इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का शुभ जन्म दिवस है।

आज काज़मैन नगर की स्थिति कुछ अलग सी है।  पूरे नगर को सजाया गया है।  इमाम काज़िम के रौज़े पर विशेष प्रकार का प्रकाश फैला हुआ है।  श्रद्धालू उनके रौज़े पर श्रद्धा सुमन चढ़ा रहे हैं।  संसार के अलग-अलग क्षेत्रों से लोग इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का जन्म दिवस मनाने काज़मैन पहुंचे हैं।  इस शुभ अवसर पर हम अपने सभी सुनने वालों को हार्दिक बधाई पेश करते हैं।

मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम मुसलमानों के सातवें इमाम हैं।  उन्हें अबुल हसन मूसा बिन जाफ़र भी कहा जाता है।  इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का शुभ जन्म मक्के और मदीने के बीच एक स्थान पर 20 ज़िलहिज सन 128 हिजरी कम़री को हुआ था।  अत्यधिक उपासना के कारण आपको "अब्दे सालेह" और अधिक धैर्य एवं संयम के कारण काज़िम कहा जाता है।  सन 148 हिजरी क़मरी में अपने पिता इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने लोगों के ईश्वरीय नेतृत्व या इमामत का दायित्व संभाला।  आपकी इमामत सन 183 हिजरी क़मरी तक जारी रही।  इमाम ने 35 वर्षों तक लोगों का मार्गदर्शन किया।  इस दौरान उनके इमामत के काल में जो शासक रहे उनके नाम इस प्रकार हैं मंसूर दवानेक़ी, मेहदी, हादी और हारून रशीद।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने बचपन से ही अपने पिता जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से ज्ञान अर्जित किया।   अपने सुपुत्र की ज्ञान संबन्धी योग्ताओं के बारे में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि अगर उससे अर्थात मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम से यदि क़ुरआन से संबन्धित कुछ पूछा जाए तो वे संतुष्ट करने वाले उत्तर देने में सक्षम हैं।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की किशोर अवस्था का ज़माना था।  एक बार वे मदीने में एक जगह से गुज़र रहे थे।  इसी बीच "ईसा शलक़ान" नामक एक व्यक्ति ने जो स्वयं को शिया कहता था, इमाम को संबोधित करते हुए कहा कि देख नहीं रहे हो कि तुम्हारे पिता ने हमारे साथ क्या किया? एक दिन में हमे आदेश देते हैं कि एसे करो और दूसरे दिन कहते हैं उस काम को न करो।  इमाम ने पहले शलक़ान की बात को पूरी तरह से सुना और फिर पूरे धैर्य के साथ कहा कि लोगों के तीन गुट हैं।  पहला गुट वह है जो ईश्वर पर पूरा भरोसा करता है और उसका दिल ईमान से भरा हुआ होता है।  दूसरा गुट काफ़िरों का होता है जो पथभ्रष्टता पर आग्रह करते हैं।  तीसरा गुट उन लोगों का होता है जो स्वयं को मोमिन दिखाना चाहते हैं किंतु ईमान की रौशनी उनके मन में पहुंची ही नहीं है।  यह बात कहकर इमाम ने बताया कि ईसा शलक़ान का संबन्ध तीसरे गुट से है।  ईसा शलक़ान का कहना है कि यह सुनने के बाद मैं इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की सेवा में उपस्थित हुआ और सारी बात उनको बताई।  यह सुनकर इमाम सादिक़ ने कहा कि मेरे बेटे मूसा काज़िम के ज्ञान का स्रोत नबूवत है।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के भीतर समस्त अच्छाइयां मौजूद थीं।  यही कारण था कि अपने काल के मुसलमानों में नहीं बल्कि उस काल के ग़ैर मुसलमानों के मन में भी इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के लिए विशेष प्रकार की श्रद्धा पाई जाती थी।  कुछ लोग इमाम की उपासना से प्रभावित थे तो कुछ उनके परोपकार से, कुछ उनकी शालीनता से तो कुछ उनके धैर्य से प्रभावित हो चुके थे।  इमाम लोगों की समस्याओं का समाधान करते जिसके कारण उनके काल के लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की सेवा में उपस्थित होते थे।  कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि उस काल के लोग अपनी मुश्किलों को हल करवाने के लिए इमाम की शरण में जाया करते थे।

विनम्रता को इस्लाम मे विशेष महत्व प्राप्त है।  इस्लाम चाहता है कि उसके मानने वाले विनम्रता के आभूषण से सुसज्जित हों।  इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की स्पष्टतम विशेषता विनम्रता थी।  इमाम का यह व्यवहार था कि जब भी कोई उनके साथ किस भी प्रकार की बुराई करता तो वे उसके बदले में उसके साथ भलाई करते।  इमाम को काज़िम की जो उपाधि दी गई वह इसीलिए थी कि वे क्रोध को पी जाते और बहुत अधिक विनम्र रहा करते थे।

