इमाम हुसैन (अ) का चेहलुम सफ़र की 20 तारीख़ को और कर्बला में इमाम हुसैन (अ) और उनके 72 साथियों की शहादत के चालीस दिन बाद मनाया जाता है।

यह वही दिन है, जब कर्बला के क़ैदी दमिश्क़ से मदीना वापसी के दौरान, कर्बला में इमाम हुसैन (अ) की पवित्र क़ब्र की ज़ियारत के लिए गए थे। इसी दिन जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी भी इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र की ज़ियारत के लिए गए थे।

जाबिर कर्बला गए हैं, वह अब नेत्रहीन हैं, लेकिन किसी समय में उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स) के सुन्दर चेहरे की ज़ियारत की थी और हज़रत अली (अ) की महिमा एवं रोब, इमाम हसन (अ) का आकर्षक चेहरा और इमाम हुसैन (अ) की प्रभावशाली निगाहों के अलावा इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) का चमकता हुआ चेहरा और यहां तक कि इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ) को देखा था। वे ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने जवानी में पैग़म्बरे इस्लाम की यादों को लिखा था। पैग़म्बरे इस्लाम (स) के वर्षों बाद तक उनके अहले बैत या परिजनों के संपर्क में रहे थे। वही अपने बहुत ही विशिष्ट शिष्य अतिया औफ़ी के साथ कर्बला पहुंचे हैं।

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सफ़र की बीसवीं तारीख़ है, जाबिर फ़ुरात में स्नान करके लौटे हैं। उन्होंने अपने वस्त्रों पर जो इत्र लगा रखा है, उसकी ख़ुशबू कर्बला के वातारवरण में फैल रही है। वे धीरे धीरे क़दम उठा रहे हैं और हर क़दम पर अल्लाह का नाम जप रहे हैं। भूखे और प्यासे शहीद किए गए हज़रत अली (अ) के बेटे इमाम हुसैन (अ) की पवित्र क़ब्र के निकट पहुंचते हैं तो देखते हैं कि वातावरण में एक बहुत ही मनमोहक ख़ुशबू है। जाबिर और अतिया इमाम हुसैन (अ) को शहीद किए जाने के स्थान पर पहुंचते हैं, यह वही स्थान है, जहां सबसे लोकप्रिय इंसान के बिना सिर के शरीर के टुकड़ों को दफ़्न किया गया है।

जाबिर अतिया से कहते हैं कि उनका हाथ पकड़कर इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र पर रख दें। बूढ़े जाबिर के कांधें कांप रहे हैं, उनकी सफ़ैद दाढ़ी पर आंखों से आंसू जारी हो रहे हैं। जाबिर क़ब्र की मिट्टी के निकट अपना चेहरा ले जाकर तीन बार चीख़कर कहते हैं, अल्लाहो अकबर, अल्लाहो अकबर, अल्लाहो अकबर और बेहोश होकर गिर पड़ते हैं। अतिया जाबिर के चेहरे पर पानी छिड़कते हैं, जाबिर होश में आ जाते हैं। उसके बाद फिर रोने लगते हैं और तीन बार कहते हैं, या हुसैन, या हुसैन, या हुसैन, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।

जाबिर मिट्टी पर अपना चेहरा रखकर बहुत ही दुख और पीड़ा में रोते हैं और कहते हैं, दोस्त, दोस्त को जवाब नहीं दे रहा है। जाबिर ख़ुद ही अपनी बात का जवाब देते हुए कहते हैं, किसी तरह से मेरा जवाब दोगे, जबकि तुम्हारे सिर और शरीर में मीलों की दूरी कर दी है। क्या दोस्त, दोस्त का जवाब नहीं देता है?

