अल्लाहो अक्बर अल्लाहो अक्बर ला इलाहा इल्लल लाहो वल्लाहो अक्बर, अल्लाहो अक्बर व लिल्लाहिल हम्द, अल्लाहो अक्बर अला मा हदाना।

जी हां ईश्वर की बंदगी, उसके आज्ञापालन और उसकी मेहमानी में एक महीना गुज़ारने के बाद हासिल होने वाली ख़ुशी का प्रतिबिंबन है यह आवाज़। सुरज की पहली किरण दिन के आगमन की शुभूसचना दे रही है और उत्सुक मन को ईद की भव्य नमाज़ के आयोजन के लिए तय्यार कर रही है। सुबह का समय है। हर ओर चहल पहल है। जिसे देखिए वह ईदगाह की ओर बढ़ रहा है। चेहरों से ख़ुशी झलक रही है।

पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमायाः "अपनी ईदों को तकबीर से शोभा दो।" ख़ुद पैग़म्बरे इस्लाम भी ऐसा ही करते थे। ईद के दिन आप घर से ईदगाह तक ऊंची आवाज़ में "ला इलाहा इल्लल लाह" और "अल्लाहो अक्बर" कहते जाते थे। यहां तक कि ईद के विशेष भाषण से पहले, उसके दौरान और बाद में भी यह वाक्य दोहराए जाते थे। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ईदुल फ़ित्र के दिन बहुत ज़्यादा तकबीर कहने की वजह के बारे में फ़रमाते हैंः "तकबीर अनन्य ईश्वर की महानता को दर्शाने और पूरी सृष्टि के पालनहार की अनुकंपाओं व मार्गदर्शनों के प्रति एक तरह का आभार व्यक्त करने के लिए है।"

ईदुल फ़ित्र के दिन हर चीज़ से ईद की झलक नज़र आती है। ईदुल फ़ित्र इंसान के मन व मस्तिष्क में ईमान की कली खिलने का समय है। इंसान का सद्कर्म और उसमें सदाचारिता जितनी अधिक होगी, वह ईद के दिन उतना ज़्यादा ईश्वर का सामिप्य महसूस करेगा। ईद के दिन उतना ही आनंद का आभास करेगा। यह ईद ईश्वर की ओर से मोमिनों के लिए एक तरह का तोहफ़ा है जो रोज़े के ज़रिए मन पर पापों की जमी मैल को हटाती है, जिन्होंने मन से गंदगी को दूर कर उसमें ईश्वर पर आस्था को जगह दी है। मानो दोबारा जन्म लिया है।

ईदुल फ़ित्र मुसलमानों के सबसे बड़े पर्व में से एक है। इस अवसर पर इस्लामी देशों में कई दिन छुट्टी रहती है और विशेष रीति रिवाज के साथ एक महीना रोज़ा रखने के बाद लोग ईद का स्वागत करते हैं। इस्लामी देशों में मुसलमान ईद को फिर से नए होने का पर्व समझते हैं और इस ईद के बहाने घर की सफ़ाई करते हैं, परिवार के सदस्यों के लिए नये ख़रीदते हैं। ईरानी भी ईदुल फ़ित्र को बहुत अहमियत देते हैं और इसे आत्मा की ताज़गी की ईद मानते हैं। इन दिनों मुसलमानों के घर का माहौल आध्यात्मिक लगता है। इस दिन के सामाजिक रीति रिवाज ने ईदुल फ़ित्र को सामूहिक जश्न में बदल दिया है और विभिन्न देशों में ये जश्न अलग अलग अंदाज़ में आयोजित होते हैं।

मिस्र की राजधानी क़ाहेरा में ईद के दिन कुछ अलग तरह की चहल पहल दिखाई देती है। कपड़े बेचने वालों की दुकानों पर भीड़ उमड़ी रहती है। ईदुल फ़ित्र का विशेष धार्मिक भजन गाया जाता है और मस्जिद के लाउड स्वीकर से अल्लाहो  अक्बर की आवाज़ सुनायी देती है ताकि लोग ईदुल फ़ित्र की नमाज़ के आयोजन के लिए जामा मस्जिद के विशाल मैदानों में इकट्ठा हों। ज़्यादातर मोहल्लों की गलियों में दूध से बनने वाली रोटी और केक की सुगंध फैली होती है।

भारत, पाकिस्तान, मलेशिया और इंडोनेशिया सहित दूसरे मुसलमान आबादी वाले देशों में भी ईद का दिन ईदुल फ़ित्र की नमाज़ के साथ शुरु होता है। लोग रंग बिरंगे साफ़ सुथरे और नए कपड़ों में ईद की नमाज़ के लिए लाइन में खड़े होते है। उसके बाद वे परिवार के बडों के पास जाते हैं और उनसे मुलाक़ात करते हैं। परिवार के बड़े अपने छोटों को ईदी देते हैं।  बहुत से लोग फूल लिए उन रिश्तेदारों की क़ब्रों पर जाते हैं जो इस साल के पवित्र रमज़ान के महीने में उनके साथ नहीं थे, उनके लिए नमाज़ पढ़ते हैं।

इस बीच यमन, बहरैन, फ़िलिस्तीन और सीरिया में जनता रक्तपात, प्रतिरोध और मौत के बीच ईद मना रही है। घर का सदस्य बच्चों को खिलौने उपहार में देता है ताकि उनके मुंह पर मुस्कान आ जाए। लेकिन जो चीज़ उनकी आंखों में चमक पैदा करती और प्रतिरोध के लिए उनके संकल्प को मज़बूत करती है वह ईश्वरीय वादे के पूरा होने की उम्मीद है जिसमें ईश्वर ने अंततः सत्य की जीत की शुभसूचना दी है हालांकि असत्य चाहे जितनी मक्कारी और धूर्तता अपनाएं उसे अंत में मिटना ही है।         

