पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों से श्रद्धा रखने वाले लोग आज दुनिया भर में हर्षो उल्लास में डूबे हुए हैं और हज़रत इमाम हुसैन के शुभ जन्म दिन का जश्न मना रहे हैं।

क्योंकि उन्होंने इमाम हुसैन के जीवन, उनके विचारों और आंदोलन से कुछ पाठ लिया है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का जीवन अंतरज्ञान, परिपूर्णता और मानवीय श्रेष्ठता का प्रतीक है। ख़ुशी के इस पावन अवसर पर हम आप सबको हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं।


 

सन चार हिजरी क़मरी के शअबान महीने की तीन तारीख़ को हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का घर ज्योति से भर गया और पैग़म्बरे इस्लाम का मन मस्तिष्क भी विशेष उल्लास से झूम उठा। यह इमाम हुसैन के जन्म का दिन था। इस दिन इमाम हुसैन ने इस संसार में आंखें खोलीं। वह पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा सुझाए गए रास्ते के मार्गदर्शक थे। ईश्वर का एक कथन है कि ईश्वर ने इमाम हुसैन के जन्म के समय पैग़म्बरे इस्लाम से कहा कि बधाई हो उस हस्ती के आगमन की कि जिस पर मेरी विशेष कृपा होगी, बधाई हो आपको भी और सारी दुनिया के मुसलमानों को इस महान दिन की कि जिसमें हुसैन का जन्म हुआ जो अपने साथ आज़ादी, प्रेम और क़ुरबानी का पाठ लेकर आए।

 

किसी भी इंसान का मूल्य और महत्व उसके ज्ञान, विशेषताओं, गुणों और शिष्टाचार के आधार पर होता है। शारीरिक दृष्टि से भी लोगों में अंतर होता है लेकिर यह अंतर किसी की श्रेष्ठता का आधार नहीं बन सकता। लोगों के बीच श्रेष्ठता का पैमाना ज्ञान, विशेषता, गुण और शिष्टाचार है। इमाम हुसैन के अस्तित्व में यह सारी विशेषताएं अपनी चरम सीमा पर हैं। 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मानव इतिहास की अनुकरणीय हस्ती हैं। अद्वितीय त्याग, प्रतिरोध, सत्यप्रेम, ईश्वर पर आस्था, इच्छा शक्ति, साहस, और दृढ़ता जिसका परिचय इमाम हुसैन ने कर्बला में पेश किया वह इमाम हुसैन के अस्तित्व की सच्चाई का केवल एक भाग था। यही हलकी सी झलक एेसी है जिसने सबके दिलों को इस महान हस्ती की ओर आकर्षित कर दिया। 

हक़ीक़त यह है कि उनके अस्तित्व से जिस साहस और दृढ़ता का नज़ारा दिखाई दिया वह अदभुत था। यह गुण इस रूप में केवल उसी हस्ती के पास हो सकता है जो नैतिकता के चरम बिंदु पर हो। अर्थात ईमान, अंतरज्ञान, विश्वास और भरोसा उच्च स्तर पर होना चाहिए तभी कोई इंसान इस प्रकार की ईश्वरीय निशानियों का दर्पण बन सकता है।

इतिहास में मशहूर हस्तियों की कमी नहीं है। लेकिन हर इंसान किसी विशेष पहलू से मशहूर हुआ। कोई वीरता में, कोई बड़प्पन में, कोई त्याग में, कोई बलिदान में। मगर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अस्तित्व की महानता ऐसी थी कि जो समस्त महानताओं का स्रोत प्रतीत होती थी। यह बात नहीं भूलना चाहिए कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को शहीद करवा देने के साठ साल बाद तक बनी उमैया शासन ने हज़रत अली और हज़रत इमाम हुसैन के ख़िलाफ़ मिंबरों से लगातार बयान दिलवाए उन्हें गालियां दिलवाईं। उन पर सरकार के ख़िलाफ़ बग़ावत का इलज़ाम लगाया। इसके बावजूद कोई भी इस महान हस्ती की कोई त्रुटि खोज नहीं सका और न ही उनकी महानता पर सवालिया निशान लगा पाया।

