पहली फ़रवरी वर्ष 1979 की सुबह ईरानी जनता के लिए जहां आशा की किरण बिखेर रही थी वहीं साथ में जनता चिंतित भी थी।

वह लगभग 14 साल बाद अपने लोकप्रिय व हमदर्द नेता इमाम ख़ुमैनी के आगमन पर पलकें बिछाए हुए थी क्योंकि इमाम ख़ुमैनी को अत्याचारी शाही सरकार ने देश निकाला दे दिया था। शाही सरकार ने इमाम ख़ुमैनी के आने से पहले ही यह अफ़वाह फैला दी थी कि वह इमाम ख़ुमैनी को लाने वाले जहाज़ पर हमला कर देगी और यही कारण था कि इस देश की जनता बहुत अधिक चिंतित थी, अलबत्ता जनता के भय व क्रोध के कारण प्रशासन में इस काम का साहस पैदा नहीं हो सका। इमाम ख़ुमैनी का हवाई जहाज़ तेहरान हवाई अड्डे पर उतरा और जनता ने अपने प्रिय नेता का भव्य स्वागत किया। स्वदेश लौटते ही ईरानी जनता में ख़ुशियों की लहर दौड़ गयी और इस प्रकार ईरान के इतिहास एक ऐसी अंगड़ाई ली जो हमेशा के लिए इतिहास का भाग बन गयी। यह चीज़ शाही सरकार के पतन की भूमिका बनी और दो सप्ताह के भीतर शाही सरकार ताश के पत्तों की तरह बिखर कर रह गयी।

 

इमाम ख़ुमैनी के दिल में हमेशा उच्च इस्लामी व मानवीय आकांक्षाएं होती थीं जिसको व्यवहारिक बनाने के लिए उन्होंने बहुत अधिक प्रयास किए। स्वतंत्रता, स्वाधीनता, न्याय, अत्याचार से संघर्ष, भाईचारे जैसी उनकी आकांक्षाएं थीं किन्तु यह कहा जा सकता है कि ईरानी राष्ट्र और दुनिया के समस्त मुसलमानों के लिए उनका सबसे बड़ा तोहफ़ा, विलायते फ़क़ीह पर आधारित इस्लामी सरकार के गठन की उनकी योजना थी। अलबत्ता इस्लामी सरकार के गठन का विषय, सदियों शिया और सुन्नी मुसलामनों में चर्चा का विषय रहा है किन्तु इमाम ख़ुमैनी की यह कला थी कि उन्होंने इस विषय को स्वतंत्र और मज़बूत आधार के साथ पेश किया और इसको तर्क और हदीसों के आधार पर विस्तार से बयान किया है। उन्होंने यह काम इस्लामी क्रांति की सफलता के वर्षों पहले ही शुरु कर दिया था और इसका मुंह बोलता प्रमाण विलायते फ़क़ीह नामक पुस्तक है। इन किताब में इस्लाम के बेहतरीन सिद्धांत को बहुत ही अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

विलायते फ़क़ीह की सादे शब्दों में परिभाषा यह है कि उस धर्मगुरु या धर्मशास्त्री द्वारा इस्लामी समाज का संचालन जिसमें समस्त शर्तें पायी जाती हों क्योंकि वरिष्ठ धर्मगुरु या वलीए फ़क़ीह को हज़रत इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम के आंखों से ओझल होने के काल में उनका उतराधिकारी समझा जाता है। इमाम ख़ुमैनी ने अपनी किताबों और भाषणों में मज़बूत तर्क द्वारा विलायत फ़क़ीह को सिद्ध किया है।

इस बारे में विभिन्न रिवायतें मौजूद हैं। पैग़म्बरे इस्लाम ने धर्मगुरुओं को अपना ख़लीफ़ा और ईश्वरीय दूतों का वारिस बताया है जबकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ही उन्हें लोगों का शासक बताया है। वे एक कथन में कहते हैं कि मुसलमानों पर इस्लाम और ईश्वर के आदेश के आधार पर अनिवार्य है कि अपने नेता की चाहे वह भ्रष्ट रहा हो या सदाचारी मृत्यु या हत्या के बाद, एक पवित्र, ईश्वर से डरने वाला और इस्लाम धर्म के नियमों को जानने वालों एक नेता को चुनने से पहले कुछ भी काम न करें, ताकि वह सार्वजनिक संपत्ति को एकत्रित करे और जुमे की नमाज़ और हज का आयोजन करे और लोगों द्वारा दिए जाने वाले दान को एकत्रित करे। इस आधार पर इस्लामी समाज के लिए एक योग्य नेता का चयन हर दूसरे कामों से पहले है। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम भी एक अन्य स्थान पर कहते हैं कि मामलों की ज़िम्मेदारियां, ईश्वरीय धर्मगुरुओं के हाथ में है, जो लोग ईश्वर की ओर से हराम और हलाल की गयी वस्तुओं पर अमीन अर्थात अमानतदार हैं। इमाम महदी अलैहिस्सलाम के हवाले से एक अन्य सपष्ट हदीस है जिसमें उन्होंने हदीसों को बयान करने वालों को और धर्मगुरुओं को आंखों से ओझल होने के काल में अपना उतराधिकारी बताया है। हदीस में आया है कि घटनाओं और समस्याओं के समय हमारी हदीसों को बयान करने वालों के पास जाओ कि वह तुम पर हमारा तर्क हैं और मैं ईश्वर की ओर से तर्क हूं। इस मूल्यवान हदीस के दृष्टिगत, घटनाओं और दिनचर्या के मामलों में उसका अनुसरण किया जाना चाहिए जो हदीसों और इस्लामी ज्ञानों से अवगत हो।