ईदुल फ़ित्र की नमाज़ सभी मुसलमान राष्ट्रों का संयुक्त संस्कार है जो इस महा पर्व के आरंभ का प्रतीक है। ईदुल फ़ित्र की नमाज़ की शान मोमिनों के मन को चमका देती है और आज के दिन इस्लाम के दुश्मन मुसलमानों की एकता से हैरत में पड़ जाते हैं।

ईदुल फ़ित्र की नमाज़ पहली हिजरी क़मरी में अनिवार्य हुयी और मुसलमान पैग़म्बरे इस्लाम के दौर में इस नमाज़ को सामूहिक रूप से पढ़ते थे। पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के बाद इस नमाज़ की अनिवार्यता ख़त्म हो गयी लेकिन इसे पढ़ने पर बहुत बल दिया गया है। ईदुल फ़ित्र की नमाज़ के बाद उसके विशेष भाषण को सुनना सुन्नत है। ईदुल फ़ित्र की नमाज़ के विशेष क़ुनूत की दुआ में नमाज़ी कहता है, "हे पालनहार! जिसे महानता शोभा देती है, दानी और सर्वशक्तिमान है, इस लायक़ है जिससे डरा जाए, तुझसे निवेदन करता हूं इस दिन को मुसलमानों के लिए ख़ुशी का दिन क़रार दे। और मुहम्मद सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम और उनके परिजनों के लिए ज़ख़ीरा क़रार दे और उनके स्थान को ऊंचा कर। तुझसे निवेदन है कि पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों पर दुरूद भेज और मुझे हर उस भलाई में दाख़िल कर जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजन दाख़िल हैं और मुझे हर उस बुरायी से निकाल जिससे तूने पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों को निकाला है तेरा दुरूद व सलाम हो पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजन पर। हे पालनहार तुझसे उस बेहतरीन चीज़ का निवेदन करता हूं जिसका तेरे नेक बंदे निवेदन करते हैं और उस चीज़ से पनाह चाहता हूं जिससे तेरे निष्ठावान बंदे पनाह चाहते हैं।"

क़ुनूत की दुआ का एक भाग बहुत ही सुंदर है जिसमें सारे मुसलमान शामिल हैं। दुआ के आरंभ में इस बात की ओर इशारा है कि अनन्य ईश्वर ने ईदुल फ़ित्र को मुसलमानों के लिए ईद क़रार दिया और पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के लिए सम्मान व प्रतिष्ठा का ज़ख़ीरा बनाया और उनके स्थान को ऊंचा किया ताकि मुसलमान इसके ज़रिए भौतिक व आत्मिक दृष्टि से ऊंचा स्थान हासिल करें और लोक परलोक में सम्मान पाएं।      

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई जो ईदुल फ़ित्र के विशेष भाषण में आम तौर पर मुसलमानों के मौजूदा मुद्दों की ओर इशारा करते हैं, फ़रमाते हैं, "इस ज़ख़ीरे को मुसलमान दो चीज़ों के लिए इस्तेमाल करें। एक मुसलमानों के बीच आपस में एकता और दूसरे इस्लामी जगत में अध्यात्म की ओर ध्यान देने पर। इस्लामी जगत में इन दोनों तत्वों पर ख़तरा मंडरा रहा है जबकि ये दोनों तत्व प्रगति दिलाने वाले और परिपूर्णतः की ओर ले जाने वाले हैं। आज मुसलमानों के बीच एकता धार्मिक, सांप्रदायिक व जातीय फूट तथा नाना प्रकार के राष्ट्रवादी विचारों, गुमराह करने वाले नारों की वजह से टूट गयी है। मुसलमान को सारे नारे छोड़ कर सिर्फ़ इस्लामी जगत के बीच एकता का नारा लगाना चाहिए। दूसरा बिन्दु अध्यात्म है। आज इस्लामी अध्यात्म, सही इस्लाम व धर्म की ओर पलटना मुसलमानों का नारा होना चाहिए।"

ईदुल फ़ित्र की नमाज़ एक ओर पवित्र रमज़ान में ईश्वर की अनुकंपाओं का तो दूसरी ओर पापों से पाक होकर नए इंसान के रूप में दुबारा जन्म लेने का आभार व्यक्त करने के लिए है। इसी तरह यह इस बात का निवेदन करने के लिए है कि ईश्वर हमें ईमान, नैतिकता व सद्कर्म से सुशोभित उस स्वर्ग में दाख़िल कर जिसमें तेरे चुने हुए बंदे रहते हैं। हमें बुरे कर्म व बुरी सोच से ग्रस्त नरक से दूर कर कि जिनसे तूने अपने प्रिय बंदों को दूर रखा है।

वास्तव में ईदुल फ़ित्र के दिन मुसलमान पूरी निष्ठा से ईश्वर की प्रसन्नता, उसका सामिप्य, ईश्वर के लिए सद्कर्म करने और उसकी उपासना का अवसर पाने की दुआ करता है और जिस चीज़ से पनाह चाहता है वह इच्छाओं और ईश्वर को छोड़ दूसरे की ग़ुलामी से पनाह तथा अनेकेश्वरवाद से पनाह है।

ईदुल फ़ित्र के दिन मुसलमानों की विशाल सभा में लोग एक दूसरे से दिल से मिलते हैं, दिन और जीवन शैली में मूल बदलाव लाकर दिन को यादगार बनाते हैं।

 

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Jun १३, २०१८ १५:१५ Asia/Kolkata
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