इस्लामी क्रांति ने राष्ट्रीय आत्म विश्वास में क्या भूमिका अदा की और इस आत्मनिर्भरता तथा आत्म विश्वास ने ईरानी राष्ट्र को क्या क्या उपलब्धियां दीं?

इस कार्यक्रम के दौरान हम आपको बताएंगे कि ईरानी राष्ट्र की इस भावना ने विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति के मैदान में देश को कहां से कहां पहुंचा दिया।

 

वह टीकाकार जिन्होंने ईरान में इस्लामी क्रांति के अस्तित्व में आने के कारणों पर प्रकाश डाला है, उनका यह मानना है कि यह क्रांति अत्याचारी शासकों और विदेशी समर्थकों द्वारा अपने ऐतिहासिक अपमान पर जनता की प्रतिक्रिया थी। उनका यह मानना था कि पहलवी शासन काल में जनता का बहुत अधिक अपमान हुआ करता था। यही कारण था कि इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह की एक आवाज़ पर जो स्वाधीन और राष्ट्रीय आत्मविश्वास की आवाज़ थी, सबने सकारात्मक जवाब देकर इस्लामी क्रांति को अस्तित्व प्रदान किया। इस्लामी क्रांति का यह दृश्य, अपने राष्ट्रीय आत्मविश्वास पर ईमान और आस्था का परिणाम है, अलबत्ता वर्षों तक इस आत्मविश्वास को मज़बूत करने में इसी आस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। यदि इस्लामी क्रांति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी के बयानों पर नज़र डालें तो हमको बारंबार यह दिखाई देगा कि वे निरंतर इस आत्म विश्वास को मज़बूत करने पर बल देते रहे हैं। उदाहरण स्वरुप एक स्थान पर वे पहलवी शासन को नुक़सान पहुंचाने के बारे में कहते है कि महत्वपूर्ण यह है कि ईरानी यह समझें कि वह स्वयं ही यह काम कर सकते हैं? इस दौरान उसने जनता तक यह संदेश पहुंचाने का प्रयास किया कि ईरानी कुछ भी नहीं हैं, उन्हें हर चीज़ को विदेश से लाना होगा, यूरोप से लाना होगा, अमरीका से लाना होगा। इसका परिणाम यह निकला कि ईरान के क्रीम लोग बेकार हो गये और उन्हें काम करने का अवसर नहीं मिल रहा था। ईरान की अपनी जनता और जनशक्ति, किसी दूसरे से कम नहीं है बल्कि दूसरों से बहुत अधिक है किन्तु उन्होंने इन क्षमताओं से लाभ नहीं उठाया, उनको इन क्षमताओं से लाभ उठाते हुए सरकार और राष्ट्र के लिए फ़ायदा उठाना चाहिए था, उन लोगों से लाभ उठाना चाहिए था जो अविष्कार करते हैं, नई खोज करते हैं ताकि इंशा अल्लाह ईरान स्वयं ही सब कुछ बनता और स्वतंत्र होता।

आज इस्लामी क्रांति की सफलता को लगभग चालीस वर्ष बीतने के बाद राष्ट्रीय आत्मविश्वास और स्वयं की ओर पलटने का अर्थ जिसे क्रांति के आरंभ में नेताओं और बुद्धिजीवियों की ओर से पेश किया गया था, ईरानी जनता की सांस्कृतिक विशेषता या सिद्धांत में परिवर्तित हो चुका है। आज ईरानी जनता की नज़र में स्वाधीनता केवल एक लक्ष्य, उमंग और आदर्श ही नहीं बल्कि इससे बढ़कर मिठास यह है कि राष्ट्र से लाभ उठाया जाए और इसके प्रभाव ईरानी जनता के जीवन के समस्त क्षेत्रों में देखे जाएं। इस स्वाधीनता और आत्मविश्वास के सामने आने का एक महत्वपूर्ण मंच, वैज्ञानिक मंच रहा है। इस्लामी क्रांति ईरानी राष्ट्र की ऐतिहासिक मांगों में से एक का जवाब देने को तैयार थी अर्थात विकास और प्रगति की मांग। इस उपलब्धि का व्यवहारिक होना संभव नहीं था किन्तु यह कि देश के युवा और वैज्ञानिक स्वयं पर भरोसा करते हुए विज्ञान और तकनीक के मैदान में ज़बरदस्त छलांग लगाएं। इस्लामी क्रांति के संस्थापक और नेता के रूप में इमाम ख़ुमैनी वैज्ञानिक प्रगति और विकास को क्रांति का एक मुख्य लक्ष्य बताते हैं। उनका यह मानना था कि राजनैतिक, आर्थिक और वैचारिक स्वाधीनता के लक्ष्य को व्यवहारिक बनाने विशेषकर क्रांति के अन्य लक्ष्यों को समाज को ज्ञान व विज्ञान के हथियार से लैस किए बिना पूरा नहीं किया जा सकता।