कहा जाता है कि एक बार इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने अपने बच्चों को एकत्रित किया।  आपने उनसे कहा कि मेरे बच्चो! मैं तुमसे एक बात कह रहा हूं।  अगर तुम उसका ध्यान रखोगे तो वह तुम्हारे लिए बहुत लाभदायक होगी।  इसके बाद उन्होंने कहा कि अगर कोई तुम्हारे पास आए और तुम्हारे सीधे काल में कोई एसी बात कहे जो तुमको बिल्कुल भी पसंद न हो और उसके बाद वह माफ़ी मांग ले तो तुमको उसे माफ कर देना चाहिए।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम अपने विरोधियों और शत्रुओं सबके साथ विनम्रतापूर्ण व्यवहार किया करते थे।  वे सूरे फुस्सेलत की चौंतीसवीं आयत की बहुत तिलावत करते थे जिसमें ईश्वर कहता है कि किसी भी स्थिति में भलाई और बुराई समान नहीं हैं।  बुराई को अच्छे से अच्छे आचरण द्वारा दूर करो।  अब तुम देखोगे कि वह व्यक्ति जिसके और तुम्हारे बीच बुराई है, तुम्हारा घनिष्ठ मित्र बन गया है।  इमाम अपने मानने वालों को यह शिक्षा देना चाहते हैं कि लोगों को सच के आधार पर निमंत्रित करो और इस निमंत्रण में विनम्रता शामिल होनी चाहिए।  तुम्हारा निमंत्रण यदि इन विशेषताओं पर आधारित नहीं होगा तो निश्चित रूप में तुम्हें कोई सफलता हासिल नहीं होगी।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने समाज में व्याप्त कुरीतियों और बुरी परंपराओं का मुक़ाबला करने तथा लोगों को जागरूक बनाने के लिए अपने पिता इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की शैली का अनुसरण किया।  आप तर्कों के माध्यम से नास्तिकों के प्रश्नों का उत्तर देकर उन्हें निरुत्तर बना दिया करते थे।  उस काल में इमाम का लक्ष्य पथभ्रष्ट लोगों को सही रास्ते पर लानकर शुद्ध इस्लामी शिक्षाओं से उन्हें अवगत करवाना था।  आप कहते थे कि कम बोलना बुद्दिमानी है।  मैं तुम लोगों से कम बोलने का आह्वान करता हूं।  कम बोलना बहुत अच्छी शैली है जिससे पाप कम होते हैं।  इन बातों से इमाम का उद्देश्य, अपने अनुयाइयों को लोगों को बुद्धिमानी की ओर अग्रसर कराना है।  इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम विद्वानों के साथ शास्तार्थ किया करते और तर्कों द्वारा उन्हें वास्विकता से अवगत करवाया करते थे।  आपसे शास्तार्थ के लिए बड़े-बड़े धर्मगुरू भी आया करते थे।  इसका परिणाम शुद्ध इस्लाम की शिक्षाओं के विस्तार का कारण बना।

 

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का ज्ञान संबन्धी आन्दोलन, तत्कालीन पूरे इस्लामी समाज में फैल चुका था जिसके कारण बहुत से लोग इस्लामी बातों को स्वीकार करके मुसलमान बन चुके थे।  यह बात उस समय के अधिकारियों को पसंद नहीं आई इसीलिए उन्होंने उनको परेशान करना शुरू कर दिया।

इमाम मूसा काज़िम (अ) पैग़म्बरे इस्लाम के उन परिजनों में से हैं, जिनका समस्त जीवन कल्याण की ओर मार्गदर्शन और विभुतियों से भरा हुआ है। उनका पूर्ण जीवन ईश्वरीय आदेशों और न्याय के विस्तार के प्रयास में बीता। वे ऐसे समय में जीवन व्यतीत कर रहे थे, जो अत्याचारी दौर था और किसी में आपत्ति का भी साहस नहीं था। लेकिन इमाम (अ) ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) के शुद्ध इस्लाम के बचाव के लिए भरसक प्रयास किया जिसके लिए उन्होंने निष्कासन, क़ैद और अन्य कठिनाईयों को सहन किया।

एक बार हारून के अधिकारियों को यह पता चला कि प्रतिदिन बहुत से लोग इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के घर जाते हैं।  यह बात जब हारून को पता चली तो वह इससे बहुत चिंतित हुआ।  इस सूचना के मिलने के बाद से हारून ने इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम और उनके अनुयाइयों के प्रति कठोर रवैया अपनाया।  अपने शासनकाल में हारून ने निःसंकोच, शियों का जनसंहार करवाया।  हारून ने जब देखा कि वह इमाम काज़िम को नियंत्रित रखने में अक्षम है तो उसने इमाम को जेल में डाल दिया।  उसकी योजना यह थी कि इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम को जेल में डालकर उनपर दबाव डाले जिसके बाद उनसे कोई मामला कर लिया जाए।  हारून का सोचना था कि इमाम मूसा काज़िम दबाव से डकर उससे समझौता कर लेंगे।  दबाव के अतिरिक्त हारून ने इमाम  को लालच भी दी किंतु इसका भी कोई असर दिखाई नहीं दिया।  इमाम ने ईश्वर पर भरोसा करते हुए दबाव, धमकी और लालच सबका मुक़ाबला किया।  इस प्रकार उन्होंन शुद्ध इस्लाम को तन, मन और धन सबसे सुरक्षित रखते हुए उसे आज हमतक पहुंचाया। 

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Aug २९, २०१८ १६:४० Asia/Kolkata
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