सन 1979 में ईरान में जो इस्लामी क्रांति सफल हुई वह वास्तव में इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित थी।

ईरान की जनता ने स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के मार्गदर्शन में यह बात भलिभांति समझ ली थी कि इस्लामी शिक्षाओं का अनुसरण, लोक-परलोक की सफलता का सर्वोत्तम मार्ग है।  यही कारण है कि इस क्रांति का नाम इस्लामी क्रांति पड़ा।  यह वह क्रांति है जो इस्लामी आकांक्षाओं को पूरा करने वाली है।  इस्लामी आकांक्षाओं में से एक, अत्याचार के मुक़ाबले में डट जाना है दूसरे शब्दों में अत्याचार, वर्चस्व या साम्राज्यवाद का मुक़ाबला। साम्राज्यवाद से मुक़ाबला वास्तव में हर प्रकार के अत्याचार का मुक़ाबला है।  यह इस्लाम की एक विशेषता है।  इस्लाम स्पष्ट शब्दों में अपने अनुयाइयों को अत्याचार करने से रोकता है।  साथ ही वह किसी भी स्थिति में अत्याचार सहन करने से भी मना करता है।  इस्लाम का कहना है कि लोगों को किसी भी स्थिति में अत्याचार के सामने झुकना नहीं चाहिए।  इस बारे में ईरान की इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि न तो हम किसी पर अत्याचार करेंगे और न ही अत्याचार सहन करेंगे।

 

जब इस्लाम किसी भी स्थिति में दूसरों पर अत्याचार को पसंद नहीं करता तो स्वभाविक सी बात है कि वह किसी भी हालत में साम्राज्यवाद का समर्न नहीं करेगा।  साम्राज्यवाद एसी विचारधारा है जिसमें कोई महत्वाकांक्षी देश या राष्ट्र अपनी शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से अन्य देशों के संसाधनों पर क़ब्ज़ा कर लेता है और उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है।  उसका यह हस्तक्षेप राजनीतिक, आर्थिक या सांस्कृतिक कुछ भी हो सकता है।  वर्चस्व या वर्चस्ववाद एसा शब्द है जो क़ुरआन में भी देखने को मिलता है।  पवित्र क़ुरआन के हिसाब से पहला वर्चस्ववादी या साम्राज्यवादी, शैतान था।  शैतान ने ईश्वर के आदेश की अवहेलना करते हुए आदम का सजदा नहीं किया।  वह बहुत घमण्डी हो गया था।  क़ुरआन में क़ारून, फ़िरऔन और हामान तथा कुछ जातियों को साम्राज्यवादी कहा गया है।  ईश्वरीय कथनों में साम्राज्यवादियों की कड़े शब्दों में निंदा की गई है।  क़ुरआन में साम्राज्यवादियों की पहचान के बारे में कहा गया है कि वर्चस्ववादी एसे होते हैं जो ईश्वर की किसी भी निशानी को स्वीकार नहीं करते।  अगर वे मार्गदर्शन का रास्ता देख भी लेते हैं तो उसपर नहीं चलते।  एसे लोग जब पथभ्रष्टता के मार्ग को देखते हैं तो उसे अपना लेते हैं।  सूरए आराफ़ में ईश्वर कहता हैः मैं शीघ्र ही अपनी निशानियों की ओर से उन लोगों को मोड़ दूंगा जो अकारण धरती में अकड़ते फिरते हैं और ये लोग जिस निशानी को भी देख लें, ईमान लाने वाले नहीं हैं। ये लोग यदि मार्गदर्शन की राह देख लें तो भी उसे नही अपनाएंगे और यदि टेढ़ा (और पथभ्रष्टता का) मार्ग देख लें तो (तत्काल) उसे अपना लेंगे। यह इसलिए है कि इन्होंने हमारी निशानियों को झुठलाया और सदैव उनकी ओर से निश्चित रहे। (7:146)  क़ुरआन की बहुत सी आयतों में साम्राज्यवादियों को दर्दनाक दण्ड की सूचना दी गई है।

 

ईरान की इस्लामी क्रांति, साम्राज्यवादियों से मुक़ाबला करने के विचार पर आधारित है।  यही कारण है कि वर्चस्ववादी और साम्राज्यवादी, सदैव ही इस्लामी क्रांति के विरोधी रहे हैं।  ईरान के संविधान के 154वें अनुच्छेद में स्वावलंबन, स्वतंत्रता, न्याय और न्याय पर आधारित सरकार को सारे संसार के लोगों का अधिकार बताया गया है।  इस्लामी गणतंत्र ईरान, किसी भी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से बचते हुए संसार के हर क्षेत्र में वर्चस्ववादियों के विरुद्ध वंचितों के प्रतिरोध का समर्थन करता है।  वर्तमान समय में विश्व में साम्राज्यवादियों का खुला उदाहरण अमरीकी सरकार है।  इस बारे में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि साम्राज्यवाद, पहले भी था और अब भी है।  इसका ढांचा हमेशा एक जैसा रहा है केवल समय व स्थान के हिसाब से इसकी शैलियां बदलती रही हैं।  वर्तमान समय में भी साम्राज्यवाद मौजूद है जिसका स्पष्ट उदाहरण अमरीका है।

