्रण, कर लिया गया । यह तीनों घटनाएं ईरान की इस्लामी क्रान्ति व व्यवस्था के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया व इसकी सफलता व सुदृढ़ता में बहुत महत्वपूर्ण व प्रभावी हैं।

 

 ईरान की इस्लामी क्रान्ति  के आंदोलन  के दो आयाम थे एक आंतरिक अत्याचारी व्यवस्था का मुक़ाबला, दूसरे इस व्यवस्था का साथ दे रहे विदेशी साम्राज्य से संघर्ष था। इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने अपने आन्दोलन के आरंभ से ही समानांतर रूप में शाही व्यवस्था की अत्याचारपूर्ण नीतियों व अमरीकी साम्राज्य की ओर से जनता को जागरुक बनाने को अपने कार्यक्रम में सर्वोपरि रखा। साम्राज्य के सीधे हस्तक्षेप की नीति के युग की समाप्ति के पश्चात साम्राज्यवादी सरकारों ने अप्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप या दूसरे शब्दों में नए साम्राज्य का रूप धारण कर लिया। प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात सभी अतिग्रहित देश स्वाधीन हो गए किन्तु खेद की बात यह है कि इन देशों में से अधिकांश देशों में अत्याचारी सत्ता में पहुंचे या क्रान्तिकारी नेताओं ने सत्ता में बाक़ी रहने के लिए अत्याचारपूर्ण शैलियां अपनाईं और साम्राज्यवादी शक्तियों का समर्थन प्राप्त किया। कुछ देशों में अत्याचारी व विदेशों के पिट्ठु शासकों के विरुद्ध क्रान्तियां आयीं किन्तु पूर्णतः सफल नहीं रहीं। क्रान्तिकारी एक साम्राज्यवादी सरकार के चंगुल से निकलने के लिए एक ऐसी सरकार के अधीन हो जाते थे जिसे साम्राज्यवादी शक्तियों का समर्थन प्राप्त होता था। यह मामला साठ, सत्तर और अस्सी के दशकों की अधिकांश क्रान्तियों में दिखाई देता है।

 

 

ईरान की इस्लामी क्रान्ति एकमात्र ऐसी क्रान्ति थी जो न पूरब न पश्चिम के नारे के साथ सफल हुई। क्रान्ति की इस मुख्य विशेषता का श्रेय इमाम ख़ुमैनी के उस दिशा निर्देश व मार्गदर्शन को जाता है जिसे उन्होंने साठ के दशक के आरंभ में इस्लामी क्रान्ति के लिए अपनाया था। उन दिनों अमरीका ईरान पर अपने वर्चस्व को सुदृढ़ करने के लिए ईरान में कैपिच्यूलेशन नामक क़ानून को व्यवहारिक बनाने के प्रयास में था। इस क़ानून के आधार पर ईरान में सभी अमरीकी सलाहकारों को न्यायिक कार्यवाही से मुक्ति मिल जाती थी और ईरानी न्यायालयों के पास उनके अपराधों के विरुद्ध कार्यवाही का कोई अधिकार नहीं था। इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह इस साम्राज्यवादी क़ानून के विरुद्ध जनता को जागरुक बनाने के लिए उठ खड़े हुए। उन्होंने अपने भाषणों में कैपिच्यूलेशन क़ानून का कड़ाई से विरोध किया। इमाम ख़ुमैनी की लोकप्रियता व उन्हें प्राप्त जनसमर्थन के दृष्टिगत शाह, इमाम ख़ुमैनी के जागरुकता भरे भाषणों से ख़तरे का आभास करता था। ईरानी राष्ट्र के हितों के विरुद्ध नीतियों व शाही शासन के अमरीका के समक्ष नत्समस्तक होने का कड़ाई से विरोध करने के कारण इमाम ख़ुमैनी को 4 नवंबर 1964 को तुर्की देशनिकाला दे दिया गया।

 

 

