28 सफ़र की तारीख़ इस्लामी इतिहास की वह तारीख़ है जिसने दो अवसरों पर पूरे इस्लामी जगत को शोक की गहराइयों में पहुंचा दिया।

इसी दिन पैग़म्बर इस्लाम इस दुनिया से गए और इसी तारीख़ को पैग़मबरे इस्लाम के नाती हज़रत इमाम हुसेन को शहीद कर दिया गया।

पैग़म्बरे इस्लाम ने कुल 63 साल का जीवन बिताया लेकिन इसी अवधि में उन्होंने पूरी मानवता के सामने आदर्श पेश कर दिया कि सही जीवन शैली क्या है। उन्होंने समाज को झूठे ख़ुदाओं की उपासना से मुक्ति दिला कर अनन्य ईश्वर की उपासना का रास्ता दिखाया। पैग़म्बरे इस्लाम ने समाज को अज्ञानत, भौतिकवाद, स्वार्थ और द्वेष जैसी बुराइयों से निकाला और उन्हें एक दूसरे के लिए क़ुरबानियां देने और त्याग करने का पाठ पढ़ाया। पैग़मबरे इस्लाम ईश्वर की ओर से मानव समाज के लिए भेजे गए अंतिम पैग़म्बर थे। जब 28 सफ़र के दिन मदीना नगर में यह ख़बर गूंजी के पैग़म्बरे इस्लाम दुनिया से सिधारे तो लोग हतप्रभ रह गए किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अपने साथ नया वातावरण, नया उजाला और नया क्षितिज लाने वाला इंसान अचानक उनके बीच से चला गया है।

पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास को 14 शताब्दियों से अधिक समय बीत चुका है तो विचारकों और बुद्धिजीवियों को और अधिक आभास हो रहा है कि उन्होंने मानव समाज के सामने जो सार्थक नियम और महान शिक्षाएं पेश कीं उनकी ज़रूरत मानव समाज को हमेशा रही। जर्मनी की प्रख्यात लेखिका मारिया शेमल से जब पूछा गया कि क्या आप मुसलमान हैं? तो उन्होंने उत्तर दिया कि मुझे नहीं मालूम, मैं बस इतना कह सकती हूं कि पैग़म्बरे इस्लाम तथा मदीना शहर के मालिक के प्रति श्रद्धा रखती हूं। उनका कहना है कि इंसान की मानसिक और आत्मिक स्थिति में रचनात्मक बदलाव बल्कि क्रान्ति लाने में पैग़मबरे इस्लाम की भूमिका के बारे में सब जानते हैं। पैग़मबरे इस्लाम ने शरीर के बजाए आत्मा में जीवन प्रवाहित कर दिया।

ईश्वर की ओर से भेजे गए हर पैग़मबर ने अपने ज़माने की आवश्यकता और मानव समाज की मानसिक परिपक्वता के अनुरूप धर्म के नियमों का प्रचार किया। जब पैग़मबरे इस्लाम का काल आया तो ईश्वर ने मानव समाज की स्थिति को देखते हुए अपना अंतिम धर्म दुनिया में भेजा। पैग़मबर ने इसलाम के माध्यम से मानवता के लिए नए क्षितिज खोले और इंसानों को भौतिक दुनिया से अलग दूसरे लोक के बारे में गहराई से बताया।

पैग़म्बरे इसलाम ने अपना मिशन पूरा करने के लिए कुछ बिंदुओं पर विशेष रूप से बल दिया। एक बिंदु था तर्कशीलता। उन्होंने लोगों के भीतर चिंतन करने और तर्कशीलता की भावना को जगाया। उन्होंने अपने पहले ही संदेश में चिंतन और ज्ञान के महत्व पर प्रकाश डाला। पैग़मबरे इस्लाम ने लोगों पर ज़ोर दिया कि वह जब उपासना कर रहे हैं तो उसके बारे में ज़रूर चिंतन करें जिसकी उपासना कर रहे है। यह ज़रूर परख लें कि वह उपासन के योग्य है या नहीं।

जो लोग भी पैग़मबरे इस्लाम के अनुयायी हैं उन्हें इस महान हस्ती के अनुसरण पर गर्व है। जो लोग भी पैगमबरे इस्लाम के व्यक्तित्व से परिचित हैं उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि यह हस्ती सभी गुणों का स्रोत है। अतः दाइश, अलक़ायदा और अन्नुस्रा जैसे आतंकी संगठन यदि दावा करते हैं कि वह पैग़म्बरे इस्लाम के मानने वाले हैं तो उनका यह दावा पूरी तरह झूठा है। क्योंकि पैग़मबरे इस्लाम का पूरा जीवन ही पाठ है। उन्होंने जो क्षण भी इस दुनिया में गुज़ारा उसमें उन्होंने अपने व्यवहार और कर्म से कोई न कोई पाठ ज़रूर दिया है और जो कुछ आतंकी संगठन कर रहे हैं वह पैग़मबरे इस्लाम की शिक्षाओं से कदापि कोई समानता नहीं रखता।

