ईदे ग़दीर मुसलमानों की ख़ुशियों और उनके हर्षोल्लास का दिन है।

इस दिन पूरी दुनिया में मुसलमान जश्न मनाते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने अंतिम हज की समाप्ति पर ग़दीर के तालाब के निकट हज़रत अली अलैहिस्सलाम को मोमिनों के लिए अपना उत्तराधिकारी व अभिभावक घोषित किया। इस दिन पैग़म्बरे इस्लाम अपने विशेष तंबू में बैठे बहुत ख़ुश नज़र आ रहे थे। आपने हुक्म दिया कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम दूसरे तंबू में अकेले बैठें। उस दिन सदाचारियों के अगुवा हज़रत अली अलैहिस्सलाम धीरे धीरे क़दम उठाते हुए लोगों के बीच से उस तंबू की ओर बढ़े जिसे इसलिए लगाया गया था कि लोग एक एक करके हज़रत अली को उनके आज्ञापालन का वचन दें। पैग़म्बरे इस्लाम के हुक्म से एक एक करके लोग उस तंबू में जाने लगे। क़बीलों के सरदार, अंसार और मुहाजिरों की बड़ी बड़ी हस्तियां एक एक करके उस तंबू में गयीं और उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को उनके भविष्य के नेता व इमाम बनने पर बधाई दी।

इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने महिलाओं को भी आदेश दिया कि वे तंबू में जाएं और हज़रत अली अलैहिस्सलाम को पैग़म्बरे इस्लाम का उत्तराधिकारी व मोमिनों का अभिभावक बनने की बधाई दें।  जिसके बाद महिलाओं ने भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम को बधाई दी। पैग़म्बरे इस्लाम के इस आदेश का अर्थ हज़रत अली अलैहिस्सलाम की बैअत अर्थात उनके आज्ञापालन का वचन लेना था।

नैतिक पतन और बुराईयों में डूबे हुए लोगों के बीच पैग़म्बरे इस्लाम ने मानवता प्रेम की भावना और प्रेम से ओतप्रोत मानसिकता के साथ अनेकेश्वरवाद, अत्याचार और भ्रष्टाचार से संघर्ष करते हुए इस्लाम धर्म को विस्तृत किया और अपने अनुयायियों को उच्च शिक्षाएं दीं जो ईश्वरीय स्रोत हैं। उन्होंने मनुष्यों को परिपूर्णता और कल्याण का निमंत्रण दिया और भाईचारे, समानता, ईश्वरीय भय और एकेश्वर की ज्वाला लोगों के दिलों में भड़का दी। पैग़म्बरे इस्लाम ने अज्ञानता की काली चादर फाड़ दी और लोगों के दिलों में मानवता और अध्यात्म का प्रकाश जला दिया। उन्होंने कुछ मुक्तिदाता क़ानून और उच्च शिखर पर पहुंचाने वाली परंपराओं की शिक्षा दी और मनुष्य के जीवन के लिए पवित्र क़ुरआन को नमूना क़रार दिया। पैग़म्बरे इस्लाम ने इस महा धरोहर को मनुष्य के लोक परलोक तथा कल्याण का सुनिश्चितकर्ता क़रार दिया और इस्लाम धर्म से जुड़े रहने को लोक परलोक में मुक्तिदाता बनाया। अब सवाल यह उठता है कि पैग़म्बरे इस्लाम के बाद इस कठिन मार्ग को आगे बढ़ाने वाला कौन है और किसके हाथों में मार्गदर्शन की मशाल दी जाए?

 

पैग़म्बरे इस्लाम अपने जीवन का अंतिम वर्ष बिता रहे हैं और वह हमेशा बेहतरीन उतराधिकारी के चयन के प्रयास में थे कि अल्लाह ने उनका रास्ता आसान बना दिया। अंतिम हज में जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम (स) के साथ डेढ़ लाख हाजी थे, ईश्वर अपने पैग़म्बर को संबोधित करते हुए सूरए मायदा की आयत संख्या 67 में कहता है कि हे पैग़म्बर ईश्वर की ओर से जो आपकी ओर उतारा गया है उसे लोगों तक पहुंचा दें और यदि आपने यह काम नहीं किया तो मानो कोई भी ईश्वरीय दायित्व अदा ही नहीं किया।

