वर्तमान समय में इस्लाम की सबसे बड़ी ज़रूरत, मुसलमानों के बीच एकता बनाए रखना है।

इस्लामी जगत में एकता स्थापित करने में जो सबसे बड़ी बाधा है वह वहाबियत है।  वैसे तो आले सऊद स्वयं को "ख़ादिमे हरमैने शरीफ़ैन" कहते हैं और अपने आप को इस्लामी एकता का समर्थक भी मानते हैं किंतु व्यवहारिक रूप में वे अपने दावों के विपरीत काम करते हैं।  आले सऊद वैसा ही काम करते हैं जैसा मुनाफ़िक़ या मिथ्याचारी करते हैं अर्थात मुसलमानों के बीच मुसलमानों जैसी बातें और मुसलमानों से अलग होने की सूरत में उनके विरुद्ध षडयंत्र करना।

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मुसलमानों की यह हार्दिक अभिलाषा है कि इस्लामी जगत में एकता स्थापित हो।  पवित्र क़ुरआन में भी मुसलमानों के बीच एकता की बात कही गई है।  सूरे आले इमरान की आयत संख्या 103 में ईश्वर, मुसलमानों से कहता है कि वे अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रहें तथा आपस में मतभेद उत्पन्न न करें।  पवित्र क़ुरआन के व्याख्याकारों का कहना है कि अल्लाह की रस्सी से मुराद पैग़म्बरे इस्लाम (स), पवित्र क़ुरआन, पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन और हर वह चीज़ है जो मुसलमानों को एकजुट रखे।  खेद की बात यह है कि मुसलमान धर्मगुरूओं, बुद्धिजीवियों और समाज के सक्रिय लोगों की ओर से मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने के प्रयासों के बावजूद भी अब तक मुसलमानों में वैसी एकता स्थापित नहीं हो सकी है जो उनके दृष्टिगत रही है।  इस समय इस्लामी जगत में मतभेद स्पष्ट रूप में दिखाई दे रहे हैं।  जब हम इसके कारण को ढूंढते हैं तो पता चलता है कि इसके दो कारक हैं भीतरी और बाहरी।

इस्लामी एकता को भंग करने के बाहरी तत्वों में वे सरकारें और प्रक्रियाएं बाहरी तत्वों में बे सरकारों और प्रक्रियाएं शामिल हैं जो पूर्ण रूप से इस्लाम विरोधी हैं।  यह शक्तियां विभिन्न प्रकार से मुसलमानों के बीच मतभेद फैलाकर चाहती हैं कि उनमें एकजुटता न होने पाए।  इसका मुख्य कारण यह है कि यदि मुसलमानों के बीच एकता स्थापित हो गई तो वह उनके हितों के लिए बहुत हानिकारक होगी।  मुसलमानों के बीच मतभेद फैलाने वाले आंतरिक कारकों में अज्ञानता, जातिवाद, भ्रष्ट विचार, स्वयं को दूसरों पर वरीयता देना और इसी प्रकार के कुछ अन्य कारक हैं।  इसी बीच इस्लामी जगत के भीतर भी कुछ एसे कारण हैं जो जाने या अंजाने में इस्लाम के शत्रुओं की सेवा करते रहते हैं।  इनमें सरकारों और उन प्रक्रियाओं का उल्लेख किया जा सकता है जो व्यवहारिक रूप में इस्लाम के शत्रुओं की मदद करते हैं।  अब इसकी खोजबीन की ज़रूरत है कि वे ऐसा काम अज्ञानता के कारण करते हैं या फिर सोची समझी साज़िश के अन्तर्गत करते हैं।