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई कहते हैं पैग़मबरे इस्लाम ने जीवन की कठिन परिस्थितियों में जिन नियमों पर अमल किया हम भी उन्हीं नियमों के अनुसार जीवन गुजार सकते हैं। वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में आशा से भरे रहते थे। वह ईश्वर पर भरोसा करते हुए , ईश्वरीय नियमों का पालन करते हुए और सतत संघर्ष के साथ अपनी बात रखते थे और आगे बढ़ते थे। हम भी इन्हीं चीज़ों पर भरोसा करें और ध्यान दें तो हमारे निराश होने की कोई वजह नहीं हो सकती। श्रोताओ पैग़मबरे इस्लाम के स्वर्गवास पर हम हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हैं।

 

28 सफ़र की तारीख़ में ही पैग़मबरे इस्लाम के नाती और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बड़े पुत्र हज़रत इमाम हसन शहीद किए गए। इतिहास में है कि हज़रत इमाम हसन अपने नाना पैग़मबरे इस्लाम की तरह दिखाई देते थे और पैग़मबरे इस्लाम को उनसे विशेष लगाव था। वह पैग़मबरे इस्लाम के साथ नज़र आते थे अतः उनका पालन पोषण पैग़मबरे इस्लाम की छत्रछाया में और ईश्वरीय शिक्षाओं के वातावरण में हुआ। वह बड़े दयालु और दानी थे। उनका दान लोगों में बहुत मशहूर था। इतिहास में है कि तीन बार उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति का आधा भाग ग़रीबों में बांट दिया।

इमाम हसन अलैहिस्सलाम की सहनशीलता भी एक उदाहरण थी। वर्तमान सीरिया का रहने वाला एक बूढ़ा व्यक्ति मदीना नगर पहुंचा। उसने इमाम हसन अलैहिस्सलाम को घोड़े पर सवार देखा तो उन्हें गालियां दीं। इमाम हसन अलैहिस्सलाम के साथ मौजूद लोगों ने बूढ़े व्यक्ति को वहां से भगाना चाहा तो इमाम ने अपने साथियों को रोक दिया। जब वह व्यक्ति ख़ामोश हो गया तो इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने उसे सलाम किया और मुसकुराते हुए उससे कहा कि मुझे लगता है कि आप यहां अजनबी हैं। शायद आपको कोई ग़लत फ़हमी हो गई है, यदि किसी चीज़ की ज़रूरत है तो मैं उपलब्ध कराने के लिए तैयार हूं। किसी मामले में यदि सुझाव चाहिए तो वह देने के लिए तैयार हूं। यदि कहीं से भाग कर आए हैं तो शरण देने के लिए तैयार हूं। आप यदि अपनी सवारी मेरे घर की ओर मोड़ लें तो आप हमारे घर जब तक चाहें ठहर सकते हैं। वहां जगह भी है और ज़रूरत की चीज़ें भी हैं। जब उस बूढ़े व्यक्ति ने इमाम हसन अलैहिस्सलाम का यह अंदाज़ देखा तो शर्मिन्दा हो गया। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा कि मैं गवाही देता हूं कि आप धरती पर ईश्वर के दूत हैं। ईश्वर बेहतर जानता है कि वह किसे अपने दूत के रूप में चुने। मैं इससे पहले तक आपसे और आपके पिता से बहुत नफ़रत करता था लेकिन अब आप मेरे निकट सबसे प्रिय इंसान हैं। वह बूढ़ा व्यक्ति इमाम हसन के घर गया और कुछ दिन वहां ठहरने के बाद सीरिया लौट गया। उसका हृदय पैग़मबरे इस्लाम और उनके परिजनों की मोहब्बत से आबाद हो चुका था।

इमाम हसन अलैहिस्सलाम की सहनशीलता की यह स्थिति थी कि पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के एक कट्टर दुशमन मरवान जिसने इमाम हसन अलैहिस्सलाम को बहुत दुख और पीड़ा दी थी एक अवसर पर कहता है कि मैंने यह दुर्व्यवहार एसे व्यक्ति के साथ किया है जिसकी सहनशीलता पहाड़ों के समान थी।