अपने अंतिम हज अर्थात हज्जतुल विदा से वापसी के रास्ते में मक्का और मदीना शहरों के बीच में ग़दीरे ख़ुम नामक तलाब के किनारे पैग़म्बरे इस्लाम ने रुकने का आदेश दिया। पैग़म्बरे इस्लाम के साथियों ने पैग़म्बर के प्रकाशमयी चेहरे को देखा और वह समझ गये कि कोई महत्वपूर्ण विषय है। हेजाज़ का सूरज पूरी ताक़त से दमक रहा था, पैग़म्बरे इस्लाम ने आदेश दिया कि जो लोग आगे चले गये हैं उनको पीछे बुलाया जाए और जो लोग पीछे रह गये हैं उनका इंतेज़ार किया जाए। जब सब लोग उक्त स्थान पर एकत्रित हो गये तो वहां दोपहर की नमाज़ आयोजित हुई और पैग़म्बरे इस्लाम ने ऊंट के पालानों से मिंबर बनाने का आदेश दिया। जब मिंबर बनकर तैयार हुआ तो आप मिंबर पर गये और ईश्वर का गुणगान करने के बाद कहा कि क्या मैं आप लोगों से अधिक आप लोगों के जीवन पर हक़ नहीं रखता, सबने एक आवाज़ में कहा, हां या रसूल्लाह, उसके बाद उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम का हाथ उठाया और कहा कि जिस जिस का मैं मौला, अर्थात स्वामी हूं उस उस के अली मौला हैं। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने इस बयान से कुछ महत्वपूर्ण संदेश दिए हैं और इसको कई बार दोहराया ताकि सब सुन लें, उसके बाद उन्होंने आसमान की ओर मुंह किया और कहा कि मेरे अल्लाह उस को तू प्रिय रख जो इसको प्रिय रखे, और उससे दुश्मनी कर जो इससे दुश्मनी करे, उसकी मदद कर जो इसकी मदद करे और उसको अपमानित कर जो इसको अपमान करे, सत्य को उस ओर मोड़ दे जिस ओर यह मुड़े।

 

पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली अलैहिस्सला और उनके पवित्र पुत्रों के बारे में कहा है कि हे लोगो, वह धर्म के सहायक और पैग़म्बरे इस्लाम के रक्षक हैं, वह ईश्वरीय भय के साथ पवित्र, मार्गदर्शन करने वाले और मार्गदर्शित हैं। आपका पैग़म्बर बेहतरीन पैग़म्बर है और आपका उतराधिकारी बेहतरीन उतराधिकारी और उसके पुत्र बेहतरीन उतराधिकारी हैं। हे लोगो, यह बात उनके बारे में जानें, समझें और जानें कि ईश्वर ने उसको मालिक और इमाम चुना है जिसका अनुसरण अनिवार्य किया है। उसका अनुसरण अंसार और मुहाजेरीन पर और उन लोगों पर जो भलाई में उसका अनुसरण करते हैं, मरुस्थल में रहने वालों पर, शहर में रहने वालों पर, अरबों पर, ग़ैर अरबों पर, दास पर, आज़ाद पर, छोटे पर, ब़ड़े पर, काले पर, गोरे पर, बल्कि हर एकेश्वरवादी पर अनिवार्य किया है। जो भी उसका विरोध करेगा, उस पर अल्लाह की धिक्कार होगी, जो उसका अनुसरण करेगा और उसकी पुष्टि करेगा, उस पर अल्लाह की कृपा दृष्टि होगी, ईश्वर उसको और जो भी उसकी बात सुनेगा और उसका अनुसरण करेगा, उसके पाप माफ़ कर देगा।

 

हर ओर से हज़रत अली को बधाईयां देने की आवाज़ उठने लगी और लोगों का ख़ुशियों का ठिकाना नहीं रहा, पैग़म्बरे इस्लाम भी बहुत ख़ुश थे, उन्होंने सबसे पहले अली के हाथों पर बैयत की। अभी हज़रत अली अलैहिस्सलाम के आज्ञापालन के लिए लगी लाइन ख़त्म नहीं हुई थी कि जिब्राइल अमीन उतरे और सूरए माएदा की आयत संख्या 3 की तिलावत की। इस आयत में आया है कि आज हमने तुम्हारे धर्म को पूरा कर दिया, तुम पर अपनी नेअमत पूरी की और इस्लाम को सबसे अच्छे धर्म के रूप में चुना है।

 

