इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के चेहलुम को अब ज़्याद दिन नहीं बचे हैं और कर्बला की ओर जाने वाले सभी रास्ते पैदल चलने वाले श्रद्धालुओं और तीर्थ यात्रियों से भरे हुए हैं जो एक उफनती हुई नदी की तरह इस पवित्र नगर की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं।

उनकी कोशिश है कि बीस सफ़र को, जो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों की शहादत का चालीसवां दिन है, स्वयं को उनके पवित्र रौज़े तक पहुंचा दें। शायद अनुमानित दो करोड़ की भीड़ के चलते सभी को अपने इमाम की ज़ियारत निकट से करने का अवसर न मिल पाए लेकिन वे दूर से उन्हें सलाम करने और ज़ियारत पढ़ने को अपना सौभाग्य समझते हैं। ये लोग गाड़ियों या अन्य साधनों से या किसी और समय सरलता से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ज़ियारत कर सकते थे लेकिन वे जानते हैं कि जो बात इस आयोजन को महान और अहम बनाती है वह एक साथ दसियों लाख लोगों का इमाम हुसैन की ज़ियारत करना है और वह भी कठिनाइयां उठाते हुए पैदल ज़ियारत करना।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के चेहलुम या अरबईन के अवसर पर पैदल चलने के 80 किलो मीटर के मार्ग में एक छोटा किंतु अति सुंदर नारा सभी का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करता है कि इमाम हुसैन का प्रेम हमें इकट्ठा करता है। यह वह तथ्य है जो चेहलुम के पूरे कार्यक्रम में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इस्लामी व ग़ैर इस्लामी देशों से आने वाले उन दसियों लाख लोगों की एकता व समरसता का केंद्र हैं जो उनके रौज़े की ज़ियारत के लिए आते हैं। इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी एक दूसरे आयाम से इस विषय को देखते हैं। उनका कहना है। इस्लाम ने लोगों के एकत्रित होने और उनकी एकता के लिए बहुत अधिक प्रचार भी किया है और अमल भी किया है। अर्थात उसने ऐसे दिन निर्धारित किए हैं जो अपने साथ जोश लाते हैं और एकता को मज़बूत बनाते हैं। जैसे आशूरा और अरबईन। क़ुरआने मजीद इस बात पर बल देता है कि लोग बिखराव का शिकार न हों, एकजुट रहें और ईश्वर की रस्सी को थामे रहें। इस आधार पर अरबईन भी ईश्वर के उन दिनों में से एक है जिनमें मुसलमान इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ध्रुव पर बेहतरीन ढंग से अपनी एकता और वैभव का प्रदर्शन करते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि जो दसियों लाख लोग अरबईन की पैदल यात्रा के लिए आए हैं और जो करोड़ों लोग नहीं आ पाए हैं वे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से इतना हार्दिक प्रेम क्यों करते हैं। निश्चित रूप से इमाम हुसैन कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के नाती, हज़रत अली व हज़रत फ़ातेमा अलैहिमस्सलाम के सुपुत्र हैं। वे अपने समय के सबसे श्रेष्ठ, ज्ञानी और पवित्र व्यक्ति थे। पैग़म्बरे इस्लाम ने कई बार लोगों के बीच इमाम हसन व इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सराहना की थीं। उन्होंने इमाम हुसैन