ईरान की इस्लामी क्रान्ति और इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी पवित्र महीने रमज़ान के अंतिम जुमे को फ़िलिस्तीन की पीड़ित जनता के समर्थन के उद्देश्य से विश्व क़ुद्स दिवस घोषित कर दिया।

हम एक बार फिर विश्व क़ुदस दिवस मनाने जा रहे हैं जबकि इस समय हालात यह हैं कि गत तीन दशकों का यह सबसे महत्वपूर्ण क़ुद्स दिवस बन गया है।

वर्ष 2018 के क़ुद्स दिवस के असामान्य महत्व का कारण यह है कि ग़ज़्ज़ा पट्टी में लोग हालिया दशकों की सबसे कठिन और दयनीय परिस्थितियों में जीवन गुज़ार रहे हैं। ग़ज़्ज़ा पट्टी में ज़ायोनी शासन की ओर से की गई नाकाबंदी से संघर्ष के लिए बनी विशेष समिति ने अकतूबर 2017 में जो रिपोर्ट जारी की थी उसमें ग़ज़्ज़ा की मानवीय दुर्दशा को बयान किया था। रिपोर्ट के अनुसार ग़ज़्ज़ा पट्टी में 80 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन गुज़ार रही है। बेरोज़गारी की दर 50 प्रतिशत है और शिक्षित युवाओं में यह दर 60 प्रतिशत से अधिक है। औसतन प्रति व्यक्ति दैनिक आय 2 डालर है। बेरोज़गार हो जाने वाले कामगारों की संख्या ढाई लाख तक पहुंच चुकी है। पंद्रह लाख लोग कल्याणकारी संस्थाओं से मदद हासिल करके जीवन गुज़ार रहे हैं। 40 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। साढ़े पंद्रह हज़ार अनाथ बच्चे बहुत कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। 50 हज़ार लोग ज़ायोनी शासन के हमलों के नतीजे में जन्मजात अपंग हैं। ग़ज़्ज़ा में स्वास्थ की स्थिति ख़तरनाक दशा में पहुंच गई है और यह कहा जा सकता है कि जब से ग़ज़्ज़ा पट्टी का परिवेष्टन किया गया है उस समय से अब तक की यह सबसे कठिन परिस्थितियां हैं। 30 प्रतिशत दवाएं मौजूद नहीं हैं। 45 प्रतिशत चिकित्सा उपयोग का सामान नहीं है। 13 हजार लोग कैंसर से ग्रस्त है जिन्हें सघन चिकित्सा निगरानी की ज़रूरत है। हज़ारों नागरिक विशेष रूप से ग़रीब लोग असाध्य बीमारियों से जूझ रहे हैं।

वर्ष 2000 में ग़ज़्ज़ा पट्टी के 98 प्रतिशत लोगों को पीने का शुद्ध पानी प्राप्त था लेकिन वर्ष 2014 में केवल 14 प्रतिशत लोगों को ही पीने का शुद्ध जल मुहैया था। ग़ज़्ज़ा में बिजली की कमी भी एक बड़ी समस्या है। इस इलाक़े में केवल 4 से 6 घंटे ही बिजली रहती है। इसके अलावा ज़ाशोनी शासन की आपराधिक कार्यवाहियों के कारण ग़ज़्ज़ा वासी भारी मानसिक दबाव में भी रहते हैं। बच्चों पर इन परिस्थितियों का ख़ास तौर पर गहरा प्रतिकूल असर पड़ा है।