इस प्रकार से इस्लाम के इतिहास में नया अध्याय खुला जिसे विलायत व इमामत का नाम दिया गया। विलायत, नबूअत को जारी रखने वाली है। अर्थात ग़दीरे ख़ुम, पैग़म्बरे इस्लाम के भेजे जाने और उसको पूरा करने का दिन है। इस्लामी जगत के प्रसिद्ध व्यक्ति के चुने जाने, ख़ैबर, खंदक़ और बद्र जैसे युद्धों के विजेता, पैग़म्बरे इस्लाम के निष्ठावान साथी और साहसी मददगार, पैग़म्बरे इस्लाम की नैतिकता साक्षात नमूने के उतराधिकार बनने से इस्लाम धर्म का अनुसरण करने पर मुसलमानों के मार्ग तय करने का रास्ता साफ़ हो गया। वह सब हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अलग तरह की हस्ती पहचानते थे और सभी ने उन्हें पैग़म्बरे इस्लाम के बाद, इस भारी ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए सबसे शालीन और योग्य व्यक्ति समझा। मुसलमानों की ख़ुशी और पैग़म्बरे इस्लाम की अनुमति के साथ यह ईश्वरीय दायित्व अंजाम दिया गया और उसके बाद मुसलमानों के प्रसिद्ध शायर हस्सान बिन साबित ने पैग़म्बरे इस्लाम से अनुमति लेते हुए इस महा घटना को शेर का रूप दे दिया।

 

ग़दीर की घटना, हज़रत अली अलैहिस्सलाम के गुणों और सदगुणों का परिणाम थी, हज़रत अली अलैहिस्सलाम ईश्वरीय भय, धर्मपरायरणता, धर्म पर कटिबद्धता, सत्य के अनुसरणकर्ता और ज्ञान, शक्ति और बुद्धि से संपन्न शक्ति के मालिक थे। उन्होंने अपने साहर और बल से इस्लाम धर्म को संवेदनशील चरण में मुक्ति दिलाई। सामान्य और निर्धनता का जीवन व्यतीत करने शेर दिल अली, हमेशा ऐसे ही जिए। वे रात के अंधरे में अनाथ बच्चों के लिए अनाज और खाद्य पदार्थ लेकर निकलते थे और उनके साथ खेलते थे और उनको अपने हाथों से खाना खिलाते थे।

 

लेबनान के प्रसिद्ध लेखक और साहित्यकार जार्ज जरदाक़ हज़रत अली के गुणों के बारे में लिखते हैं कि अली इब्ने अबी तालिब, दिलों में धहकता हुआ शोला, जानों में शक्तिवर्धक गर्मी और बुद्धियों में शिफ़ादायक तर्क है। हे दुनिया तुझे क्या हो जाता, यदि अपनी समस्त शक्ति को एकत्रित करती, हर समय में अली जैसे व्यक्ति को, बुद्धि, ज़बान और उसकी तलवार से ले आओ।

 

हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी इमामत के बारे में कहते हैं, “ग़दीरे ख़ुम में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लललाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने इस तरह मेरा परिचय करायाः हे लोगो क्या जानते हो कि ईश्वर मेरा अभिभावक है और मैं तुम मोमिनों का अभिभावक हूं और मुझे तुम्हारे मन पर तुमसे ज़्यादा अधिकार हासिल है? सबने कहा कि ईश्वर के दूत ऐसा ही है। तब पैग़म्बर ने कहा कि अली खड़े हो जाओ! मैं खड़ा हो गया। उस वक़्त उन्होंने फ़रमाया, जिस जिसका मैं अभिभावक व सरपरस्त हूं उस उसके अली भी सरपरस्त व अभिभावक हैं। हे ईश्वर उसे दोस्त रख जो अली को दोस्त रखे। उसे दुश्मन रख जो अली को दुश्मन रखे।”

 

इन्हीं विशेषताओं ने एंथनी बारा जैसे ईसाई बुद्धिजीवी को यह कहने पर मजबूर कर दिया, “सच तो यह है कि अमीरुल मोमेनीन अली अलैहिस्सलाम न सिर्फ़ मुसलमानों के मार्गदर्शक बल्कि पूरी मानवता के मार्गदर्शक हैं और उस शमा की तरह हैं जिसे पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने स्वर्गवास के बाद अपने अनुयाइयों का मार्गदर्शन के लिए चुना है।”(AK)

 

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Aug २८, २०१८ १४:३४ Asia/Kolkata
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