ईरान में क्रांति की कला के नाम से जिन कलाओं को जाना जाता है उनमें से अधिकांश इस्लामी क्रांति से संबंधित हैं या फिर आठ वर्षों तक जारी रहने वाले पवित्र आत्मरक्षा के काल से संबंध रखती हैं लेकिन उनमें कुछ कलाएं और कलाकृतियां ऐसी भी हैं जो पूरे विश्व में मानव प्रेम या इस्लामी मूल्यों से संबंध रखती हैं।

इस प्रकार की कलाकृतियां वास्तव में ईरानी कलाकारों के राष्ट्रीयता से परे विचार और भाव को दर्शाती हैं।  

रमज़ान के पवित्र महीने के अंतिम शुक्रवार को " विश्व क़ुद्स दिवस" मनाया जाता है । इस दिन पूरी दुनिया में यहां तक कि गैर इस्लामी देशों में भी लोग, फ़िलिस्तीन पर इस्राईल के अवैध क़ब्ज़े के खिलाफ प्रदर्शन करते हैं। ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के कुछ ही महीनों बाद अर्थात अगस्त सन 1979 में, इस्लामी क्रांति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी ने अपने एक संदेश में, फ़िलिस्तीनी जनता के समर्थन पर बल देते हुए इस दिन को " विश्व क़ुद्स दिवस" घोषित किया था , जो अब पूरी दुनिया में दुश्मनों के सामने मुसलमानों की एकता का प्रतीक समझा जाता है लेकिन ईरान में इस दिन का महत्व मात्र एक विशेष दिन के रूप में नहीं है। ईरानी व इस्लामी शिक्षाओं के कारण, ईरानी जनता ने सदैव ही मानवता व मानवप्रेम और पीड़ितों की सहायता पर ध्यान दिया।

 

ईरानी कलाकार भी इस भावना से दूर नहीं रहे बल्कि वह दुनिया भर के पीड़ितों की सहायता में पहली पंक्ति में नज़र आते हैं। इन पीड़ितों की मदद के संदर्भ में कला की भाषा एक अत्यन्त प्रभावाशली साधन है क्योंकि इसे किसी सीमा से बांधा नहीं जा सकता। यही कारण है कि विश्व कुद्स दिवस को ध्यान में रख कर ईरान में बहुत सी कलाकृतियां अस्तित्व में आयीं जिनमें फिलिस्तीनियों की पीड़ा और इस्राईल के अपराधों का चित्रण किया गया है। ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद सिनेमा, नाटक, संगीत और चित्रकारिता तथा कविता व साहित्य में इसकी झलक पूरी तरह से देखी जा सकती है। इस प्रकार से ईरानी कलाकारों ने फिलिस्तीन लक्ष्य को अत्यन्त कलात्मक रूप में पेश किया है।

 

ईरान के प्रसिद्ध फिल्मकार, स्वर्गीय " सैफुल्लाह दाद" की फिल्म " बाज़मांदे" अर्थात, बचा हुआ वारिस,  फ़िलिस्तीन के विषय पर ईरान में बनने वाली अत्याधिक मशहूर फिल्म है जिसका पूरे इस्लामी जगत में व्यापक स्तर पर दर्शकों ने स्वागत किया। इस फिल्म की ज़बरस्त स्क्रिप्ट है जिसमें फ़िलिस्तीन के अतिग्रहण , ज़ायोनियों की निर्ममता और इतिहास को गढ़ने जैसे विषयों को बेहद सटीक रूप से पेश किया गया है। इसके अलावा भी ईरानी सेनेमा में फिलिस्तीनी जनता की पीड़ा, उनके संघर्ष और लेबनान में इस्लामी प्रतिरोध के विषय पर कई फिल्में बनी हैं जिनका व्यापक स्तर पर स्वागत हुआ है।

 

फिल्म के अलावा चित्रकारिता, ग्राफिक्स, पुतले और कार्टून बनाने की कला में भी मुसलमानों और विश्व के पीड़ियों की सहायता के विषय पर ध्यान दिया गया है और ईरानी कलाकार, इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद से अब तक इस विषय पर कलाकृतियां बनाने में व्यस्त हैं। उदाहरण स्वरूप " मुस्तफा नज़रलू" की रचना " सलाम बर क़ुद्स " यानी बैतुलमुक़द्दस को सलाम, उन कलाकृतियों में शामिल है जिन्हें बैतुलमुक़द्दस के अतिग्रहण की पीड़ा दर्शाने और फिलिस्तीनी जनता के साथ एकजुटता के प्रदर्शन के लिए बनाया गया है।" सलाम बर क़ुद्स " में कलाकार ने बैतुल मुकद्दस के फिलिस्तीनियों की सदैव की राजधानी होने के विषय को दर्शाया है । यह कलाकृति 100 बाई 100 सेन्टीमीटर की है और इसे बनाने में आयल पेन्ट का प्रयोग किया गया है। यह रचना इस्लामी क्रांति के तीसरे दशक से संबंधित है।

 