हे हुसैन मैं गवाही देता हूं कि आप अंतिम ईश्वरीय दूत के बेटे हैं। मोमिनों के सरदार के बेटे हैं, आपका और पवित्रता का अटूट संबंध है। पंजे तन के पांचवें सदस्य और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) के बेटे हैं। क्यों इस तरह से न हों, क्योंकि आपने पैग़म्बरे इस्लाम के हाथों से भोजन किया है और मोमिनों के इमाम की आग़ोश में परवरिश पाई है और ईमान के सीने से स्तनपान किया  और इस्लाम के लिए ही दूध छोड़ा। आपने सम्मानजनक जीवन व्यतीत किया और दोस्ती का हक़ अदा किया।

जाबिर रो रहे थे, इमाम के ऊपर सलाम भेज रहे थे, उनकी दर्दनाक आवाज़ कर्बला के ख़ामोश वातावरण को तोड़ रही थी। कभी वह मिट्टी को चूम रहे थे और कभी उसे सूंघते थे और कभी एकदम ख़ामोश हो जाते थे, जैसे कि किसी आवाज़ को सुनने की कोशिश कर रहे हों, सिर उठाते थे और किसी भी एक बिंदु को टिकटिकी बांधे देखने लगते थे। एक बार फिर उन्होंने इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र पर हाथ रखा और कहा, मैं गवाही देता हूं कि आप उसी मार्ग पर आगे बढ़ गए जिस पर आपके भाई याहया बिन ज़करिया चले। वह बुराई से टकरा गए और अत्याचारी के सामने अपना सिर पेश कर दिया, आपने भी अत्याचार और बुराई से लड़ते हुए अपना सिर क़ुर्बान कर दिया। जाबिर उठ खड़े हुए और इमाम के एक एक साथी पर सलाम भेजने लगे। अब्बास पर सलाम हो, अकबर पर सलाम हो, क़ासिम पर सलाम हो, अब्दुल्लाह रज़ी पर सलाम हो, हबीब पर सलाम हो, मुस्लिम पर सलाम हो...

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उसके बाद वह ख़ामोश हो गए। आंसू लगातार आंखों से बह रहे थे। उनके चेहरे पर आंसू मोतियों की तरह चमक रहे थे। कुछ ठहरे और उंगली से इमाम की क़ब्र की ओर इशारा करते हुए कहा, क़सम उस ज़ात की जिसने मोहम्मद को पैग़म्बर बनाया, आपने जो काम किया है हम उसमें भागीदार हैं, यानी शहादत, क़ुर्बानी, पवित्रता और धैर्य में शरीक हैं।

अतिया को आश्चर्य हुआ कि किस तरह से संभव है कि मैं और जाबिर जब कर्बला में नहीं थे, हमने लड़ाई में भाग नहीं लिया, ख़ून नहीं दिया, कोई सिर नहीं काटा, किस तरह से इमाम हुसैन के भागीदार हो गए?

अतिया ने खामोशी तोड़ते हुए कहा, मेरे स्वामी यह किस तरह से संभव है कि जिस पर्वत पर हम नहीं चढ़े हैं, किसी भी घाटी या इलाक़े में हम इमाम हुसैन के साथ क़दम मिलाकर नहीं चले, हमने तलवार नियाम से नहीं निकाली और दुश्मन से लड़ाई नहीं की। लेकिन यह लोग जान हथेली पर रखकर, भूख और प्यास में ख़ून में नहा गए, उनकी पत्नियों और बच्चों ने दुख एवं अत्याचार सहन किया, यह किस तरह से संभव है? किस तरह से?

जाबिर ने कहा अतिया मैंने अपने प्यारे पैग़म्बरे इस्लाम से सुना है कि जो कोई भी जिस समूह से प्रेम करता है, वह उसी में से होता है और जो कोई किसी समूह के काम को पसंद करता है और उसे स्वीकार करता है वह उसी के काम में भागीदार होता है और उसके साथ होता है। उस ज़ात की क़सम, जिसने पैग़म्बरे इस्लाम को पैग़म्बर बनाया, मेरा और मेरे साथियों का निर्णय वही है जो इमाम हुसैन और उनके साथियों का था।