इन हालात में संयुक्त राष्ट्र संघ ने जुलाई 2017 में अपनी रिपोर्ट में बताया कि वर्ष 2020 तक ग़ज़्ज़ा रहने लायक़ नहीं रहेगा। जर्मनी की कोनराड आदनायर संस्था के विशेषज्ञ मार्क फ़्रैन्गस का जो ग़ज़्ज़ा की यात्रा करते रहते हैं, कहना है आज भी ग़ज़्ज़ा की जो हालत है उसमें वहां इंसानों का रहना ठीक नहीं है। फ़ैन्गस का कहना है कि ग़ज़्ज़ा पट्टी की यह हालत वर्षों से इस्राईल की ओर से इस इलाक़े की नाकाबंदी के कारण है। यह परिवेष्टन दस साल से जारी है और मिस्र भी इस मामले में इस्राईल का साथ दे रहा है। इस नाकाबंदी की वजह से ज़रूरत का सामान ग़ज़्ज़ा पट्टी नहीं पहुंच पाता। बड़ी कठिनाइयों से ही कोई चीज़ ग़ज़्जा जा पाती है। एमनेस्टी इंटरनैशनल के विशेषज्ञ उमर शकीर का कहना है कि इस्राईली नाकाबंदी ने ग़ज़्ज़ा पट्टी का इलाक़ा खुले छत वाली बड़ी जेल बनकर रह गया है। यह ग़ज़्ज़ा वासियों को सामूहिक रूप से दंडित करने की कार्यवाही है। शकीर का कहना है कि यह एक राजनैतिक हथकंडा भी है। इस्राईल इस तरह चाहता है कि फ़िलिस्तीनी संगठन हमास का पूरी तरह पतन हो जाए। मगर इस हथकंडे का कोई असर नहीं हुआ है और यह पूरी तरह ग़ैर क़ानूनी और अनैतिक है।

फ़िलिस्तीन के लोग विशेष रूप से ग़ज़्ज़ा वासी एसी हालत में इन कठिनाइयों से गुज़र रहे हैं कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प, इस्राईली प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू और सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान का त्रिकोण फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ लगातार अपना प्रहार तेज़ कर रहा है। अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने पूरी तरक एक पक्षीय कार्यवाही करते हुए एक ग़ैर ज़िम्मेदाराना और ग़ैर क़ानूनी क़दम उठाया। उन्होंने गत 14 मई को नकबा दिवस के अवसर पर अमरीकी दूतावास तेल अबीब से बैतुल मुक़द्दस स्थानान्तरित कर दिया। ट्रम्प का यह क़दम फ़िलिस्तीन में हिंसा की नई लहर उठने का कारण बना। मीडिया ने अमरीकी दूतावास के स्थानान्तरण से संबंधित कार्यक्रम की तसवीरें प्रकाशित कीं जिनमें ट्रम्प की बेटी इवान्का ट्रम्प ने अमरीकी दूतावास का उदघाटन किया। मीडिया कर्मियों ने सुर्खियां लगाईं ख़ून के हम्माम का उदघाटन।

ब्रिटिश समाचार पत्र गार्डियन ने अपनी एक रिपोर्ट में 14 मई की घटनाओं के बारे में लिखा कि केवल 14 मई को ही 60 से अधिक फ़िलिस्तीनी शहीद हो गए। मिस्र के अलअहराम अख़बार में छपने वाले लेख में जमाल ज़हरान ने लिखा कि अमरीकी दूतावास बैतुल मुक़द्दस स्थानान्तरित करने का फ़ैसला क्षेत्र में इस्लामी प्रतिरोधक मोर्चे से अमरीका को मिलने वाली पराजय का बदला लेने की कोशिश है लेकिन ट्रम्प के इस क़दम से इस्लामी प्रतिरोधक मोर्चे की दृढ़ता व संकल्प में और वृद्धि होगी। वरिष्ठ अरब लेखक अब्दुल बारी अतवान ने लिखा कि अमरीकी दूतावास का स्थानान्तरण वास्तव में अरब देशों को टटोलने के लिए था ताकि ईद से पहले अमरीका शताब्दी के समझौते को लागू कर सके।

अमरीका ने यह क़दम इस्राईल को सुरक्षा प्रदान करने के लिए उठाया है। शताब्दी के समझौते के नाम से अमरीका और इस्राईल जिस समझौते को थोपना चाहते हैं उसमें फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों की स्वदेश वापसी, फ़िलिस्तीन का बड़ा भाग इस्राईल को दे देने तथा फिलिस्तीनी प्रतिरोध को पूरी तरह ध्वस्त कर देने जैसी बातें हैं।