 शाह के दमनकारी शासन के दबावों के बावजूद, इमाम ख़ुमैनी के तुर्की का विरोध तेहरान के सबसे बड़े बाज़ार में हड़ताल, धार्मिक केन्द्रों व मदरसों में हड़ताल के रूप में लंबे समय तक छुट्टी, और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को तूमार अर्थात चिटठे व पत्र भेजने के रूप में प्रकट हुया। अंततः इमाम ख़ुमैनी तुर्की और फिर इराक़ के नजफ़ नगर में 15 वर्ष देशनिकाले का जीवन बिताने के पश्चात 1 फ़रवरी 1979 को ईरान लौटे और अपने राष्ट्र के बीच उनकी उपस्थिति के केवल दस दिनों के पश्चात ईरानी जनता की इस्लामी क्रान्ति सफल हो गयी।

 

दूसरी घटनाः तेहरान विश्वविद्यालय के सामने क्रान्तिकारी छात्रों के जनसंहार की है। वर्ष 1978 की पतझड़ ऋतु ईरान में जनता के क्रान्तिकारी संघर्ष का चरम बिन्दु थी। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत हज़ारों की संख्या में तेहरान के हाई स्कूल व इंटर के छात्र 4 नवंबर 1978 को तेहरान विश्वविद्यालय के बाहर इकट्ठा हुए और शाही शासन क विरुद्ध प्रदर्शन किया। शाह के विशेष सुरक्षा गार्डों ने छात्रों की अपार भीड़ को तेहरान विश्वविद्यालय के बाहर गोलियों का निशाना बनाया। उस दिन विश्वविद्यालय के द्वार बंद थे और छात्रों के पास शाह के पिट्ठु गार्डों की निरंतर फ़ायरिंग से बचने का कोई मार्ग नहीं था। परिणाम स्वरूप उस दिन बड़ी संख्या में छात्र शहीद व घायल हुए।

 

 अमरीका, जो मानवाधिकारों के रक्षक होने का सदैव दावा करता है और हर वर्ष इस देश के विदेश मंत्रालय की ओर से मानवाधिकार के उल्लंघनकर्ताओं की सूचि प्रकाशित की जाती है, तेहरान में छात्रों के जनसंहार की घटना पर मौन धारण किए रहा। ईरान की इस्लामी क्रान्ति के बारे में विशेष रूप में पश्चिम में प्रकाशित किताबों व दस्तावेज़ों में स्पष्ट रूप से इस तथ्य का उल्लेख मिलता है कि तेहरान में छात्रों के जनसंहार के पश्चात तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के सुरक्षा सलाहकार ज़िबिगिनो बर्जेन्सकी ने शाह से टेलीफ़ोन द्वारा संपर्क में उससे ईरानी जनता का और कड़ाई से दमन करने के लिए कहा और शाह को अमरीका के समर्थन का आश्वासन दिलाया। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि ईरानी जनता व इस्लामी क्रान्ति की व्यवस्था से अमरीका की शत्रुता इस्लामी क्रान्ति की सफलता के पहले से जारी है।

 

4 नवंबर को ईरान की इस्लामी क्रान्ति के इतिहास में तीसरी महत्वपूर्ण घटना तेहरान में अमरीकी दुतावास या अमरीका के जासूसी के अड्डे पर १९७९ में नियंत्रण है। शाह के शासनकाल में तेहरान में अमरीकी दूतावास, एक दूतावास के दायरे से हट कर गतिविधियां कर रहा था और यह व्यवहारिक रूप से यह विभिन्न क्षेत्रों में अमरीकी सरकार व तत्कालीन ईरानी शासन की नीतियों का संयोजन केन्द्र बना हुआ था। इस्लामी क्रान्ति की सफलता के पश्चात अमरीकी दूतावास पूर्व शाही शासन के बचे खुचे तत्वों, व बिके हुए क्रान्ति के विरोधियों के साथ इस्लामी क्रान्ति के विरुद्ध षड्यंत्र के दिशानिर्देशन का केन्द्र बन चुका था।