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इस्लाम के भीतर से जो चीज़ इस्लाम और मुसलमानों को व्यापक स्तर पर क्षति पहुंचा रही है वह है वहाबियत।  18वीं शताब्दी के मध्य में इसने शक्ति हासिल की और शक्ति प्राप्त होते ही उसने मुसलमानों के बीच मतभेद फैलाने वाले काम शुरू कर दिये।  वहाबियों ने सत्ता प्राप्त करते ही बहुत ही कम समय में सऊदी अरब के महत्वपूर्ण नगरों पर नियंत्रण कर लिया और उन्होंने पवित्र नगरों करबला और नजफ़ पर भी हमले किये।  इस प्रकार से वहाबियत ने पूरे इस्लामी जगत पर अपना साम्राज्य थोपने का प्रयास आरंभ कर दिया।

वहाबियत ऐसी भ्रष्ट भहाबियत ने के बीचके तरतहतेेषताएंुसलमानों के बीच एकता स्थापित हो गई तो वह उनके हितों के लिए बहुत हानिकारक होगी। को दर्दनाक ें आम विचारधारा है जो इस्लाम के समस्त पंथों का विरोध करती है।  वर्तमान समय में मुसलमानों के जितने भी पंथ हैं उनमे से किसी को भी वहाबी मुसलमान नहीं मानते हैं।  मुसलमानों के पंथ जिन बातों को वैध जानते हुए शताब्दियों से उनका अनुसरण करते आ रहे हैं वहाबियों की दृष्टि में वे सब अवैध हैं जैसे पैग़म्बरे इस्लाम (स) के माध्यम से ईश्वर से प्रार्थना करना।  वहाबी मानते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके परिजनों की क़ब्रों पर जाकर दुआ करना हराम है।  वहाबियत के रूप में यह रूढ़ीवादी विचारधारा, बहुत सी इस्लामी मान्यताओं को अवैध समझता है जिसे मुसलमान वैध समझते हैं।  हालांकि मुसलमानों के विभिन्न मतों और पंथों के बीच कुछ आंशिक मतभेद पाए जाते हैं किंतु यह मतभेद मूल सिद्धातों में नहीं हैं।  इस प्रकार इस्लाम के मूल सिद्धांतों को मानते हुए मुसलमानों के बीच एकता स्थापित की जा सकती है।  हांलाकि वहाबी केवल अपनी बात को ही सही मानते हैं और किसी दूसरे इस्लामी पंथ की बात को स्वीकार नहीं करते।

इस्लामी शिक्षाओं में मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने पर बहुत बल दिया गया है।  इस बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के बहुत से कथन मौजूद हैं।  एक स्थान में आप कहते हैं कि जो भी लोगों के बीच भेदभाव और मतभेद फैलाए वह हमसे नहीं है।  आप कहते हैं कि जो मतभेद फैलाने के लिए युद्ध करे वह भी हमसे नहीं है और जो एसी स्थिति में मर जाए वह भी हमसे नहीं है।  इस्लामी शिक्षाओं के बिल्कुल विपरीत, वहाबी विचारधारा के अनुसार जो भी वहाबियत को स्वीकार नहीं करता वह मुशरिक अर्थात अनंकेश्वरवादी है इसलिए उससे युद्ध किया जाना चाहिए।  दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि वहाबी, अपनी भ्रष्ट विचारधारा को सारे मुसलमानों में बलपूर्वक फैलाना चाहते हैं और इसके विरोधी से युद्ध करना चाहते हैं।  इस सोच का मूल कारण यह है कि वहाबियत का आधार इस्लामी शिक्षाएं नहीं बल्कि अब्दुल वहाब की भ्रष्ट विचारधारा है जिसे मुसलमान मानते ही नहीं हैं।