 

विलायते फ़क़ीह की आवश्यकता को सिद्ध करने के लिए कई कारण बयान किए हैं जिनको इमाम ख़ुमैनी ने अपनी पुस्तक में विस्तार से बयान किया है।

इन तर्कों में से एक यह है कि उस समाज में जिसमें अधिकतर मुसलमान रहते हैं और इस्लामी मूल्यों पर विश्वास रखते हों, स्वाभाविक सी बात है कि सत्ता इस्लामी सरकार की हो क्योंकि सामाजिक जीवन और लोगों और समाज की परिपूर्णता, ईश्वरीय क़ानूनों के क्रियान्वयन से ही संभव है और इस क़ानून को व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में लागू होना चाहिए। इस सरकार का नेतृत्व उस व्यक्ति को करना चाहिए  कि जो इस्लामी नियमों को अच्छी तरह से समझे, इस्लामी नियमों में अपना दृष्टिकोण रख सके, विशेषज्ञ हो, न्यायी और ईश्वरीय भय रखता हो। इस प्रकार का व्यक्ति ही वलीए फ़क़ीह है। इमाम ख़ुमैनी अपनी पुस्तक तहरीरुल वसीला में लिखते हैं कि इमाम महदी अलैहिस्लाम की अर्थात आंखों से ओझल होने के काल में, ऐसे धर्म गुरु जिनमें फ़त्वे देने और फ़ैसला करने की पूरी शर्तें पायी जाती हों इमाम की काल में राजनैतिक, सरकारी और दूसरे सभी मामलों के क्रियान्वयन में इमाम महदी के उतराधिकारी हैं।

इस्लामी शासक व वलीए फ़क़ीह की आवश्यकता के बारे में दूसरा तर्क भी पहले वाले जुड़ा हुआ है। इमाम ख़ुमैनी इस तर्क का विवरण देते हुए इस बिन्दु पर बल देते हैं कि इस्लाम, व्यक्तिगत आयाम के अलावा सामाजिक व राजनैतिक आयाम भी रखता है इसीलिए वलीए फ़क़ीह पर इस्लामी सरकार के गठन की ज़िम्मेदारी को अनिवार्य करता है। वे विलायती फ़क़ीह नामक पुस्तक में लिखते हैं कि जो भी इस्लामी की शिक्षाओं के बारे ज़रा सा ध्यान दे तो उसकी समझ में आ जाएगा कि इस बात से हटकर कि उपासना, इंसान और उसके रचियता के बीच एक ज़िम्मेदारी है, इन उपासनाओं में राजनैतिक और सामाजिक आयाम भी है जो उसके संसारिक मामलों से जुड़े हुए होते हैं। उपासनाओं को छोड़कर, महत्वपूर्ण आर्थिक, समाजिक और राजनैतिक मामले भी हैं जो यह समझाते हैं कि इस्लाम सिर्फ़ उपासना का धर्म नहीं है, बल्कि इस्लाम में एक न्यायप्रिय इस्लामी सरकार के गठन के लिए आर्थिक, दंडात्मक और दूसरे सभी क़ानून पाए जाते हैं। इमाम ख़ुमैनी इसी प्रकार न्याय, शिक्षा और इस्लामी प्रशिक्षण के विस्तार की आवश्यकता पर बल देते हुए सीमाओं की रक्षा, करों को एकत्रित करने, दंडात्मक क़ानून जारी रहने, व्यवस्था की रक्षा, बुराई से रोकना तथा भलाई का निमंत्रण देना जैसे मामलों की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि इन क़ानूनों का बाक़ी रहना, उस सरकार की मांग करती है जिसमें ईश्वरीय क़ानूनों की रक्षा की जाए और वह सरकार ईश्वरीय क़ानून लागू करने की ज़िम्मेदारी उठाए। निसंदेह इस प्रकार की सरकार का शासक ईश्वरीय भय रखने वाला वलीए फ़क़ीह और इस्लाम वेत्ता के अलावा कोई और नहीं हो सकता।

 