 

फ़रवरी 1979 में इस्लामी क्रान्ति की सफलता के समय से उसी वर्ष 4 नवंबर 1979 को तेहरान में अमरीकी दूतावास पर नियंत्रण की घटना तक इस दूतावास में नियुक्त अमरीकी कूटनयिकों ने नव स्थापित इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को क्षति पहुंचाने के लिए एक क्षण भी संकोच से काम नहीं लिया। क्रान्ति विरोधी गुटों के सरग़नाओं से संपर्क, ईरान के भीतर व्यवस्था को गिराने व विद्रोह के नेटवर्कों से संबंध और दक्षिणी व पश्चिमी ईरान में तेल पाइप लाइनों में विस्फोट और अशांति व अस्थिरता में लिप्त आतंकवादी गुटों को वित्तीय सहायता, जैसे कार्य तेहरान में अमरीकी के दिखावटी दूतावास में नियुक्त लोगों की गतिविधियां थीं। यही कारण था कि 4 नवंबर 1979 को इमाम ख़ुमैनी का अनुसरण करने वाले छात्रों ने अमरीका के जासूसी के अड्डे पर नियंत्रण कर लिया। जासूसी के इस अड्डे पर नियंत्रण के साथ ही ईरान में अमरीकी हस्तक्षेप व वर्चस्व सदैव के लिए समाप्त हो गया। इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने तेहरान अमरीका के जासूसी के अड्डे पर नियंत्रण की घटना का समर्थन किया और इसे दूसरी क्रान्ति का नाम दिया। वास्तव में विश्व के अधिकांश देशों में अमरीकी दूतावास जासूसी की भूमिका निभाते हैं।

 

कुछ वर्षों पूर्व मध्यपूर्व में आरंभ हुई तेज़ परिवर्तनों की प्रक्रिया और इस क्षेत्र में इस्लामी क्रान्ति की लहर के दृष्टिगत अमरीकी सरकार कूटनैतिक हथकंडों द्वारा कि जिसका महत्वपूर्ण अंग इन देशों में उसके दूतावास हैं, इन देशों के परिवर्तनों को अपनी ओर मोड़ने का प्रयास किया मिस्र, ट्यूनीशिया, बहरैन और यमन में जनक्रान्ति के दौरान अमरीकी दूतावास बहुत अधिक सक्रिय  रहे।

 

क्षेत्र में पहले के आंदोलनों व हालिया आंदोलनों के बीच एक मूलभूत अंतर यह भी है कि आम जनता अमरीकी सरकार की वर्चस्ववादी नीतियों की ओर से अब जागरुक हो चुकी है। इसी जागरुकता के कारण अमरीकी सरकार अपने समस्त कूटनैतिक व प्रचारिक हथकंडों को प्रयोग करने के बावजूद इस्लामी क्रान्ति के मार्ग में कोई रुकावट नहीं खड़ी कर सकी और अपनी समर्थित अत्याचारी व्यवस्थाओं में जारी क्रान्ति के मार्ग को अपने हितों की ओर नहीं मोड़ सकी।

 

चार नवंबर की तीनों घटनाओं में ईरानी जनता ने यह दर्शा दिया है कि वह इमाम ख़ुमैनी के मार्गदर्शन से शत्रु को पहचानने की क्षमता में सक्षम है कि जो इस्लामी जागरुकता का आवश्यक तत्व है इसी प्रकार ईरानी जनता ने यह भी दर्शा दिया कि वह अपने मुख्य शत्रु अमरीका को भी भलिभांति पहचानती है। यह वही तत्व है जो इन दिनों मध्यपूर्व के देशों की जनक्रान्तियों में दिखाई दे रहा है और इसने ज़ायोनी शासन और अमरीका सहित अन्य पश्चिमी देशों को भयभीत कर रखा है।

 

Nov ०५, २०१७ १४:५२ Asia/Kolkata
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