कुछ देर बाद धूल में डूबा हुआ एक कारवान वहां पहुंचा। ऐसा कारवान जो चालीस दिनों के दुख, दर्द, अत्याचार, कटाक्ष, धमकियां और अपमान सहन करता हुआ कर्बला वापस लौटा था। ऐसा सम्मानजनक कारवान कि जिसमें कर्बला से जाते हुए और वापस लौटते हुए कोई समानता नहीं थी। ऐसा कारवान कि जिसने बनी उमय्या की पचास वर्षीय साज़िशों पर पानी फेर दिया और सफलता के साथ वापस लौटा है, ताकि कर्बला के शहीदों को जो वचन दिया था उस पर अपनी प्रतिबद्धता जताए। ऐसा कारवान जो लुटकर कर्बला से गया था और अब विजयी होकर वापस लौट रहा है। कारवान अपनी मंज़िल पर पहुंच गया है।

इमाम हुसैन (अ) का चेहलुम है। यह ख़ून के उत्कृष्टता तक पहुंचने का समय है। यह प्रतिबद्धता का समय है। हज़रत ज़ैनब इमाम हुसैन (अ) और उनके साथियों का चेहलुम मनाने कर्बला पहुंच रही हैं। जाबिर नंगे पैर और रोते हुए इस कारवान का स्वागत करने आगे बढ़ते हैं। जैसे ही इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) के निकट पहुंचे, इमाम ने उनसे पूछा, क्या आप जाबिर हैं? उन्होंने कहा, हां हे पैग़म्बरे इस्लाम के बेटे। जाबिर इमाम के गले से लग गए और इमाम हुसैन की याद में बहुत रोए। इमाम ने फ़रमाया, जाबिर ईश्वर की सौगंध यह वही स्थान है, जहां हमारे पुरुषों को शहीद कर दिया गया, हमारे युवाओं के सिर काट लिए गए, हमारी महिलाओं को क़ैदी बनाया गया और हमारे ख़ेमों या तम्बुओं को आग लगा दी गई।

उसके बाद इमाम ज़ैनुल आबेदीन ने एक एक शहीद की क़ब्र को जाबिर को दिखाया। यहां अली अकबर की क़ब्र है और यहां क़ासिम की क़ब्र है। यहां मेरे वालिद इमाम हुसैन की क़ब्र है। वहां अलक़मा नहर के निकट मेरे चाचा अब्बास की क़ब्र है।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) ने आदेश दिया कि पुरुष पवित्र क़ब्र के आसपास से हट जाएं। उसके बाद हज़रत ज़ैनब (स) अपने भाई की क़ब्र के निकट बैठीं और पुकार कर कहा, हे मेरे भाई, चालीस दिन के बाद फिर मैं आपके पास लौटी हूं। मेरे भाई जब मैं आशूर के दिन दोपहर को इस स्थान पर आई थी तो तुम्हारे शरीर पर इतने तीर थे और तलवारों और ख़ंजरों के निशान थे कि मैं पहचान नहीं सकी। अब उठो और चालीस दिन बाद मुझे देखो। आज आप भी मुझे नहीं पहचान पायेंगे। इस समय इमामे सज्जाद ने फ़रमाया, हे फूफी जान, आप धैर्य रखिए। हज़रत ज़ैनब ने जवाब दिया, हे अली मेरी आंखों की रोशनी, मुझे कर्बला में ही छोड़ दो, ताकि मैं अपने भाई के पास रहूं। इमाम ने फ़रमाया, हे फूफी जान, आप धैर्य रखिए आप अनाथों का नेतृत्व कर रही हैं। इस समय कारवान में शामिल सभी रोने पीटने लगने और शोक सभा का प्रबंध किया गया। हर कोई कर्बला में घटने वाली महान घटना और कारवान पर होने वाले अत्याचारों का बखान कर रहा था। दिखाया। यहां अली अक़बर की क़ब्र है और यहां क़ासिम की क़ब्र है। यह                          

 

Nov ११, २०१७ १३:३० Asia/Kolkata
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