ईरान की इस्लामी क्रांति की साम्राज्यवाद विरोधी नीति, इस्लामी शिक्षाओं से उद्दरित है।  पश्चिमी दुष्प्रचारों के बावजूद ईरान की इस्लामी क्रांति ने बहुत ही कम समय में विश्व के राष्ट्रों के बीच अपना स्थान बना लिया।  स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी और आयतुल्लाहि उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई जैसे नेताओं के मार्गदर्शनों ने अमरीकी वर्चस्व से मुक़ाबले के लिए पूरे विश्व विशेषकर पश्चिमी एशिया में वर्चस्ववाद विरोधी लहर पैदा कर दी।  यही कारण है कि फ़िलिस्तीन, लेबनान, इराक़, यमन, बहरैन और कुछ अन्य देशों में साम्राज्यवाद से मुक़ाबले की सोच उभरी।  इस विचार ने अमरीका और उसके घटकों विशेषकर ज़ायोनी शासन के वर्चस्व को चुनौती दी।

फ़िलिस्तीन में हमास और जेहादे इस्लामी जैसे प्रतिरोधी गुट सामने आए।  इन गुटों का मनना है कि अवैध ज़ायोनी शासन का मुक़ाबला ही उनकी मातृभूमि की स्वतंत्रता का एकमात्र मार्ग है।  पीएलओ के साथ ज़ायोनी शासन की तथाकथित शांति वार्ता ने सिद्ध कर दिया कि अवैध ज़ायोनी शासन कभी भी अपने वचनों के प्रति कटिबद्ध नहीं रहा है।  यह शासन सदा ही पूरे फ़िलिस्तीनी क्षेत्र को हड़पने के सपने देखता रहता है।  वर्तमान समय में अवैध ज़ायोनी शासन, बैतुल मुक़द्दस सहित पूरे फ़िलिस्तीन पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है।  अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए इस शासन ने बड़ी संख्या में फ़िलिस्तीनियों को शहीद और घायल किया है।

 

एसी परिस्थितियों में फ़िलिस्तीनियों ने अबतक ज़ायोनी शासन के विरुद्ध कई जनान्दोलन छेड़े।  इस समय में फ़िलिस्तीनियों के कई गुट, हर प्रकार की समस्याओं के बावजूद ज़ायोनी शासन का डटकर विरोध कर रहे हैं।  इस्लामी क्रांति अपने इस्लामी और मानवीय दायित्व के आधार पर फ़िलिस्तीनियों का समर्थन करता है।  यही वजह है कि फ़िलिस्तीन के इस्लामी प्रतिरोध गुट हमास राजनीतिक कार्यालय के नेता इस्माईल हनिया ने ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के नाम अपने संदेश में ईरान की ओर से फ़िलिस्तीनियों के समर्थन पर आभार व्यक्त किया है।

वर्तमान समय में लेबनान का हिज़बुल्लाह संगठन, अवैध ज़ायोनी शासन के लिए दुःस्वपन बन चुका है।  हिज़बुल्लाह, मध्यपूर्व में अमरीका की विस्तारवादी नीति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।  लेबनान का इस्लामी प्रतिरोध आन्दोलन हिज़बुल्लाह, ईरान की इस्लामी क्रांति की अत्याचार विरोधी विचारधारा से प्रभावित होकर सन 1981 में अस्तित्व में आया था।  हिज़बुल्लाह ने अपने संघर्ष के माध्यम से सन 2000 को लेबनान से ज़ायोनी शासन को खदेड़ दिया था।  इसके बाद सन 2006 में 33 दिवसीय युद्ध के दौरान हिज़बुल्लाह ने ज़ायोनी शासन को फिर पराजय का स्वाद चखाया।  हिज़बुल्लाह, जिसे ईरान का मानवीय और वित्तीय समर्थन प्राप्त रहा है, क्षेत्र के अत्याचारग्रस्त राष्ट्रों के लिए अब एक आदर्श के रूप में उभरा है।  लेबनान के परिवर्तनों में हिज़बुल्लाह की बड़ी भूमिका रही है।  हिज़बुल्लाह ने अमरीका और सऊदी अरब का समर्थन प्राप्त आतंकवादी गुट दाइश को सीरिया से निकाल बाहर करने में महत्वूपर्ण भूमिका निभाई है।