 

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के वर्षों में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में प्रगति का एक आयाम, समाज से निरक्षरता को ख़त्म करना था। यही कारण था कि इस्लामी क्रांति की सफलता को अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि इमाम ख़ुमैनी ने सात दैय वर्ष 1358 हिजरी शम्स को एक आदेश में साक्षरता आंदोलन के गठन का आदेश दिया। उन्होंने एक इस आदेश में कहा था कि शर्म की बात है कि वह देश जो ज्ञान व साहित्य का पालना रहा हो, इस्लामी जीवन की छत्रछाया में जीवन व्यतीत कर रहा हो, ज्ञान की प्राप्ति को अनिवार्य समझता हो , वहां के कुछ लोग लिखने व पढ़ने से वंचित हों, हम को देश से जुड़े दीर्घावधि कार्यक्रम को स्वतंत्र और आत्मनिर्भर संस्कृतिक में बदलना होगा। समस्त निरक्षर लोगों को सीखने और समस्त पढ़े लिखे भाई बहनों को सिखाने के लिए उठ खड़े होना चाहिए। इस आंदोलन के शुरु होते ही समाज में निरक्षरता तेज़ी के साथ ख़त्म होने लगी और पढ़े लिखे और साक्षर लोगों की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। आंकड़ों के आधार पर वर्ष 1357 हिजरी शम्सी अर्थात क्रांति आने वाले वर्ष में देश की छह साल से ऊपर पचास प्रतिशत से अधिक आबादी अनपढ़ थी, अर्थात 52 प्रतिशत लोग अनपढ़ थे और देश में लगभग 48 प्रतिशत लोग ही पढ़े लिखे थे। अनपढ़ लोगों की यह संख्या इस्लामी क्रांति के बाद के वर्षों में 75 प्रतिशत बढ़ गया। इस्लामी क्रांति की सफलता के केवल दो दशक बाद ही अर्थात 1996 में 80 प्रतिशत जनता लिखने पढ़ने में सक्षम हो गयी जबकि 2016 में यह स्तर लगभग 90 प्रतिशत बढ़ गया।

इसके अलावा इस्लामी क्रांति ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की व्यापक उपस्थिति का मार्ग प्रशस्त किया। ईरान में जिन क्षेत्रों में महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही हैं वह शिक्षा और शोध का क्षेत्र है। यदि ईरान के इतिहास पर नज़र डालें तो समझ में आता है कि इस्लामी क्रांति की सफलता पहले के वर्षों में केवल 35 प्रतिशत महिलाएं ज्ञान व तकनीक की विभूति से संपन्न थीं जबकि क्रांति की सफलता के बाद यह संख्या 1996 में 75 प्रतिशत तक पहुंच गयी और वर्ष 2012 में यह संख्या बढ़कर 81 प्रतिशत हो गयी। बड़े ही गर्व से यह कहा जा सकता है कि आज इस्लामी क्रांति की सफलता की 39वीं वर्षगांठ के अवसर पर ईरानी महिलाएं ज्ञान के हथियार से लैस होकर समाज के विभिन्न क्षेत्रों और सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक मैदान में सक्रिय रूप से उपस्थित हैं और यह भी कहा जा सकता है कि महिलाओं ने कुछ क्षेत्रों में पुरुषों को भी पीछे छोड़ दिया है। वर्ष 1357 हिजरी शमस्ती के आंकड़ों के आधार पर देश में 50 हज़ार से कम छात्राएं थीं जबकि क्रांति की सफलता के बाद के पहले ही वर्ष में यह संख्या 5 लाख के बराबर हो गयी। अब यह संख्या लगभग बीस लाख तक पहुंच गयी है। उच्च स्तर पर लड़कियों के ज्ञान की प्राप्ति का इतना अधिक ख़्याल रखा जाता था कि पिछले कई वर्ष के दौरान, छात्राओं की संख्या छात्रों की संख्या से अधिक हो गयी। आज जो आंकड़ें हैं उनमें लगभग 56 प्रतिशत छात्राएं सरकारी स्कूलों में पढ़ती हैं।

 