लेबनान के मशहूर साहित्यकार व धर्मगुरु शैख़ अब्दुल्लाह अलाएली इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के व्यक्तित्व के बारे में कहते हैं कि हमारे पास इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बारे में जो इतिहास है उससे पता चलता है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम के पदचिन्हों पर चलना अपना पहला कर्तव्य समझते थे बल्कि वह हर पहलू से पैग़म्बरे इस्लाम का बेहतरीन नमूना थे। पैग़म्बरे इस्लाम की ही भांति उनका हर अमल और हर सोच ईश्वरीय थी। जेहाद के मैदान में वह ईश्वर के लि तलवार चलाते और त्याग की तसवीर बने रहते थे। कोई भी चीज़ उन्हें उनके कर्तव्यों के पालन से रोक नहीं सकती थी।

  

 

जितने भी धार्मिक सुधारक और ईश्वरीय दूत भेजे गए लक्ष्य पर गहरी आस्था उन सबकी सफलता का सबसे महत्वपूर्ण राहस्य था। जिस मार्गदर्शक को अपने लक्ष्य और मंज़िल पर पूरा भरोसा है वह पूरी संतुष्टि के साथ अपने मार्ग पर अग्रसर रहेगा। कभी ढिलाई नहीं बरतेगा। उसका ईमान उसे ऊर्जा और प्रेरणा देता रहता है। सूरए अनफ़ाल की आयत संख्या 2 में ईश्वर कहता है कि मोमिन तो केवल वही लोग हैं कि जब ईश्वर का नाम लिया जाता है तो उनके दिल ईश्वर की महानता के कारण कांपने लगते हैं और जब उनके सामने आयतों की तिलावत की जाती है तो उनके ईमान में वृद्धि होती है और वह केवल अपने पालनहार पर भरोसा करते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम भी चूंकि ठोस और गहरा ईमान रखते थे अतः विजय का लमहा हो या पराजय की घड़ी हमेशा उनके अस्तित्व पर विशेष सुकून छाया रहता था और वह अपने लक्ष्य के लिए प्रयासरत रहते थे। अपने मिशन और उसके लक्ष्य के बारे में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की स्थिति भी पैग़म्बरे इस्लाम जैसी थी। इमाम हुसैन यह मानते थे कि इस्लाम और मुसलमानों को बचाना है तो यज़ीद की बैअत से इंकार और बनी उमैया की साजिशों के ख़िलाफ संघर्ष ज़रूरी है। इसी लिए उन्होंने पूरी दूढ़ता के साथ यज़ीद की ख़िलाफ़त के विरोध की घोषणा कर दी। इमाम हुसैन ने अपने पूर्वजों केवल ईमान और धर्म के मार्ग में दृढ़ता का पाठ नहीं सीखा था बल्कि दुनिया की तकलीफ़ों को सहन करके ईश्वरीय ज्ञान के शिखर पर पहुंच गए थे। वह किसी पहाड़ की तरह अपने स्थान पर अडिग थे। ईश्वरीय ज्ञान और अंतरज्ञान के उस महान चरण पर वह पहुंच गए थे कि वहां पहुंचने के बाद उन्हें कर्बला जैसी बड़ी घटना की पीड़ा भी आसान लगती थी। रोचक बात यह है कि इमाम हुसैन की बहन हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने भी पहाड़ जैसे अनगिनत ज़ुल्म सहने के बाद भी यही कहा कि मैंने सुंदरता के अलावा कुछ देखा नहीं देखा। कूफ़ा के गवर्नर ने हज़रत ज़ैनब को निरुत्तर करने के लिए व्यंगपूर्ण स्वर में कहा था कि देखा ईश्वर ने तुम्हारे भाई के साथ क्या किया? हज़रत ज़ैनब ने फ़रमाया कि मैंने सुदंरता के अलावा कुछ नहीं देखा। कर्बला की घटना में बनी उमैया की दुष्टता और घृणापूर्ण हरकतें तो साफ़ ज़ाहिर हैं लेकिन दूसरी ओर इमाम हुसैन ने इस ज़ुल्म  के सामने जिस संयम का प्रदर्शन किया वह अपनी जगह पर इन हस्तियों के लिए बहुत सुंदर था।

वीरता एक श्रेष्ठ मानवीय विशेषता है। जिस राष्ट्र के लोगों में नैतिक साहस व वीरता न हो उस पर बड़ी आसानी से कोई आक्रमणकारी नियंत्रण प्राप्त कर लेता है। किसी भी देश का अस्तित्व और उसका गौरव वहां बसने वाले लोगों की वीरता के स्तर पर  निर्भर होता है। सुन्नी समुदाय के विख्यात लेखक इब्ने अबिल हदीद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की वीरता के बारे में लिखते हैं कि वीरता में इमाम हुसैन जैसा कौन है जिनके बारे में इतिहास कहता है कि कर्बला की घटना में उनपर बहुत बड़ी संख्या में शत्रु ने हमला कर दिया था उनके साथी और परिवार के लोग शहीद कर दिए गए थे लेकिन इसके बावजूद व किसी शेर की भांति लड़ रहे थे और दुशमनों की पंक्तियों को बार बार उलट देते थे। उस महान हस्ती के बारे में कोई क्या कह सकता है जिसने अपमान स्वीकार नहीं किया और बैअत के लिए हाथ नहीं बढ़ाया यहां तक कि शहीद हो गए। 