के बारे में कहा था। हुसैन मार्गदर्शन का दीपक और मुक्ति की नौका हैं। यही कारण है कि इस प्रकार के व्यक्ति की हत्या और वह भी अत्यंत बर्बर तरीक़े से, सभी लोगों विशेष कर पैग़म्बरे इस्लाम व उनके परिजनों से श्रद्धा रखने वालों के लिए अत्यंत दुखद व पीड़ादायक है। इसी लिए शताब्दियां बीत जाने के बाद भी शिया मुसलमान, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का शोक समारोह अत्यंत व्यापक ढंग से मनाते हैं और हर साल उनके चेहलुम के अवसर पर पैदल ज़ियारत करके उनके व उनके वफ़ादार साथियों के त्याग व बलिदान को याद करते हैं और उनके लक्ष्यों पर कटिबद्ध रहने का प्रण लेते हैं।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से श्रद्धा केवल शियों से विशेष नहीं है बल्कि सुन्नी मुसलमान भी उनसे अत्यधिक प्रेम करते हैं और वे अरबईन की पैदल यात्रा करने के साथ ही तीर्थ यात्रियों और श्रद्धालुओं के स्वागत सत्कार के लिए स्टाल भी लगाते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि इमाम हुसैन ने अपने भौतिक हितों के लिए आंदोलन नहीं चलाया था। इमाम हुसैन ने कर्बला में जो बेजोड़ साहस व त्याग का प्रदर्शन किया वह ईश्वरीय आदेश के परिप्रेक्ष्य में, इस्लाम को जीवित रखने के लिए और लोगों को जागृत करने के लिए था। उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा था। मैं बुराई फैलाने, अत्याचार करने या उद्दंडता के लिए नहीं बल्कि केवल अपने नाना के संप्रदाय में सुधार के लिए उठ खड़ा हुआ हूं, मैं सद्कर्मों की ओर बुलाना और बुराइयों से रोकना चाहता हूं और अपने नाना और पिता के चरित्र पर चलना चाहता हूं। इमाम हुसैन ने अपने बेटों, भाइयों और मित्रों का बलिदान दे दिया लेकिन मुआविया के पुत्र यज़ीद जैसे भ्रष्ट शासक के सामने सिर नहीं झुकाया। अफ़ग़ानिस्तान के सुन्नी धर्मगुरू मौलवी अब्दुल अज़ीज़ कहते हैं कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के स्वतंत्रताप्रेमी आंदोलन का समर्थन, मुसलमानों की एकता को सुदृढ़ता का कारण है, वे पूरी मानवता की एकता का स्रोत हैं और उनका आंदोलन सभी के लिए स्वीकार्य है।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला में अपने आंदोलन के माध्यम से स्वतंत्रता, त्याग, बलिदान और अत्याचार से टकराने का पाठ मानवता को दिया। ये मान्यताएं सिर्फ़ मुसलमानों से विशेष नहीं हैं बल्कि सभी इंसान इन्हें अपने लिए आदर्श बना सकते हैं। यही कारण है कि हम देखते हैं कि ईसाई, यहूदी, हिंदू और पारसी बल्कि जो लोग धर्म में ही विश्वास नहीं रखते वे भी इमाम हुसैन से श्रद्धा रखते हैं और उन्हें अपने लिए एक आदर्श समझते हैं। इराक़ के प्रख्यात पादरी जोज़फ़ इलियास, जिन्होंने अरबईन के कार्यक्रम में भाग लिया है, कहते हैं। इराक़ के ईसाइयों की अंजुमनों ने भी शियों की तरह ही इमाम हुसैन की पैदल ज़ियारत की है ताकि मुसलमानों की तरह ही पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से अपनी निष्ठा दर्शा सकें। वे कहते हैं कि हज़रत ईसा मसीह और हज़रत इमाम हुसैन अलैहिमस्सलाम में काफ़ी समानता है।