इस्लामी क्रांति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी के स्वर्गवास के बाद राष्ट्रीय आत्म विश्वास को मज़बूत करने और इसके परिणाम में दुनिया में ईरान की वैज्ञानिक क्षमता को बढाने का क्रम इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने जारी रखा और पूरी शक्ति के साथ इसको बढ़ाया। वरिष्ठ नेता इस्लामी क्रांति की सफलता का एक राज़, पश्चिम पर निर्भरता के मुक़ाबले में ईरानी युवाओं के आत्मविश्वास की भावना को मज़बूत करना और युवाओं की क्षमताओं को निखारना बताते हैं। उनका मानना है कि इस्लाती क्रांति वैज्ञानिक निर्भरता की ज़ंजीर तोड़ने में सफल रही और उसने युवाओं के बीच आत्म विश्वास और आत्मनिर्भरता की भावना को मज़बूत किया है इसी चीज़ ने देश में वैज्ञानिक प्रगति और विकास की भूमिका प्रशस्त की। वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले तक युवाओं और दूसरों को विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को प्रकट करने की अनुमति नहीं दी जाती थी किन्तु क्रांति ने समाज में स्वाधीनता और आत्मविश्वास की शक्ति फूंक दी, इस्लामी क्रांति की सफलता देश को यह वैज्ञानिक प्रगति देने में सफल रही, इस चरण में हमारी वैज्ञानिक प्रगति पिछले 56 वर्षों के वैज्ञानिक विकास की तुलना में बहुत कठिन थी जब दुनिया के अधिकतर देश विभिन्न क्षेत्रों में वैज्ञानिक प्रगति कर रहे थे।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के नेतृत्व काल में देश की वैज्ञानिक नीतियां इस प्रकार बनाई गयीं कि देश का वैज्ञानिक विकास न केवल यह कि रुका नहीं बल्कि बहुत तेज़ी से आगे बढ़ा। आईएसआई वेबसाइट की ओर से पेश की गयी सूचना के आधार पर इस्लामी क्रांति की सफलता के पूर्व के 37 वर्षों के दौरान अर्थात 1940 से 1979 के वर्षों के बीच जब ईरान पर द्वितीय पहलवी का शासन था, ईरानी वैज्ञानिकों की ओर से केवल 2026 आर्टिकल, मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं और कांफ़्रेंसों में पेश किए गये या प्रकाशित हुए, यह ऐसी स्थिति में है कि इस अवधि में दुनिया ने विज्ञान के क्षेत्र में बहुत अधिक प्रगति की थी। इस अवधि में जारी होने वाले आंकड़ों के आधार पर विज्ञान के क्षेत्र में 80 लाख से अधिक वैज्ञानिक आर्टिकल पेश किए गये जिसमें ईरान की भागीदारी केवल दो हज़ार आर्टिकल तक ही थी अर्थात 0.3 प्रतिशत थी किन्तु इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद ईरान में वैज्ञानिक प्रगति में तेज़ी आई और यह संख्या बढ़कर 2 लाख 45 हज़ार वैज्ञानिक दस्तावेज़ तक हो गयी अर्थात दुनिया में वैज्ञानिक प्रगति में ईरान की भागीदारी 0.52 हो गयी। यह वैज्ञानिक विकास ऐसी स्थिति में है कि यह देश लगभग आठ वर्ष तक थोपे गये युद्ध का सामना करता रहा और देश में वैज्ञानिक प्रगति और शोध की गतिविधियों के लिए उचित माहौल नहीं था।

इसके अलावा यदि ईरान में वैज्ञानिक प्रगति और उसकी गुणवत्ता पर नज़र डालें तो इसमें काफ़ी परिवर्तन हुआ है। वैज्ञानिक गुणवत्ता, उसके स्टैंडर्ड के हिसाब से होती है। मौजूद आंकड़ों के आधार पर कुल मिलाकर पेश किए गये 2026 वैज्ञानिक दस्तावेज़ में से ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले तक केवल 1178 दस्तावेज़ और आलेख शामिल थे जबकि यह इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के वर्षों में यह संख्या 9 लाख 45 हज़ार दस्तावेज़ तक पहुंच गयी। दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के चार दशकों में ईरानी विज्ञान के उत्पादन में, क्रांति से पहले इसी अवधि के दौरान 800 गुना वृद्धि हुई है। ईरान ने विज्ञान तथा विभिन्न क्षेत्रों में यह ज़बरदस्त प्रगति ऐसी स्थिति में की है किउस पर भीषण राजनैतिक व आर्थिक दबाव तथा ग़ैर क़ानूनी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध लगे हुए थे और अमरीका के नेतृत्व में वर्चस्ववादी देश ईरान के विकास और उसकी प्रगति के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करते थे। इन सब बाधाओं और रुकावटों के बावजूद देश ने इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के चालीस वर्षों के दौरान विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में ज़बरदस्त प्रगति की और ईरान ने राष्ट्रीय आत्म निर्भरता पर भरोसा करते हुए प्रगति की नई चोटियों को सर किया और दुनिया के सामने एक अनुदाहरणीय मिसाल पेश कर दी। 

 

Feb ०४, २०१८ १७:२० Asia/Kolkata
कमेंट्स