इतिहास में है कि एक ग़ुलाम ने इमाम हसन अलैहिस्सलाम को एक गुलदस्ता दिया जिसकी महक कमरे में फैल गई। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने गुलदस्त सूंघा और मुसकुराकर कहा कि जा तुझे आज़ाद किया। ग़ुलाम ख़ुशी से पागल हो गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। उसने इमाम का शुक्रिया अदा किया और बाहर चला गया। वहां मौजूद एक व्यक्ति ने इमाम हसन अलैहिस्सलाम से पूछा कि एक गुलदस्ते की वजह से आपने इस ग़ुलाम को क्या आज़ाद कर दिया। इमाम ने जवाब दिया कि ईश्वर ने हमें यही सिखाया है। क़ुरआन में ईश्वर कहता है कि यदि कोई तुम्हें उपहार दे तो उस उससे अच्छा उपहार दो। ईश्वर की राह में आज़ाद कर देना उसके लिए सबसे बड़ा उपहार था।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम के शहीद हो जाने के बाद लोगों के आग्रह पर इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने समाज का नेतृत्व संभाला और हज़रत अली अलैहिस्सलाम की कार्यशैली के अनुसार समाज का नेतृत्व करने लगे। सीरिया के इलाक़े में मुआविया मनमानी रूप से शासन कर रहा था। उसने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ख़िलाफ़ बग़ावत की थी और इस्लामी जगत का ख़लीफ़ बन जाने का ख़्वाब देख रहा था। जब मुआविया ने देखा कि लोगों ने इमाम हसन अलैहिस्सलाम के अनुसरण का रास्ता अपनाया है तो वह आग बगूला हो गया। मुआविया ने इमाम हसन से लड़ने के लिए अपनी सेना भेज दी। साथ ही उसने इमाम हसन अलैहिस्सलाम के साथ मौजूद लोगों को ख़रीदने और डराने की नीति अपनाई जो कामयाब रही। इमाम हसन अलैहिस्सलाम के साथियों में कोई गुट बन गए। इस स्थिति को देखते हुए इमाम हसन ने मुआविया से संधि कर ली।

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई इमाम हसन के कठिन दौर के बारे में कहते हैं कि उस समय के इसलामी समाज की विशेष प्रकार की परिस्थितियों के कारण हज़रत अली अलेहिस्सलाम शहीद कर दिए गए। इसके बाद इमाम हसन अलैहिस्सलाम की इमामत का ज़माना शुरू हुआ। चूंकि परिस्थितियां वही थीं इसी लिए छह महीने से अधिक समय तक लोगों ने इमाम हसन अलैहिस्सलाम का साथ नहीं दिया बल्कि उनका साथ छोड़ कर हट गए। इमाम हसन अलैहिस्सलाम जानते थे कि यदि वह अपने मुट्ठी भर साथियों के साथ मुआविया से लड़ते हैं और शहीद कर दिए जायेंगे तो जो हालात हैं उनमें कोई भी उनके मिशन को आगे नहीं बढ़ा पाएगा। इसीलिए इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने मुआविया से संधि करने का फ़ैसला किया हालांकि उन्हें मालूम था कि इन परिस्थितियों में ज़िदा रहना मर जाने से अधिक कठिन होगा। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने इस कठिनाई को सहन किया।

मुआविया इमाम हसन अलैहिस्सलाम पर संधि थोपकर वैसे तो अपने बहुत से लक्ष्य प्राप्त कर चुका था लेकिन इमाम हसन अलैहिस्सलाम की उपस्थिति उसके बहुत से घिनौने मंसूबों के रास्ते में रुकावट थी। मुआविया की एसी ही एक योजना थी अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करना। उसे पता था कि इमाम हसन अलैहिस्सलाम की ज़िंदगी में यदि वह अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करता है तो निश्चित रूप से इमाम हसन अलैहिस्सलाम इसका विरोध करेंगे। इस लिए मुआविया ने सोच लिया कि जिस तरह भी संभव है इमाम हसन अलैहिस्सलाम को शहीद कर दिया जाए। उसने बहुत छान बीन की तो उसे पता चला कि इस साज़िश के लिए सबसे उचित माध्यम जोअदा है जो इमाम हसन अलैहिस्सलाम की पत्नी थी। मुआविया ने जोअदा को एक लाख दिरहम भिजवाए और कहा कि यदि वह इमाम हसन अलैहिस्सलाम को शहीद कर दे तो अपने बेटे यज़ीद से उसका विवाह करवा देगा। जोअदा ने शाही ज़िंदगी की लालच में इमाम हसन अलैहिस्सलाम को पानी में ज़हर दे दिया जिससे इमाम हसन अलैहिस्सलाम तड़प तड़प कर शहीद हो गए।

इब्ने अब्बास से रिवायत है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने भविष्यवाणी की थी कि मेरे बेटे हसन को ज़हर से शहीद किया जाएगा और ज़मीन व आसमान उन पर विलाप करेंगे। मेरे बेटे हसन के शोक में रोने का बहुत सवाब है। जो भी हसन पर रोएगा उसकी आंखें उस दिन चमक रही होंगी जिस दिन आंखों से सुझाई नहीं दे रहा होगा। जिस दिन सारे हृदय दुखी होंगे उस व्यक्ति का दिल ख़ुश होगा। जो भी बक़ीअ क़बरिस्तान में हसन के क़ब्र की ज़ियारत करे उसक क़दम सिरात पुल पर नहीं डगमगाएंगे जिस दिन क़दम लड़खड़ा रहे होंगे।

 

 

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Nov १८, २०१७ १५:५६ Asia/Kolkata
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