इस साल क़ुद्स दिवस एसे समय मनाया जा रहा है कि फ़िलिस्तीन और विशेष रूप से ग़ज़्ज़ा की जनता के ख़िलाफ़ नेतनयाहू सरकार के अत्याचार कई गुना बढ़ चुके हैं। इस्राईल ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प और कुछ अरब देशों की मदद से अंतर्राष्ट्रीय नियमों यहां तक कि सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का खुले आम उल्लंघन कर रहा है और फ़िलिस्तीनियों पर हमले करने में उसे कोई संकोच नहीं है। बमबारी, मिसाइल हमले और प्रदर्शनकारियों पर फ़ायरिंग की घटनाएं लगातार हो रही हैं। फ़िलिस्तीनियों ने 30 मार्च 2018 से वापसी मार्च शुरू कर दिया है। इन प्रदर्शनों का उद्देश्य निर्वासित फ़िलिस्तीनियों के अपनी धरती पर वापसी के अधिकार को जताना है। इस्राईल इन प्रदर्शनों को बड़ी निर्दयता से कुचल रहा है। 30 मार्च से मई के अंत तक 130 से अधिक फ़िलिस्तीनी ज़ायोनी सैनिकों के हाथों शहीद कर दिए गए और 12 हज़ार से अधिक घायल हुए। हैंडीकैप इंटरनैशनल नाम की एनजीओ ने जो अपंग लोगों के अधिकारों के लिए काम करती है, घोषणा की है कि 30 मार्च से अब तक 12 हज़ार से अधिक लोग घायल हुए हैं जिनमें 3 हज़ार से अधिक को गोली लगी है। इस संस्था ने डब्ल्यूएचओ के हवाले से बताया कि प्रभावितों में लगभग एक हज़ार लोग एसे हैं जिनके हैंडीकैप हो जाने का ख़तरा है।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान और सऊदी अरब के घटक देशों की नीतियों के कारण भी इस साल का क़ुद्स दिवस अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। मुहम्मद बिन सलमान ने मार्च 2018 में अमरीका की यात्रा की जिसके दौरान उन्होंने औपचारिक रूप से इस्राईल को स्वीकार कर लिया। उन्होंने इस्राईल के अत्याचारों के मुक़ाबले में फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों का बचाव करने के बजाए कहा कि इस्राईल को आत्म रक्षा का अधिकार है। बहरैन के विदेश मंत्री ने भी मई में मुहम्मद बिन सलमान की बात दोहराई और कहा कि इस्राईल को अपनी रक्षा की कार्यवाही करने का पूरा अधिकार है।

सच्चाई यह है कि सऊदी अरब और कुछ अन्य अरब देश इस्राईल से संबंध सामान्य करने के चरण से काफ़ी आगे पहुंच चुके हैं वह इस्राईल के साथ एलायंस बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। आले सऊद तथा कुछ छोटे अरब देशों की इस नीति के चलते ज़ायोनी शासन और भी दुस्साहस के साथ फ़िलिस्तीनियों पर हमले कर रहा है और उसे किसी बड़े विरोध की चिंता भी नहीं है। इस तरह देखा जाए तो सऊदी अरब तथा कुछ अन्य अरब देशों की नीतियां भी फ़िलिस्तीनियों पर नया अत्याचार साबित हो रही हैं।

इन हालात के कारण वर्ष 2018 का क़ुद्स दिवस पिछले तीन दशकों की तुलना में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। फ़िलिस्तीन की जनता के समर्थन में प्रदर्शनों से ज़ायोनी शासन के अत्याचारों पर दुनिया की नज़रें केन्द्रित होंगी और लोगों को फ़िलिस्तीनियों की मज़लूमियत दिखाई देगी। यह प्रदर्शन डोनल्ड ट्रम्प, नेतनयाहू और मुहम्मद बिन सलमान को अपमानित करेंगे। क़ुद्स दिवस के प्रदर्शनों से यह साबित होगा कि नकबा को 70 साल बीत जाने के बाद भी अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन के ख़िलाफ़ फ़िलिस्तीनियों का आंदोलन न केवल यह कि समाप्त नहीं हुआ है बल्कि इसमें नई शक्ति पैदा हो गई है और इसे बड़े पैमाने पर जनता का समर्थन मिल रहा है। यह आंदोलन धीरे धीरे तूफ़ान का रूप धारण कर रहा है।

 

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Jun ०३, २०१८ १६:१२ Asia/Kolkata
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