इराक़ के ग़ैर मुस्लिमों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के श्रद्धालुओं के स्वागत सत्कार के लिए स्टाल भी बनाए हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में मौकिब कहा जाता है और इनमें खाने-पीने से लेकर सोने और अन्य सभी तरह की सुविधाएं होती हैं। इन्हीं में से एक मौकिब का नाम ईसा बिन मरयम है जिसके अधिकांश सदस्य ईसाई हैं। इसी तरह से हज़रत यहया अलैहिस्सलाम के अनुयाई जिन्हें साएबी कहा जाता है और जो अधिकतर इराक़ के दक्षिण में रहते हैं, वे भी इमाम हुसैन से अत्यधिक श्रद्धा रखते हैं। अबू नस्सार नामक एक इराक़ी साएबी हर दिन एक मौकिब में मदद के लिए जाता है। इसी तरह से उसकी पत्नी और बेटी भी इमाम हुसैन के श्रद्धालुओं के लिए खाना पकाने में मदद करती हैं। यहीं यह बात भी उल्लेखनीय है कि इस साल अरबईन के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए अमरीका व यूरोप से 1200 ग़ैर मुस्लिम पहुंचे हैं।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के चेहलुम के भव्य व बेजोड़ जुलूस में शामिल होने के लिए इतनी व्याकुलता और शौक़ उस आकर्षण के कारण है जो ईश्वर ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के व्यक्तित्व में रखा है। वे सन 61 हिजरी में विदित रूप से एक असमान युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो गए थे और शत्रु अपने आपको विजयी समझने लगा था लेकिन उनके उच्च व मानवीय लक्ष्य आज चौदह शताब्दियां बीत जाने के बाद भी करोड़ों लोगों को उनके मज़ार की ओर खींच लाते हैं। यह ईश्वरीय प्रेम अनायास ही क़ुरआने मजीद के सूरए सफ़ की आठवीं आयत की याद दिला देता है जिसमें कहा गया हैः ये सत्य के विरोध ईश्वर के प्रकाश को अपने मुंह (की फूंकों) से बुझा देना चाहते हैं लेकिन ईश्वर तो अपने प्रकाश को पूरा (फैला) कर रखने वाला है, चाहे उन्हें कितना ही बुरा क्यों न लगे। अरबईन के भव्य और दो करोड़ लोगों के जुलूस में श्रद्धालुओं के बीच अद्वितीय मित्रता, प्रेम व स्नेह दिखाई देता है। इस बेजोड़ समूह का संचालन साधारण लोगों द्वारा किया जाता है जो कर्बला के मुसाफ़िरों की सेवा के लिए एक दूसरे से होड़ कर रहे होते हैं।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई इस वैभवशाली आयोजन को ईश्वरीय उपहार बताते हुए कहते हैं। आप देखिए कि एक स्थान पर दस हज़ार या पचास हज़ार लोगों को एकत्रित करने के लिए दुनिया में कितना प्रचारिक प्रयास किया जाता है और अंततः वह हो भी नहीं पाता। यहां अत्यधिक रुकावटों के बावजूद सिर्फ़ ईरान से ही 80 किलो मीटर पैदल चलने के लिए, मनोरंजन और होटल में आराम करने के लिए नहीं पैदल चलने के लिए बीस लाख से ज़्यादा लोग कर्बला जाते हैं। इससे कई गुना अधिक ख़ुद इराक़ और अन्य स्थानों से पहुंचते हैं। यह एक ईश्वरीय घटना है। इससे पता चलता है कि यह रास्ता, प्रेम का रास्ता है, लेकिन दीवानगी और पागलनपन वाला प्रेम नहीं बल्कि दूरदृष्टि के साथ प्रेम, जिस तरह ईश्वर के प्रिय बंदे उससे प्यार करते हैं।

इसी तरह इस्फ़हान के अस्थायी इमामे जुमा मुहम्मद तक़ी रहबर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के चेहलुम के अवसर पर करोड़ों लोगों के एक स्थान पर एकत्रित होने के कारण के बारे में कहते हैं। हम देखते हैं कि इस आयोजन में भाग लेने वाले सिर्फ़ मुसलमान नहीं हैं बल्कि ईसाई और अन्य धर्मों के मानने वाले भी इस जुलूस और करोड़ों के जमवाड़े में उपस्थित होते हैं। इससे पता चलता है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का संदेश विश्व व्यापी है। उनका संदेश, इंसान की प्रवृत्ति पर प्रभाव डालता है और संसार के हर स्थान के इंसान के लिए आकर्षक है। यही कारण है कि इमाम हुसैन के चेहलुम के अवसर पर पैदल ज़ियारत और जुलूस में भाग लेने वालों की संख्या हर साल निरंतर बढ़ती जा रही है।

 

Nov ०८, २०१७ १७:२८ Asia/Kolkata
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