ईश्वरीय दूत और उनके उत्तराधिकारी, ऐसे चुने हुए लोग होते हैं जो बहुत ही पवित्र जीवन व्यतीत करते हैं। 

निःसन्देह, ऐसे लोगों का अनुसरण करने और उनकी शिक्षाओं को व्यवहारिक बनाने से मनुष्य को निश्चित रूप में कल्याण प्राप्त होता है।  इमाम हादी अलैहिस्सलाम भी ऐसे ही थे जो सदगुणों का प्रतीक थे।  आज उन्हीं का शुभ जन्म दिवस है।  इस अवसर पर आपकी सेवा में बधाई प्रस्तुत करते हैं।

आज पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) के एक पौत्र अली नक़ी या इमामे हादी का जन्म दिवस है।  ज़िलहिज महीने की पंद्रह तारीख़ को आपका शुभ जन्म हुआ था।  महापुरूषों के जन्म दिवस वास्तव में बरकत का कारण होते हैं।  इस महान दिन के उपलक्ष्य में हम ईश्वर से सबके लिए मोक्ष और कल्याण की कामना करते हुए आपकी सेवा में पुनः बधाई प्रस्तुत करते हैं।

इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का उपनाम हादी है।  सन 212 में ज़िलहिज महीने की पंद्रह तारीख़ को आपका शुभ जन्म हुआ था।  इमाम हादी का जन्म मदीना के निकट "सरया" नामक क्षेत्र में हुआ था।  आपके पिता ने आपका नाम अली रखा था।  इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के कुछ उपनाम इस प्रकार हैं हादी, नक़ी नासेह, फ़क़ीह, अमीन और मुर्तज़ा।  बहुत से लोग इमाम अली नक़ी को उनके मश्हूर उपनाम हादी के नाम से पुकारते हैं।

इमाम हादी अलैहिस्सलाम का मुख बहुत ही तेजस्वी था।  वे लोगों में बहुत ही लोकप्रिय थे।  जिन लोगों ने इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम को देखा है उनका कहना है कि वे बहुत ही सुन्दर थे जिनमें बहुत आकर्षण पाया जाता था।  इन लोगों का कहना है कि जो भी दुखी व्यक्ति इमाम के चेहरे को देखता था वह उनमें इतना डूब जाता था कि अपने दुख को भूल जाता था।  सुन्दर एवं आकर्षक होने के साथ ही इमाम हादी ज्ञान और बहुत सी विशेषताओं से सुसज्जित थे।

इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की आयु जब छह साल की थी तो अब्बासी शासक मोतसिम के आदेश में उनके पिता इमाम जवाद को मदीने से बग़दाद लाया गया।  इसी बीच मोतसिम ने आदेश दिया कि इमाम हादी के लिए, जो अपने परिवार के साथ मदीने में थे, एक शिक्षक नियुक्त किया जाए ताकि उनका पालन-पोषण, शासक की इच्छानुसार किया जा सके।  इस काम के लिए "अलजुनैदी" का चयन किया गया जो पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों और उनके चाहने वालों का कट्टर दुश्मन था।

जुनैदी ने अपना काम शुरू किया।  कुछ दिन के बाद एक सरकारी कारिंदे ने जुनैद से पूछा कि बच्चे को कैसे पढ़ा रहे हो? सरकारी कारिंदे की बात सुनकर जुनैदी ने क्रोध में कहा कि कैसा बच्चा? तुम किस बच्चे की बात कर रहे हो? उसने कहा कि जब मैं उस बच्चे को कुछ बताता हूं तो वह उस विषय के बारे में अधिक विस्तार से मुझको बताने लगता है।  वह एेसी बातें बताता है जो मुझको भी नहीं मालूम होतीं।  जुनैदी ने कहा कि कभी-कभी मैं उस बच्चे को परेशान करने के लिए कहता हूं कि अपने कमरे में घुसने से पहले क़ुरआन का कोई सूरा पढो।  जब वह पूछता है कि कौनसा सूरा पढूं तो मैं उसको किसी लंबे सूरे का नाम बता देता हूं।  वह बच्चा उसी सूरे को सुनाता है और उसके कठिन शब्दों की मेरे सामने व्याख्या करता है।  अलजुनैदी ने कहा कि वह क़ुरआन का हाफ़िज़ और क़ुरआन की व्याख्या भी जानता है।  वह वास्तव में विद्वान है।

अपने पिता की शहादत के बाद लगभग आठ वर्ष की आयु में इमाम हादी अलैहिस्सलाम ने ईश्वरीय मार्गदर्शन का दायित्व संभाला।  आपने 33 वर्षों तक ईश्वरी मार्गदर्शन का दायित्व बहुत ही उचित ढंग से निभाया।  इन 33 वर्षों में से 13 साल आपने मदीने में और 20 साल सामर्था में गुज़ारे।  दसवे इमाम के जीवनकाल में अब्बासी शासन के 6 शासक आए और चले गए जिनके नाम इस प्रकार हैं।  मोतसिम, वासिक़, मुतवक्किल, मुन्तसिर, मुस्तईन और मोतज़।  इस दौरान सत्ता को लेकर अब्बासी शासकों में बहुत कड़ा संघर्ष रहा।  ऐसी स्थिति में इन शासकों का अत्याचार बहुत अधिक फैल चुका था।  ऐसे में इमाम ने अपनी दूरदर्शिता से तत्कालीन इस्लामी समाज को पतन से सुरक्षित किया।  

