ईरानी राष्ट्र की क्रान्ति के इतिहास में 15 ख़ुर्दाद वर्ष 1342 को साम्राज्यवादी शक्तियों के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र की दृढ़ता में निर्णायक मोड़ समझा जाता है।

15 ख़ुर्दाद बराबर पांच जून की क्रान्तिकारी लहर दो दृष्टि से इतिहास बदलने वाली घटना है। पहली दृष्टि से यह क्रान्तिकारी लहर, ईरान के इतिहास के सबसे संकटमय दौर में शुरु हुयी और इस लहर ने यह दर्शा दिया कि ईरानी राष्ट्र अपने धार्मिक मूल्यों पर कटिबद्ध है और किसी को इस बात की इजाज़त नहीं देगा कि वह ईरान को अमरीका और इस्राईल के अवैध हितों की रक्षा की बेस बना दे।

दूसरी दृष्टि से 15 ख़ुर्दाद की लहर को धर्म और जनता के बीच अटूट संबंध का आरंभिक बिन्दु समझना चाहिए कि जहां से इस्लामी क्रान्ति की कोंपल फूटी, विकसित हुयी और सफल हुयी।

15 ख़ुर्दाद की क्रान्ति वास्तव में ईरान के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना का क्रम थी। यह घटना अगस्त 1953 में अमरीका-ब्रिटेन द्वारा समर्थित विद्रोह के समय से शुरु हुयी और इस बीच ईरान में अनेक अहम घटनाएं घटीं।

15 ख़ुर्दाद की क्रान्ति को मुहैया करने वाले तत्वों में एक वह विशेष विधेयक का पारित होना था जिसे लायहे अनजुमनहाए इयालती व विलायती कहते हैं। इसी तरह सफ़ेद क्रान्ति की आड़ में पेश होने वाले मामलों ने भी 15 ख़ुर्दाद की क्रान्ति का मार्ग समतल किया। सफ़ेद क्रान्ति के पीछे साम्रज्यवादी लक्ष्य छिपे थे जिसका जनता व धार्मिक ताक़तों ने विरोध किया।      

इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने 10 मोहर्रम बराबर 13 ख़ुर्दाद 1342 को क़ुम स्थित फ़ैज़िया मदरसे में एक ऐतिहासिक भाषण दिया जिसमें उन्होंने शाही शासन के वास्तविक चेहरे और अमरीकी लक्ष्यों का पर्दाफ़ाश किया। यह  ऐतिहासिक भाषण देने की वजह से इमाम ख़ुमैनी को गिरफ़्तार कर लिया गया। 15 ख़ुर्दाद 1342 बराबर 5 जून 1963 की सुबह शाह के तत्वों ने इस क्रान्ति की लहर को दबाने के लिए इमाम ख़ुमैनी को गिरफ़्तार करके तेहरान की एक जेल में क़ैद कर दिया। लेकिन जैसे ही उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर फैली तेहरान, क़ुम और दूसरे शहरों में जनता सड़कों पर निकल कर प्रदर्शन करने लगी।

इस क्रान्ति की लहर से ईरानी राष्ट्र में वर्चस्ववादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ने की भावना दुगुनी हुयी। 15 ख़ुर्दाद की क्रान्ति ने वास्तव में एक राजनैतिक आंदोलन के मुख्य स्वरूप की बुनियाद रखी।

इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने अपने उस मशहूर भाषण में जो उनकी गिरफ़्तारी और देशनिकाले की वजह बना, ईरान में अमरीका की हस्तक्षेपपूर्ण कार्यवाहियों और राजनैतिक लक्ष्यों तथा इस्राईल के साथ शाह के संबंध को चुनौती दी।

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के क्रान्तिकारी आंदोलन और इस क्रान्तिकारी आंदोलन के ख़िलाफ़ जल्दबाज़ी भरा व्यवहार, इस्लामी मूल्यों से ईरानी राष्ट्र के संबंध के मज़बूत होने में प्रभावी तत्व रहा। वास्तव में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की ज़बान से जो बातें क्षेत्र में अमरीका और इस्राईल के लक्ष्य तथा शाही शासन की प्रवृत्ति का पर्दाफ़ाश होने की वजह बनीं, वही बातें ईरानी राष्ट्र के क्रान्तिकारी आंदोलन के मज़बूत होने और अमरीका के हस्तक्षेपपूर्ण व्यवहार की वास्तविकता को पहचानने में भी प्रभावी बनीं। जैसा कि ईरानी राष्ट्र को अमरीका के हस्तक्षेपपूर्ण व्यवहार का 19 अगस्त 1953 के सैन्य विद्रोह में अनुभव हो चुका था।

इमाम ख़ुमैनी के व्यक्तित्व और साम्राज्य के ख़िलाफ़ उनकी दृढ़ता का उनके तुर्की की ओर देश निकाला दिए जाने के बाद के वर्षों से लेकर शाही शासन के ख़िलाफ़ ईरानी राष्ट्र के देशव्यापी आंदोलन के शुरु होने तक बहुत प्रभाव रहा। यह वह सच्चाई है जिसकी इमाम ख़ुमैनी ने इस्लामी क्रान्ति की सफलता से पहले भविष्यवाणी की थी और 15 ख़ुर्दाद की क्रान्ति को इस्लामी क्रान्ति के आरंभिक बिन्दु के रूप में याद किया था।         