इमाम ख़ुमैनी की नज़र में विलायते फ़क़ीह के मामले को एक अन्य आयाम से भी सिद्ध किया जा सकता है। वह विलायते फ़क़ीह नामक पुस्तक में इस तर्क की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं कि हम विलायत पर विश्वास रखते हैं और यह भी मानते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम को अपना उतराधिकारी चुनना चाहिए था और उन्होंने चुना भी। बुद्धि इस बात को सुनिश्चित करती है कि ख़लीफ़ा निर्धारित करने के लिए सरकार का होना आवश्यक है। हमें ख़लीफ़ा की आवश्यकता है ताकि क़ानून लागू करें, क़ानून के लिए लागू करवाने वाले की आवश्यता होती है। पूरी दुनिया में इसी तरह है कि केवल क़ानून बनाने से किसी का लाभ नहीं होता और इंसान का कल्याण पूरा नहीं होता, तो परिणाम यह निकला कि क़ानून बनाने के बाद उसे लागू करवाने वाले की भी आवश्यकता होती है। इस आधार पर पवित्र क़ुरआन और हदीसों की शिक्षाएं और उसके आदेश विशेषकर सामाजिक व राजनैतिक मामले उस वक़्त तक मुसलमानों को कोई फ़ायदा नहीं पहुंचा सकते जबतक एक ज्ञानी व न्यायप्रिय शासक, लोगों के कल्याण के लिए इन क़ानूनों को लागू करे। इमाम ख़ुमैनी बयान करते हैं कि अल्लाह ने कुछ क़ानून बनाकर हमारे लिए भेजा और उसे एक सरकार, एक लागू करने वाली संस्था की परिधि में लागू करवाया। इससे परिणाम यह निकाला जा सकता है कि जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) पर ईश्वरीय नियम लागू करने और इस्लामी सरकार के गठन की ज़िम्मेदारी थी और ईश्वर ने उन्हें मुसलमानों का शासक और प्रमुख बनाया था उसी तरह वरिष्ठ धर्मगुरू को चाहिए कि क़ानून लागू करने पर नज़र रखें और सामाजिक व्यवस्था लागू करे।

 

यह जानना बहुत ज़रूरी है कि हर धर्म गुरु समाज का नेतृत्व नहीं कर सकता और जैसा कि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने हदीस में बयान किया कि वह धर्मगुरु और फ़क़ीह जो ईश्वरीय भय रखता हो, धर्म की रक्षा करता हो, आंतरिक इच्छाओं का विरोधी हो और ईश्वरीय आदेश पर प्रतिबद्ध हो तो आम लोगों को चाहिए कि उसका अनुसरण करें। इमाम ख़ुमैनी ने भी इस्लामी समाज के नेतृत्व के लिए वलीए फ़क़ीह और धर्मगुरु के लिए कुछ शर्तें रखी हैं जिनमें इस्लामी शिक्षाओं और नियमों से पूरी तरह अवगत होना, न्यायप्रिय होना और ईश्वरीय भय रखना इत्यादि शामिल है। इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि चूंकि इस्लामी सरकार, एक क़ानूनी सरकार बल्कि एक ईश्वरीय सरकार है तो शासक को चाहिए कि उसके पास दो गुण हों, और यह दो गुण इस्लामी सरकार के आधार हैं, इनके बिना इस्लामी सरकार का कोई औचित्य नहीं है, इनमें से एक इस्लामी नियमों की भरपूर जानकारी होना और दूसरा न्याय है। इमाम ख़ुमैनी वलीए फ़क़ीह की कुछ अन्य शर्तों के बारे में कहते हैं कि वह व्यक्ति जो मुसलमानों के मामलों वली, वलीए फ़क़ीह और इमाम अमरल मोमेनीन अलैहिस्सला का उतराधिकारी बनना चाहता है तो उसे चाहिए कि वह सबकुछ छोड़ दे, दुनिया की मोहमाया न हो, उसमें इस्लामी सरकार के संचालन की क्षमता और योग्यता पायी जानी चाहिए। वह कहते है कि इमाम महदी के आंखों से ओझल होने के काल में इस्लामी गणतंत्र ईरान में विलायते फ़क़ीह की ज़िम्मेदारी, ईश्वरीय भय रखने वाले न्यायप्रिय फ़क़ीह की ज़िम्मेदारी है, वह अपने ज़माने का सबसे समझदार व्यक्ति हो, साहसी हो और कुशल प्रबंधक हो।

वलीए फ़क़ीह के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि यदि इन शर्तों में से कोई एक उसमें समाप्त हो जाए तो यह स्थान स्वयं ही उसके हाथ से निकल जाएगा। इमाम ख़ुमैनी कहते है कि वलीए फ़क़ीह में पाई जाने वाली विशेषताओं के साथ वह एक क़दम भी ग़लत नहीं उठा सकता, यदि उसने हल्का सा भी झूठ बोल दिया, एक शब्द, एक क़दम क़ानून के विरुद्ध उठाए, तो वह दूसरों पर विलायत के हक़ को खो देगा।

 

Feb ०३, २०१८ १७:२० Asia/Kolkata
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