ईरानी कलाकारों ने विश्व भर के पीड़ितों के दुखों के चित्रण के लिए विश्व स्तर पर कलाकारों के मंच भी बनाए और विभिन्न अवसरों पर प्रदर्शनियों का आयोजन भी किया जाता है। उदाहरण स्वरूप हालिया वर्षों में " होलोकास्ट" के विषय पर कार्टून बनाने की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इस प्रतियोगिता का अतंराष्ट्रीय स्तर पर स्वागत किया गया। यह प्रतियोगिता " होलोकास्ट" के बारे में बहुत सी सच्चाइयो से पर्दा उठाने और विश्व वासियों को सच्चाई से अवगत कराने में सहायक रही है और इसी लिए इस प्रतियोगिता ने विश्व स्तर पर ज़ायोनियों और उनके समर्थकों के दिलों में भय व चिंता पैदा कर दी है और यही वजह है कि इस्राईली प्रधानमंत्री नेतिन्याहू ने इस प्रतियोगिता के बारे में कहा है कि ईरान से इस्राईल की समस्या केवल उसकी नीतियां नहीं बल्कि ईरान के मूल्य भी इस्राईल के लिए समस्या हैं। इस संदर्भ में हालिया प्रतियोगिता में विश्व के 50 देशों के कलाकारों की 845 कलाकृतियों को शामिल किया गया था।

 

वास्तव में इस्लमी क्रांति की कला के अर्थ पर हालिया वर्षों में बहुत अधिक ध्यान दिया गया यहां तक कि इस लिए विशेष दिवस, सप्ताह का नामंकन हुआ और इस सदंर्भ में सामारोहों और मेलों का भी आयोजन किया जाता है किंतु इसका सब से अधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य मनुष्य के प्रशिक्षण में सहायता है इस प्रकार से हम देखते हैं कि क्रांति की कला, वास्तव में ईश्वरीय दूतों के मिशन के आगे बढ़ाती है। इस प्रकार यदि समाज और मानवता के लिए कोई संघर्ष  करता है और अपना जीवन तक न्योछावर कर देता है तो वह निश्चित रूप से बहुत बड़ा कलाकार है। क्रांति की कला में इस अर्थ को अत्याधिक स्पष्ट रूप में पेश किया गया है।

 

 

इस्लामी गणतंत्र ईरान के संस्थापक इमाम खुमैनी ने 21 सितम्बर सन 1988 को अपने एक संदेश में कलाकारों और शहीदों के परिजनों के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए, शहीद होने वाले कलाकारों को सब से बड़े कलाकारों की संज्ञा दी। इस संदेश में जिसे" इस्लामी क्रांति की कला का घोषणापत्र " कहा जाता है, इस्लामी क्रांति के कलाकारों को उस राही की भांति बताया गया है जिसकी आंखों से सांसारिक पर्दे हट गये हैं और वह हर चीज़ को उसके असली रूप में देखने की क्षमता रखता है और कला द्वारा वह इन चीज़ों का वास्तविक रूप लोगों के सामने पेश करता हो।

 

 

ईरान में कला का इतिहास बहुत पुराना है और इसी तरह कला से जुड़ी परंपराएं भी पुराना इतिहास रखती हैं । इसके साथ ही ईरान में कला का अपना सिद्धान्त है जो इस्लामी क्रांति के बाद की कलाओं में भी स्पष्ट रूप से नज़र आता है और वह यह है कि कलाकार अपनी खुशी या अपनी तारीफ के लिए कलाकृति नहीं बनाता बल्कि किसी भी कला कृति का ऐसा होना ज़रूरी है जिसे देख कर दर्शक किसी उच्च विषय और संदेश तक पहुंच सके और उस कलाकृति में भौतिक इच्छाओं और सांसारिक मोहमाया को बढ़ावा न दिया गया हो। ईरानी कलाकारों की इस परंपरा और इस सिद्धान्त के कारण ही अधिकांश कलाकार, अपनी कलाकृतियों में ईश्वरीय मूल्यों और आध्यात्मिकता को ध्यान में रखते हैं और ईश्वर को प्रसन्न करना वास्तव में ईरानी कला का मूल्य मंत्र और सूत्र है और यही सच्ची भावना इस बात का कारण बनती है कि ईरानी कलाकारों की कलाकृतियों का प्रभाव दर्शकों के मन पर ज़्यादा गहरा पड़ता है। बहुत से ईरानी कलाकार तो अपनी कलाकृतियों में अपना नाम तक नही लिखते और कहते हैं कि यह कलाकृति ईश्वर के लिए और उसके दासों के लिए बनायी गयी है।

 

कुल मिलाकर इस्लामी क्रांति की कला के उद्देश्यों के बारे में यह कहा जा सकता है कि क्रांतिकारी कलाकार , अपनी आंतरिक इच्छाओं और मन के अनुसार कलाकृति नहीं बनाता क्योंकि इस दशा में वह वास्तव में अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति की दिशा में क़दम बढ़ाता है जो किसी भी रूप में क्रांति की कला से मेल नहीं खाता और इसी लिए इस प्रकार की कला का असर भी जाता रहता है। इस्लामी क्रांति की उपज कलाओं और कलाकारों को ऐसा होना चाहिए जिसमें अपने मन की इच्छाओं के अनुसरण और ईश्वरीय मूल्यों और आध्यात्मिकता के मध्य अंतर को ध्यान में रखा गया हो और भौतिकता व मन की इच्छाओं से दूर रहा कलाकृति की रचना की गयी हो। इन दोनों के बीच में मौजूद बारीक रेखा पर यदि ध्यान न दिया गया तो भले वर्षों की मेहनत के बाद कलाकृति तैयार हुई हो , निश्चित रूप से उस कलाकृति में स्थायित्व नहीं होगा और न ही उसे इस्लामी कला का नाम दिया जा सकता है।

Feb १०, २०१८ १६:०५ Asia/Kolkata
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