इराक़ में भी एसे कई व्यक्ति और गुट सक्रिय हैं जो ईरान की इस्लामी क्रांति की साम्राज्यवादी विरोधी नीति से प्रभावित हैं।  यह गुट, पूरी शक्ति के साथ साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्षरत हैं।  इन लोगों में शहीद बाक़िर सद्र और उनकी बहन बिनतुल हुदा शामिल रहे हैं।  इन महान लोगों ने सद्दाम के विरुद्ध संघर्ष में बड़ी अहम भूमिका निभाई थी।  इराक़ के स्वयंसेवी बल जो हश्दुश्शाबी के नाम से प्रसिद्ध हैं, आतंकवादी गुट दाइश के विरुद्ध बड़ी मज़बूती से युद्ध कर रहे हैं।

कुछ एसे राष्ट्र भी हैं जिनकी ईरान तक सीधी पहुंच नहीं है किंतु वे ईरान की इस्लामी आकांक्षाओं से प्रेरित हैं।  इन्ही राष्ट्रों में से एक बहरैनी जनता है।  बहरैन वासी लंबे समय से अपने देश की राजशाही व्यवस्था से बहरैन में लोकतंत्र स्थापित करने की मांग कर रहे हैं।  वहां की राजशाही व्यवस्था अपने देश के नागरिकों की मांग को अनेदखा करते हुए उनका दमन कर रही है।  इस तानाशाही व्यवस्था का अमरीका और सऊदी अरब की ओर से खुलकर समर्थन किया जा रहा है।  बहरैन की जनता, आंतरिक और बाहरी दबावों के बावजूद लंबे समय से साम्राज्यवाद का मुक़ाबला कर रही है।  इस मार्ग में उसने बहुत क़ुर्बानियां दी हैं।

 

संसार में पाए जाने वाले राष्ट्रों में से एक राष्ट्र और भी है जो ईरान की साम्राज्यवाद विरोधी नीतियों से बहुत प्रभावित है।  इस राष्ट्र ने ईरान को अपना आदर्श बनाया है।  नाना प्रकार की समस्याओं का मुक़ाबला करने के बावजूद यमनी राष्ट्र, कई वर्षों से अत्याचारों का मुक़ाबला कर रहा है।  यमनवासी लगभग तीन ाले राष्ट्रों में से एक राष्ट्र और भी है जो ईरान की साम्राज्यवाद विरोधी नीतियों से बहुत प्रभावित है।  इस राषवर्षों से आधुनिक शस्त्रों से संपन्न सऊदी हमलों का मुक़ाबला कर रहे हैं जिसे अमरीका का खुला समर्थन प्राप्त है।  भारी क्षति उठाने के बावजूद उनके प्रतिरोध में कोई भी कमी नहीं आई है।  इस अत्याचारग्रस्त राष्ट्र ने बहुत से अवसरों पर सऊदी अरब को भारी क्षति पहुंचाई है।  यह एसी स्थिति में है कि सऊदी अरब ने यमन का पूरी तरह से परिवेष्टन कर रखा है और वह यमन के लिए खाद्य पदार्थों और दवाओं की आपूर्ति को भी रोके हुए है।

विश्व के जिन राष्ट्रों ने ईरान को अपना आदर्श बनाया है उनमे और ईरान में कुछ बातें समान हैं।  एक बात तो यह है कि जैसे ईरान में जनता पर भरोसा किया जाता है वैसे ही यह राष्ट्र अपनी जनता पर भरोसा करके क़दम उठाते हैं।  इन राष्ट्रों ने भी ईरान की ही भांति साम्रजाज्यवाद से मुक़ाबले में तन, मन, धन सबकी बाज़ी लगाकर वे अमरीका, ब्रिटेन, आल सऊद और ज़ायोनी शासन जैसे साम्राज्यवादियों के मुक़ाबले में डटे हुए हैं।  यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि साम्राज्यवादियों से मुक़ाबला करने वालों का भविष्य बहुत ही उज्जवल है।  इस बारे में पवित्र क़ुरआन के सूरे फ़ुस्सेलत में मिलता है कि जिन लोगों ने कहा कि "हमारा पालनहार रब अल्लाह है और फिर वे इसपर दृढ़तापूर्वक जमे रहे, उनपर फ़रिश्ते उतरते है कि न डरो और न शोकाकुल हो, और उस जन्नत की शुभ सूचना लो जिसका तुमसे वादा किया गया है।

 

Feb ०४, २०१८ १३:३९ Asia/Kolkata
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