उस साल रमज़ान के पवित्र महीने में हज़रत अली अलैहिस्सलाम निरंतर अपनी शहादत की ख़बर दे रहे थे, यहां तक कि इस महीने के दूसरे हफ़्ते के किसी दिन जब वे मिम्बर पर थे, तो उन्होंने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा और कहाः सबसे दुर्भागी व्यक्ति मेरी दाढ़ी को मेरे सिर के ख़ून से रंगीन करेगा।

अपनी आयु के अंतिम दिनों में हज़रत अली अलैहिस्सलाम हर रात अपने बच्चों में से किसी एक के घर रुकते थे। एक रात वे अपने बेटे इमाम हसन, एक रात इमाम हुसैन, एक रात हज़रत ज़ैनब और एक रात हज़रत उम्मे कुलसूम के घर रुकते थे। वे किसी भी दिन इफ़्तार में तीन निवालों से अधिक नहीं खाते थे। जब उनसे इतना कम खाने का कारण पूछा गया तो उन्होंने कहाः ईश्वर का आदेश आने वाला है और मैं चाहता हूं कि उस समय मैं ख़ाली पेट रहूं, एक या दो रात से अधिक का समय नहीं बचा है।

जिस दिन भोर के समय उनके सिर पर तलवार मारी गई उस रात वे अपनी बेटी हज़रत उम्मे कुलसूम के मेहमान थे। उन्होंने इफ़्तार में तीन निवाले से अधिक नहीं खाए और फिर उपासना में लीन हो गए। पूरी रात वे व्याकुल रहे, कभी आसमान को देखते और कभी सितारों को निहारते। जैसे जैसे भोर का समय निकट आता जा रहा था, उनकी व्याकुलता बढ़ती जा रही थी। वे कह रहे थेः ईश्वर की सौगंध! न मैं झूठ बोल रहा हूं, न उसने झूठ कहा है जिसने मुझे ख़बर दी है। यह वही रात है जिसमें शहादत का मुझसे वादा किया गया है। कभी वे ईश्वर से क्षमा याचना करते और कभी क़ुरआने मजीद के सूरए यासीन की तिलावत करे। उस रात ईश्वर से उनकी दुआ व प्रार्थना का अंदाज़ बिलकुल अलग था। वे कह रहे थेः प्रभुवर! मौत को मेरे लिए मुबारक बना दे।

 

 

अंततः वह लम्बी रात अपने अंत को पहुंची और हज़रत अली अलैहिस्सलाम अंधेरे में ही फ़ज्र की नमाज़ के लिए मस्जिद की ओर रवाना हुए। हज़रत उम्मे कुलसूम के घर में जो बत्तख़ें पली हुई थीं वे उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगीं और उन्होंने अपनी चोंच से उनके वस्त्र पकड़ लिए। कुछ लोगों ने उन्हें छुड़ाना चाहा तो हज़रत अली ने कहाः उन्हें छोड़ दो कि वे विलाप कर रही हैं। इमाम हसन ने कहा कि पिता जी आप ये कैसी अशुभ बात कह रहे हैं? उन्होंने कहाः यह अशुभ बात नहीं है बल्कि मेरा दिल गवाही दे रहा है कि मैं मारा जाऊंगा। उनकी बेटी हज़रत उम्मे कुलसूम यह सुनकर बहुत चिंतित और व्याकुल हो गईं। उन्होंने कहा कि आप कह दीजिए कि कोई दूसरा व्यक्ति मस्जिद जा कर नमाज़ पढ़ा दे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहाः ईश्वर के अटल फ़ैसले कोई कोई टाल नहीं सकता। यह कह कर वे मस्जिद की ओर रवाना हो गए।

अभी फ़ज्र की नमाज़ का समय नहीं हुआ था और हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी अंतिम नाफ़िला नमाज़ें पढ़ रहे थे और प्रार्थनाएं कर रहे थे। अंततः वह समय भी आ ही गया जब इब्ने मुल्जिम नामक अत्यंत निर्दयी व्यक्ति ने ज़हर में बुझी हुई अपनी तलवार से उनके सिर पर वार किया जो उनकी पेशानी तक पहुंच गया। उस वार ने धर्म को हज़रत अली के अस्तित्व से वंचित कर दिया, मानवता को अपने बेजोड़ नेता के शोक में बिठा दिया और न्याय को अद्वितीय न्यायप्रेमी से दूर कर दिया।

 

अली अलैहिस्सलाम अब सारे झंझटों से मुक्त थे और अपने ईश्वर से मिलन के मुहाने पर पहुंच चुके थे। अत्याचारी लोगों की ओर से उनके लिए उत्पन्न की गई कठिनाइयों और दुखों से उन्हें मुक्ति मिलने वाली थी। उनसे जो वादा किया गया था, वह पूरा हो गया था। जैसे ही उनके सिर पर तलवार का वार लगा, उन्होंने सिर उठा कर आसमान को देखा और ऊंची आवाज़ में कहाः काबे के पालनहार की सौगंध! मैं सफल हो गया।

 