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सऊदी अरब में तेल की खोज और तेल की आय के सऊदी परिवार के हाथों लगने के बाद वहाबियों ने पेट्रो डालर के माध्यम से वहाबियत का प्रचार और प्रसार आरंभ किया।  इस उद्देश्य से उन्होंने पूरे विश्व में मदरसे खोलकर वहाबी विचारधारा को पढ़ाना आरंभ किया।  इस कार्य से वहाबियों का उद्देश्य यह था कि पूरे विश्व में वहाबी विचारधारा फैला दी जाए।  हालांकि वहाबी विचारधारा में आधुनिक तकनीक के प्रयोग को अवैध बताया गया है किंतु स्वयं उन्होंने इस हिंसक विचारधारा को आम करने के लिए रेडियो, टेलिविज़न और इंटरनेट जैसे संचार माध्यमों का जमकर प्रयोग किया।  वहाबियों ने अतिवादी वहाबी विचारधारा को फैलाने के लिए बिना मेहनत के हाथ आने वाले पेट्रो डालर का भरपूर दुरूपयोग किया।

सऊदियों ने वहाबी विचारधारा के प्रचार व प्रसार के लिए मुसलमानों के बीच मतभेद फैलाने और युद्ध को अपनी कार्यसूचि में शामिल कर रखा है। वहाबियों ने बहुत से एसे तकफ़ीरी आतंकवादी गुटों को अस्तित्व दिया है जिनकी पहचान ही हिंसा, रूढ़ीवाद और जनसंहार है।  वहाबियत से प्रभावित तकफ़ीरी आतंकी गुट अधिकतर मुसलमानों की ही हत्याएं करते हैं।  इन गुटों ने सीरिया, इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में खुलकर मुसलमानों की हत्याएं की हैं।  अलक़ाएदा, दाइश, बोको हराम, नुस्रा फ्रंट और अश्शबाब जैसे तकफ़ीरी आतंकवादी गुट विश्व के बहुत से क्षेत्रों में सक्रिय हैं।  यह लोग वास्तव में मुसलमानों के बीच मतभेद फैलाने वाले वहाबियों के प्रतिनिधि हैं जो पूरे लगन से मुसलमानों के बीच मतभेद फैला रहे हैं।  इन्हीं गुटों ने सीरिया, इराक़, लीबिया, लेबनान, अफ़ग़ानिस्तान और कुछ अन्य देशों को अशांत बना रखा था।

सऊदी शासन न केवल आतंकवादी गुटों के माध्यम से ही मुसलमानों के बीच मतभेद फैला रहा है बल्कि स्वयं भी इस काम में बढ़-चढकर हिस्सा ले रहा है।  दो साल से अधिक समय से सऊदी अरब, निर्धन मुस्लिम देश यमन पर खुलकर अत्याचार कर रहा है।  सऊदी अरब के हवाई हमलों में अबतक हज़ारों निर्दोष यमनवासी मारे जा चुके हैं।  यमन पर सऊदी अरब के आक्रमण से इन देशों को बहुत क्षति पहुंची है।  इसी प्रकार से सऊदी अरब ने बहरैन में हस्तक्षेप करके इस देश को अशांत कर रखा है।  विशेष बात यह है कि यह देश मुसलमान देश होने के साथ ही अरब देश भी है।  इससे पता चलता है कि वहाबी विचारधारा के निकट मुसलमानों का कोई महत्व नहीं है।

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जिस बात ने सऊदी अरब की इस्लाम विरोधी सोच को स्पष्ट किया वह है इस्लाम विरोधियों विशेषकर अमरीका का अनुसरण।  वहाबी विचारधारा का प्रचारक आले सऊद परिवार, ब्रिटेन के सहयोग से सत्ता में आया और इसे सुरक्षित रखने के लिए सऊदी शासक, अमरीका की शरण में चले गए।  अमरीका ने सऊदी शासन की इस्लाम विरोधी नीतियों का खुलकर समर्थन किया।  अपना यह काम अमरीका अब भी कर रहा है जिसे यमन में आम मुसलमानों के जनसंहार के रूप में देखा जा सकता है।  यमन वासियों के जनसंहार के लिए अमरीका ने सऊदी अरब को शस्त्र उपलब्ध कराए हैं।  सऊदी शासन के इस काम पर पवित्र क़ुरआन की 137वीं और 138वीं आयतें चरितार्थ होती हैं जिनमें कहा गया है कि मुनाफ़िक़ों या मिथ्याचारियों को दर्दनाक दंड की सूचना दो।  वे वही हैं जो मोमिनों के स्थान पर काफ़िरों से दोस्ती करते हैं।