दुनिया की क्रान्तियों के समीक्षकों की नज़र में इमाम ख़ुमैनी के राजनैतिक विचारों में विश्व व्यापकता है। इमाम ख़ुमैनी जनता पर भरोसे को सिद्धांत क़रार देते हुए राजनैतिक मंच पर उतरे और दुनिया के पीड़ित राष्ट्रों के मन में इस विचार को प्रबल किया कि कठिन से कठिन हालात में भी बड़ी से बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। इस क्रान्तिकारी विचार ने दुनिया की शक्तियों की वर्चस्ववादी नीतियों से संघर्ष में एक अमर क्रान्ति को जन्म दिया। 15 ख़ुर्दाद की क्रान्ति में राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक तत्वों का योगदान रहा और इन सभी तत्वों ने इस्लामी क्रान्ति की सफलता तक ईरानी राष्ट्र की दृढ़ता में निर्णायक रोल निभाया।

इमाम ख़ुमैनी की नज़र में साम्राज्य और अत्याचार के चंगुल से जनता को रिहाई दिलाना संघर्ष के मुख्य लक्ष्यों में था।

15 ख़ुर्दाद की क्रान्ति से साबित हुआ कि इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के राजनैतिक विचार में हुकूमत ऐसी हो जिसका शत प्रतिशत आधार राष्ट्र के मत पर टिका हो। इस तरह से की हर ईरानी व्यक्ति यह महसूस करे कि अपने मत से अपने और अपने देश के भविष्य का निर्माण कर रहा है।

इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैभ इस्लामी गणतंत्र व धार्मिक हुकूमत की परिभाषा में कहते हैंः "इस्लामी हुकूमत और अत्याचार एक साथ इकट्ठा नहीं हो सकते।"

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी इस्लामी हुकूमत के सिद्धांत में जनता की भूमिका पर बहुत बल देते थे और इसे इस्लामी गणतंत्र के मूल तत्वों में गिनवाते थे।

इमाम ख़ुमैनी ने अपने राजनैतिक विचारों को फैला कर इस्लामी समाज को एकान्त से बाहर निकाला और सत्य व न्याय की प्राप्ति के मार्ग में संघर्ष को अर्थपूर्ण बनाया। यही वजह है कि 15 ख़ुर्दाद की क्रान्ति दमनकारी कार्यवाहियों, इमाम ख़ुमैनी की गिरफ़्तारी और उनके देश निकाला दिए जाने तथा अमरीका के हस्तक्षेप से नहीं रुकी। इमाम ख़ुमैनी ने राजनैतिक संघर्ष के मैदान में यह दर्शा दिया कि विश्व शक्तियों के समर्थन के बिना, एक बड़े राजनैतिक बदलाव की पृष्ठिभूमि तय्यार की जा सकती है। इस बदलाव ने ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता का रास्ता समतल किया और दुनिया वालों को इस्लाम की राजनैतिक क्षमता व अपार शक्ति से पहचनवाया और क्रान्तिकारी मूल्यों को अमर बना दिया।

ईरान की इस्लामी क्रान्ति के स्थान को भी इन्हीं मूल्यों के आधार पर परखना चाहिए। इमाम ख़ुमैनी के राजनैतिक विचार से इस्लामी जगत के पीड़ित व वंचित राष्ट्रों में जागरुकता बढ़ी और उनमें संघर्ष के लिए ज़रूरी वीरता की भावना जागृत हुयी। इस महा आंदोलन ने क्रान्ति के मूल्यों को वैश्विक मूल्य में बदल दिया और दुनिया के पीड़ित राष्ट्रों के मन में वर्चस्ववादी व्यवस्था के मुक़ाबले में दृढ़ता से डुते जाने की उम्मीद पैदा की।      

इस विचार की छत्रछाया में इस्लामी क्रान्ति ने उस मार्ग पर चलते हुए जिसका ख़ाका इमाम ख़ुमैनी ने तैयार किया था, राष्ट्रों के अधिकारों की रक्षा को अपना लक्ष्य क़रार दिया और दुनिया की बहुत सी क्रान्तियों की तरह अपने मुख्य मार्ग से नहीं हटी तथा किसी भी हालत में दबावों व रुकावटों के बावजूद अपने मूल्यों व आकांक्षाओं से दूर नहीं हुयी। स्वर्गयीय इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह 15 ख़ुर्दाद के आंदोलन के बाद देशनिकाला के वर्षों में इसी अहम सिद्धांत पर बल देते थे। इसीलिए 15 ख़ुर्दाद के आंदोलन ने इससे बड़े बदलाव के हालात मुहैया किए।             

इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी के राजनैतिक विचार के आधार पर वजूद में आयी इस्लामी क्रान्ति और उसकी बहुआयामी सफलता से, पीड़ित जगत में साम्राज्यवादी शक्तियों के ख़िलाफ़ संघर्ष की उम्मीद पैदा हुयी और दुनिया में साम्राज्यवादियों के चंगुल से मुक्ति पाने वाले आंदोलनों को नई जान मिली। इमाम ख़ुमैनी ने अपने राजनैतिक विचारों से ईरानी राष्ट्र में आत्मविश्वास व आत्मसम्मान की भावना पैदा की और उसे पश्चिम के रंग में खोने से बचाया। आज यह सम्मान व प्रतिष्ठा 50 साल से ज़्यादा समय बीतने के बाद भी ईरानी राष्ट्र का आधार और विश्व साम्राज्य तथा वर्चस्ववादी शक्तियों के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र की सफलता की ज़मानत है।

 

 

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Jun ०३, २०१८ १५:५४ Asia/Kolkata
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