ज्ञान के प्यासे लोग हर ओर से इमाम के पास आते और ज्ञान के अथाह सागर के प्रतिमूर्ति से अपनी प्यास बुझाते थे। इमाम हादी अलैहिस्सलाम के चाहने वाले और उनके अनुयाइ ईरान, इराक़ और मिस्र जैसे विभिन्न देशों  व क्षेत्रों से उनकी सेवा में उपस्थित होकर या पत्रों के माध्यम से अपनी समस्याओं व कठिनाइयों को इमाम के समक्ष रखते थे और उनका समाधान मालूम करते थे।  इसी तरह इमाम के प्रतिनिधि लोगों के मध्य थे और धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक मामलों के समाधान में वे लोगों और इमाम के मध्य संपर्क साधन थे।

परिपूर्णता के शिखर को तय करने की एक महत्वपूर्ण शैली ज्ञान की प्राप्ति है और इंसान ज्ञान के बिना कुछ नहीं कर सकता। इमाम हादी अलैहिस्सलाम का मानना था कि उच्च मानवीय उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। क्योंकि जानकारी और ज्ञान की प्राप्ति के बिना कोई राही अपने उद्देश्य तक नहीं पहुंचता है। इमाम हादी अलैहिस्सलाम फरमाते हैं "ज्ञानी और ज्ञान प्राप्त करने वाले दोनों मार्गदर्शन में भागीदार हैं।”

इमाम हादी अलैहिस्सलाम ने तत्कालीन इस्लामी जगत में विभिन्न क्षेत्रों में फैले पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के समर्थकों को एकजुट करने के उद्देश्य से संपर्क चैनेल स्थापित किया था।  वे अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से भी उस काल के शियों से संपर्क स्थापित किया करते थे।  हालांकि यहां पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि इस प्रकार का संपर्क, इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के काल से आरंभ हो चुका था।  इमाम हादी के प्रतिनिधि लोगों के प्रश्नों के जवाब देते थे।  इमाम के इन प्रतिनिधियों के कारण वे लोग जो इमाम से भेंट नहीं कर पाते थे वे भी अपने प्रश्नों के उत्तर हासिल कर लिया करते थे।

इमाम हादी के प्रतिनिधि एेसे थे जिनपर इमाम का पूरा भरोसा था।  उदाहरण स्वरूप इमाम के एक दूत थे "अब्दुल अज़ीम हसनी"।  वे शहरे रे में इमाम के प्रतिनिधि थे।  शहरे रे वर्तमान समय में ईरान की राजधानी तेहरान के निकट स्थित है।  एक बार शहरे रे के कुछ गणमान्य लोग इमाम हादी से मिलने के लिए गए हुए थे।  उन लोगों ने जब इमाम से कुछ धार्मिक सवाल करने चाहे तो इमाम ने उनके सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि जब हमारे विशेष दूत अब्दुल अज़ीम हसनी तुम्हारे क्षेत्र में मौजूद हैं तो तुमको इतनी दूर आने की क्या आवश्यकता है?

इमामों ने अपने काल की सामाजिक परिस्थितियों के दृष्टिगत तत्कालीन समाज में वैचारिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से जानेमाने शिष्यों का प्रशिक्षण किया।  इस कार्य से इमामों का मुख्य उद्देश्य यह रहा कि उनके बाद भी ईश्वरीय मार्गदर्शन का कारवां आगे बढ़ता रहे।  इमामों के प्रशिक्षित शिष्यों ने बाद में अपने कुछ अच्छे शिष्य पैदा किये।  इस प्रकार से मार्गदर्शन का क्राम सदैव जारी रहा।  इमाम हादी के मुख्य शिष्यों की संख्या सौ से डेढ सौ बताई जाती है।  इमाम के शिष्यों ने विज्ञान, चिकित्सा, इतिहास, भूगोल, खगोलशास्त्र और गणित जैसे विषयों के बारे में कई रचनाएं भी छोड़ी हैं।

इमामों ने अपने अनुयाइयों के मार्गदर्शन के उद्देश्य से कई काम किये जिनमें से एक, लोगों को दुआएं और ज़्यारतों के बारे में बताना शामिल है।  इमामों की ओर से बताई गई ज़्यारतों में से एक "ईदे ग़दीर" की ज़्यारत है।  इस ज़्यारत का उल्लेख स्वयं इमाम ने किया है जिसके माध्यम से हज़रत अली अलैहिस्सलाम की इमामत को सिद्ध किया गया है।  इस ज़्यारत में इमाम हादी ने पवित्र क़ुरआन की आयत से हज़रत अली की ख़िलाफ़त को सिद्ध किया है।  इमाम हादी अलैहिस्सलाम की शिक्षाओं में एक "ज़ियारते जामे कबीरा" भी है।  इसमें बहुत ही स्पष्ट ढंग से एकेश्वरवाद, ईश्वरीय दूतों और प्रलय जैसे विषयों को समझाया गया है।

इमाम हादी अलैहिस्सलाम का एक कथन है:  भलाई करना, भलाई से अच्छा है।  ज्ञान से श्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है।  बुराई से बुरा उसका करने वाला है।

 

 

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Aug २६, २०१८ १४:४५ Asia/Kolkata
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