मुसलमानों के बीच मतभेद फैलाने की आले सऊद शासन की एक नई चाल का पता अभी हाल में चला है कि है ज़ायोनी शासन से सऊदी अरब की काफ़ी पुरानी मित्रता है।  हालांकि इससे पहले भी सऊदी अरब और ज़ायोनी शासन के बीच संबन्धों की बातें सामने आ चुकी हैं किंतु अब दोनो पक्षों ने परस्पर सहकारिता की बात को सार्वजनिक रूप में स्वीकार किया है।  इस बारे में ज़ायोनी शासन के पूर्व युद्धमंत्री मूशे यालून का कहना है कि यह कोई संयोग नहीं है कि सऊदी अरब के विदेशमंत्री आदिल अलजुबैर अब हमारी भाषा में बोल रहे हैं।  सऊदी अरब और ज़ायोनी शासन के बीच संबन्धों की बात एसी स्थिति में सार्वजनिक हुई है कि जब सऊदी अरब स्वयं को फ़िलिस्तीनियों का समर्थक तथा ज़ायोनी शासन का विरोधी बताता रहा है।  विशेष बात यह है कि यहूदी और मुनाफ़िक़ या मिथ्याचारी, इस्लाम के आरंभिक काल से ही इस्लाम और मुसलमानों के शत्रु रहे हैं।  इन्होंने संयुक्त रूप में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के विरुद्ध कई षडयंत्र रचे थे।

दूसरी ओर सऊदी, जो इस्लामी गणतंत्र ईरान को अपने मार्ग की सबसे बड़ी बाधा समझते हैं, उन्होंने ईरान से दुश्मनी कर ली है।  इस काम के लिए वह ज़ायोनी शासन और अमरीका के साथ सहयोग कर रहा है।  सऊदी अरब ने लाखों डालर ख़र्च करके क्षेत्र के कुछ रूढ़ीवादी अरब देशों को अपने पक्ष में कर लिया है।  सऊदी अरब की यह एसी शत्रुतापूर्ण नीति है जिससे इस्लामी जगत को बहुत नुक़सान हुआ है।  बहरहाल यह बात निश्चित रूप में कही जा सकती है कि इस समय इस्लामी एकता का सबसे बड़ा शत्रु आले सऊद है।  वे वैसे ही काम कर रहे हैं जैसे काम इस्लाम के विरुद्ध मुनाफ़ेक़ीन करते आए हैं।

इन बातों से पता चलता है कि इस्लामी एकता के बाहरी शत्रु तो मुसलमानों के लिए पूरी तरह से स्पष्ट हैं लेकिन मुसलमानों के बीच छिपे बैठे उन शत्रुओं का पता लगाना बहुत कठिन है जो इस्लाम की पोशाक में मुसलमानों को धोखा दे रहे हैं।  एसे लोगों का मुक़ाबला इसलिए कठिन है क्योंकि वे अपने आपको मुसलमान दिखाते हैं किंतु वास्तव में वे इस्लाम विरोधी होते हैं।  एसे ही लोगों के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) कहते हैं कि मैं अपनी उम्मत के लिए मुनाफ़िकों से डरता हूं कि क्योंकि वे तुम्हारी आस्था के अनुसार बात करते हैं किंतु काम, तुम्हारी आस्था के विरुद्ध करते हैं।सलमान दिखाते हैं किंतु वास्तव में वे इस्लाम विरोधी होते हैं।  एसे ही लोग 

 

Dec ०२, २०१७ १७:१६ Asia/Kolkata
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