ईरान के महान विचारक शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी हज़रत अली की आयु के अंतिम समय के बारे में कहते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के जीवन का सबसे आश्चर्यजनक समय, लगभग 45 घंटे का है यानी उन्हें तलवार का वार लगने से उनकी शहादत के बीच का समय। हज़रत अली के संपूर्ण व परिपूर्ण मनुष्य होने की बात यहां अधिक स्पष्ट होती है। हज़रत अली के मानवीय चमत्कार और आश्चर्यजनक गुण यहीं प्रकट होते हैं। वे मौत के बिस्तर पर पड़े हुए हैं और हर क्षण उनकी स्थिति बिगड़ती जा रही है, विष उनके पवित्र शरीर पर प्रभाव डालता जा रहा है, उनके परिजन व साथी दुखी हैं, रो रहे हैं, चिल्ला रहे हैं लेकिन वे देखते हैं कि अली के होंटों पर मुस्कान है और वे कह रहे हैं। ईश्वर की राह में शहादत हमेशा से मेरी मनोकामना थी और मेरे लिए इससे बेहतर क्या हो सकता है कि मैं उपासना की स्थिति में शहीद हो जाऊं।

 

 

जब हम हज़रत अली अलैहिस्सलाम को देखते हैं तो आश्चर्यजनक ढंग से पाते हैं कि सभी उच्च मानवीय गुण उनमें एकत्रित हैं। यह स्थिति उनके कथनों और लेखों से पूरी तरह स्पष्ट है क्योंकि कथन, बोलने वाले के व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम का व्यक्तित्व न्याय, ईश्वर से प्रेम, लोगों से स्नेह, संयम, विनम्रता, पौरुष, साहस, वीरता, अपार ज्ञान, संचालन और इसी प्रकार के दसियों अन्य उच्च गुणों का प्रतिबिंबन है जो उन्हें एक साधारण इंसान से अलग करता है। हज़रत अली, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के समय में सेनापति और ध्वजवाहक के रूप में रणक्षेत्रों में उनके सबसे बड़े समर्थक थे और इसी तरह वे कूटनैतिक दायित्वों के पालन में भी उनके उनके राज़दारों में से एक थे और कई बार उनकी ओर से विभिन्न क्षेत्रों में गए थे।

 

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने स्वयं भी अनेक महान लोगों का प्रशिक्षण किया जिनमें उनकी संतान के अलावा मालिके अश्तर, इब्ने अब्बास और मुहम्मद इब्ने अबी बक्र जैसे लोग शामिल हैं। इस तरह से उन्होंने मानव इतिहास में न्याय की एक मज़बूत लहर पैदा की। उनमें करुणा और स्नेह भी इतना अधिक था कि वे हमेशा अनाथों और दरिद्रों की ओर से चिंतित रहते थे। वे रात के अंधेरे में उनके लिए खाना ले जाते, अनाथों को अपनी गोद में बिठाते और अपने हाथ से उन्हें खाना खिलाते थे ताकि उनके होंटों पर मुस्कान आ सके। इसी के साथ वे इतने साहसी भी थे कि जब उन्होंने देखा कि कुछ अधर्मी लोग निराधार बहानों से सरकार गिराना चाहते हैं और उन पर उपदेशों का कोई प्रभाव नहीं हो रहा है तो वे उनके साथ युद्ध के लिए भी तैयार हो गए।

 

सुन्नी मुसलमानों के प्रख्यात धर्मगुरू व बुद्धिजीवी इब्ने अबिल हदीद, जिन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ख़ुतबों, कथनों और पत्रों पर आधारित किताब नहजुल बलाग़ा की व्याख्या की है, कहते हैं। महानता, प्रतिष्ठा व प्रसिद्धि की दृष्टि से हज़रत अली का स्थान इतना ऊंचा है कि उसके बारे में बात करना निरर्थक है। मैं उस व्यक्ति के बारे में क्या कहूं कि जिसके दुश्मन भी उसकी महानता और गुणों का इन्कार नहीं कर सके और उन सभी ने उनके व्यक्तित्व की श्रेष्ठता के सामने सिर झुका दिए? मैं उस व्यक्ति के बारे में क्या कहूं जो सभी सद्गुणों का गंतव्य है और हर मत और हर गुट अपने आपको उससे जोड़ने की कोशिश करता है? जी हां वे सभी प्रतिष्ठाओं व सद्गुणों के सरदार हैं।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने ख़ुतबा दिया और ईश्वर का गुणगान करने व पैग़म्बर पर दुरूद भेजने के बाद कहा कि आज रात वह व्यक्ति शहीद हुआ जिसकी वास्तविकता तक उससे पहले वाले नहीं पहुंच सके और बाद में आने वाले भी उस जैसे किसी को नहीं देख पाएंगे। वह जब युद्ध करता था तो जिब्रईल उसके दाहिनी ओर और मीकाईल बाईं ओर रहते थे। ईश्वर की सौगंध! अली अलैहिस्सलाम उसी रात शहीद हुए हैं जिस रात हज़रत मूसा का निधन हुआ था, हज़रत ईसा को आकाश पर ले जाया गया था और क़ुरआन नाज़िल हुआ था। (HN)

 

Jun ०३, २०१८ १६:०५ Asia/Kolkata
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