पैग़म्बरे इस्लाम का स्वर्गवास हुआ और उनके स्वर्गवास को कुछ महीने ही गुज़रे चुके थे लेकिन हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) का पिता से दूरी का दुख कम नहीं हो रहा था, वह अपने पिता के शोक में बीमार हो गयी थीं।

वे बड़ी व्याकुलता से उस दिन का इंतेज़ार कर रही थी जिसका वादा उनके पिता ने उनसे किया था। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपने स्वर्गवास के समय उनसे कहा था ः मेरी बेटी! मेरे बाद तू सब से पहले मुझ से मिलेगी। अपनी ज़िन्दगी की आखिरी रात में हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) ने ख्वाब में अपने पिता को देखा कि वे कह रहे हैंः मेरे पास आ जा मेरी बेटी मैं तुझे देखने के लिए बहुत बेचैन हूं। उनके जवाब में हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) ने कहा कि अल्लाह जानता है कि मैं आप से ज़्यादा बेचैन हूं। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने ख्वाब में ही हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) को बताया कि आज रात तुम मेरे पास आओगी। 

Image Caption

 

 

हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में अपने पति हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपने पास बुलाया, हज़रत अली की आंखों से आंसू जारी था इसी दशा में वह हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) के पास पहुंचे तो उन्होंने  हज़रत अली अलैहिस्सलाम से कहा ः मेरा जीवन बस कुछ ही क्षणों तक है, कुछ वसीयत करना चाहती हूं। हज़रत अली ने कहा ः जो दिल में है वह कह दो । यह कह कर हज़रत अली अलैहिस्सलाम, उनके सामने बैठ गये। हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) ने कहाः आप ने कभी मुझ से झूठ नहीं सुना और न ही बुराई देखी है और जब से मैंने आप के साथ संयुक्त जीवन आरंभ किया, आप की किसी बात का विरोध मैंने नहीं किया। हज़रत अली  ने कहाः ईश्वर की सौगंध, तुम्हें मुझ से अधिक पता है, तुम इससे कहीं बेहतर, ईश्वर से डरने वाली  महान व प्रतिबद्ध हो कि मैं तुम में कमी निकालूं, तुम से दूरी मेरे लिए बहुत भारी है, तुम्हें खो देना मेरे लिए एेसा दुख है कि उससे बड़ा, उससे अधिक पीड़ादायक और दुखदायी मेरे लिए कोई दुख नहीं है। ईश्वर की सौगंध ! यह एेसा दुख है कि जिसका शोक मनाने की ताक़त मुझ में नहीं रही और कोई भी चीज़ इसकी क्षतिपूर्ति नहीं कर सकती।  यह कहते-कहते हज़रत अली अलैहिस्सलाम की आंखें फिर छलक आयीं और फिर दोनों रोने लगे   फिर हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहाः फ़ातेमा जो कहना चाहती हो कहो मैं तुम्हारी हर बात का पालन करूंगा। हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) ने कहाः " जिन लोगों ने मेरे साथ अन्याय किया है और मेरे अधिकारों का हनन किया है उन्हें मेरी जनाज़े पर मत आने देना, वह मेरे दुश्मन और पैग़म्बरे इस्लाम के दुश्मन हैं, वह मेरी नमाज़े मैयत में भी भाग न लें, ऐ अली जब रात को आंखें सो जाएं तब आप मुझे दफ़्न करिएगा।" 

 

मदीना नगर रात के अंधकार में डूबा था, हर तरफ सन्नाटा ऐसे पसरा था, मानो पूरा माहौल शोक मना रहा हो। हज़रत अली अकेले थे, बच्चे व्याकुल थे। हज़रत अली, हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) को उनकी आख़िरी मंज़िल तक पंहुचा रहे थे। अपने पिता के शोक में डूबी हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) ने बहुत अत्याचार सहन किये थे, बड़ा अन्याय देखा था और अब टूटी हुए पसलियों के साथ, अपने पिता के पास  जाने के लिए परलोक सिधार चुकी थीं । हज़रत अली उस महान हस्ती को रात के अंधकार में क़ब्र में दफ्न करने ले जा रहे थे जो पूरी दुनिया की महिलाओं के लिए आदर्श हैं। 

हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) पैग़म्बरे इस्लाम की वह बेटी थीं जिन्हें उनके पिता, मानवरूप में फरिश्ता कहा करते थे और कहतेः हे फातेमा! ईश्वर ने तुम्हें चुन लिया और उसने तुम्हें पवित्र बनाया, तुम्हें पूरी दुनिया की महिलाओं  पर वरीयता प्रदान की । इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि जो भी फ़ातेमा से श्रद्धा रखेगा वह स्वर्ग में मेरे साथ होगा और जो उनसे दुश्मनी रखेगा उसका ठिकाना नर्क है। इतिहास में लिखा है कि जब भी हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) अपने पिता के पास जाती थीं वह खड़े होकर उनका स्वागत करते, उनका माथा चूमते और उनका हाथ पकड़ कर उन्हें उस जगह बिठाते जहां वह खुद बैठे होते और जब भी किसी यात्रा से वापस आते तो सब से पहले अपनी बेटी के पास जाते और उनका गला चूमते और कहते कि मुझे फ़ातेमा से स्वर्ग की सुगंध महसूस होती है। इसी प्रकार यात्रा पर जाने से पहले पैग़म्बरे इस्लाम सब से अंत में अपनी बेटी से मिलते जब लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम से यह पूछा कि आप किसे सब से ज़्यादा चाहते हैं ?तो वे हमेशा यही जवाब देते, अपनी बेटी फ़ातेमा को। 

 

 

Feb २१, २०१८ १५:४६ Asia/Kolkata
कमेंट्स