आत्मविश्वास भी सफल इंसानों की एक बड़ी विशेषता है। अल्लाह के ख़ास बंदे इस विशेषता में चरम बिंदु पर थे। आशूर के आंदोलन के वास्तुकार इमाम हुसैन के भीतर यह विशेषता बिल्कुल अदभुत रूप में थी। उनका आत्म विश्वास ऐसा था कि जब वह अपने मिशन पर  निकले तो इस्लामी जगत के अनेक विचारकों और आलोचकों की बातों का उनके इरादे पर कोई असर नहीं पड़ा जो ख़ामोशी से अपनी जगह बैठे रहने का सुझाव दे रहे थे। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का इमाम हुसैन का संकल्प और भी मज़बूत होता गया। आशूर का दिन आया तो इमाम हुसैन के पास मौत के गले लगाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। मरने से बचने का रास्ता केवल यह था कि इमाम हुसैन दुशमन की धर्म विरोधी मांगों के सामने झुक जाते। इन हालात में वह यज़ीदी सेना के कमांडर उमरे सअद की सेना के सामने खड़े हो गए और एक यादगार भाषण दिया। इस भाषण के एक भाग में इमाम हुसैन ने कहा कि हरगिज़ नहीं, मैं यह पस्ती स्वीकार नहीं कर सकता कि अपना हाथ बैअत के लिए बढ़ा दूं और दासों की तरह भागने का रास्ता नहीं खोजूंगा। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने मार्ग और लक्ष्य के प्रति इतना गहरा विश्वास रखते थे कि दुशमन पर विजय भी उन्हें उनके लक्ष्य से रोक नहीं सकती थी।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की उदारता की ख्याति चारों ओर थी और उनका उदाहरण दिया  जाता था। बहुत से लेखकों ने इस बिंदु का उल्लेख किया है कि दान व उदारता में कोई भी इमाम हुसैन जैसा नहीं था। इतिहास में है कि एक दिन इमाम हुसैन अपने घर में नमाज़ में लीन थे। एक बद्दू अरब जो ग़रीबी से तंंग आ चुका था मदीने पहुंचा और इमाम हुसैन के घर पहुंच कर उनका दरवाज़ा खटखटाया और कहा कि आज जो भी आशा लेकर आएगा और आपका दरवाज़ा खटखटाएगा वह निराश होकर नहीं लौटेगा। आप दानी तथा उदारता के स्रोत हैं। आपके पिता गुनहगारों को मारने वाले थे। इमाम हुसैन ने अपनी  नमाज़ ख़त्म की। अपने सेवक को बुलाया और उससे कहा कि हमारे घर के ख़र्च में कितना पैसा तुम्हारे पास बचा है? सेवक ने उत्तर दिया कि 200 दिरहम बाक़ी बचे हैं। जिसके बारे में आपने मुझे आदेश दिया है कि रिश्तेदारों को बांट दूं। इमाम ने कहा कि वह पैसा ले आओ। एेसा व्यक्ति आ गया है जो उनसे अधिक ज़रूरतमंद है। सेवक जाकर पैसे ले आाया। इमाम हुसैन ने वह पैसा लेकर ग़रीब आदमी को देे दिया और उत्तर दिया। 

यह पैसा मुझ से ले लो। मैं तुसमे माफ़ी चाहता हूं।  मैं तुमको चाहता हूं। तुमसे प्रेम करता हूं अगर मेरे पास और पैसे होते तो मैं और देता मगर मेरा हाथ ख़ाली है। ग़रीब बद्दू अरब पैसा लेते समय रोने लगा। इमाम हुसैन ने पूछा कि क्या जो मैने दिया वह कम है? उसने उत्तर दिया कि नहीं बल्कि इस लिए रो रहा हूं कि इतने दानी हाथ का मिट्टी के नीचे जाना कैसे सही है। 

 

Apr २१, २०१८ १२:५७ Asia/Kolkata
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