मोहर्रम का महीना आ गया है।

यह महीना आते ही दिल शोकाकुल हो जाते हैं। यह वह महीना है जिसमें इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके 72 वफादार साथियों को कर्बला की ज़मीन पर तीन दिन का भूखा- प्यासा शहीद कर दिया गया था और यज़ीद की राक्षसी सेना ने उनके परिजनों को बंदी बना लिया था। यह वह महीना है जिसमें पूरी दुनिया के आज़ाद इंसान विशेषकर शिया मुसलमान शोकाकुल होकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का शोक मना रहे हैं। शिया मुसलमानों ने इमाम बाड़ों और मस्जिदों की दीवारों पर काले कपड़े लगा दिये हैं। शीया महिलाओं, बच्चों और पुरुषों ने काले वस्त्र धारण कर रखे हैं। जगह -जगह पर लोगों ने पानी की सबीलें भी लगा रखी हैं और वे रास्ता चलने वालों को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, उनके 6 महीने के बच्चे हज़रत अली असग़र, वफा की प्रतिमूर्ति जनाब अब्बास और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की प्यास की याद में लोगों को पानी पिलाते हैं। जो भी पानी पीता है वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर सलाम भेजता और उनकी प्यास को याद करता है।

मोहर्रमुल हराम हिजरी क़मरी का पहला महीना है। इस महीने को मोहर्रमु हराम इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस महीने में युद्ध करना हराम है। सन 61 हिजरी कमरी में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को शहीद कर दिये जाने के बाद यह महीना शोक के महीने में बदल गया और पूरी दुनिया के शीया इस महीने में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का शोक मनाते हैं। इस महीने में युद्ध हराम है किन्तु उसके बावजूद यज़ीद की राक्षसी सेना ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके परिजनों के लिए पानी बंद कर दिया था और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों को बड़ी ही निर्दयता के साथ शहीद कर दिया। इस हृदयविदारक घटना की याद में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के चाहने वाले प्रतिवर्ष उनका शोक मनाने के लिए एकत्रित होते हैं।

एक शीया विद्वान व धर्मगुरू जवाद मलेकी तबरीज़ी “अलमुराक़ेबात” नामक किताब में लिखते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से प्रेम करने वालों के लिए शोभनीय यह है कि मोहर्रम के पहले 10 दिनों में उनके चेहरों से दुःखी होने के चिन्ह प्रकट होने चाहिये और कुछ स्वादिष्ट खानों को विशेषकर नवीं, दसवीं और 11वीं मोहर्रम को न खायें। वे स्वयं को उस व्यक्ति की भांति बना लें जो अपने प्रियजन के शोक में हो और मोहर्रम महीने के पहले 10 दिन का आरंभ ज़ियारते आशूरा से करे।“

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन प्रतिवर्ष मोहर्रम के महीने में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का शोक मनाने का विशेष प्रबंध करते और शीयों को इस कार्य के लिए प्रोत्साहित करते थे ताकि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीद के अत्याचार के मुकाबले में जो आंदोलन किया था वह सदैव बाकी व जीवित रहे। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम अपने पिता इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के बारे में कहते हैं” जब मोहर्रम का महीना आता था तो कोई भी मेरे पिता को हंसता नहीं देखता था। आशूरा यानी दसवीं मोहर्रम तक उन पर दुःख व शोक छाया रहता था। आशूरा उनके दुःखी होने और रोने का दिन था। वह फरमाते थे कि आज वह दिन है जब इमाम हुसैन को शहीद कर दिया गया था।“

कर्बला की हृदयविदारक घटना के बाद जब हम इस्लाम के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ग़म में मनाई जाने वाली शोकसभायें किस सीमा तक अत्याचारियों के मुकाबले में आंदोलन के लिए प्रोत्साहित करने वाली रही हैं।

ईरान की इस्लामी क्रांति के सफल होने से पहले मोहर्रम और सफर के महीनों में विशेषकर नवीं और दसवीं मोहर्रम को लाखों ईरानी जो सड़कों पर निकलते थे और शाह की अत्याचारी सरकार के खिलाफ नारे लगाते उससे शाह की अत्याचारी सरकार के स्तंभ हिल जाते थे। लोगों के इस कार्य से पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के उस आदेश का रहस्य समझ में आता है जिसमें उन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की अज़ादारी मनाये जाने पर बल दिया है। अज़ादारी से पाठ लेकर केवल ईरानी लोगों ने शाह की अत्याचारी सरकार का अंत नहीं कर दिया बल्कि इराक जैसे देशों के लोगों ने भी अज़ादारी से लाभ उठाया है।

भारत के राष्ट्रपिता महात्मागांधी कहते हैं। मैंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के जीवन का गहन अध्ययन किया है और कर्बला की घटना को काफी ध्यान से पढ़ा। मेरे लिए यह बात स्पष्ट हो गयी कि अगर भारत स्वतंत्र होना चाहता है तो उसे इमाम हुसैन का अनुसरण करना होगा।“

अज़ादारी मनाने का एक महत्वपूर्ण परिणाम लोगों में राजनीतिक जागरुकता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का ग़म मनाने के लिए होने वाली शोक सभाओं में यह बयान किया जाता है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों ने किस प्रकार अत्याचारियों का डटकर मुकाबला किया। इस प्रकार हम देखते हैं कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का ग़म मनाने के लिए होने वाली शोक सभायें किस प्रकार दुनिया के अत्याचारग्रस्त राष्ट्रों व लोगों के लिए प्रेरणादायक हैं और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को अन्याय व अत्याचार के मुकाबले में न्याय और आज़ादी का प्रतीक समझा जाता है।

एक ईसाई अध्ययकर्ता आन्तवान बारा का मानना है कि इमाम हुसैन केवल शीयों या मुसलमानों से संबंधित नहीं हैं बल्कि उनका संबंध समस्त विश्वासियों और स्वतंत्रताप्रेमी इंसानों से है। वह कहता है" इमाम हुसैन हमेशा धर्मों के रत्न हैं। ईसाई आन्तवान बारा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से प्रेम करता है और उसने अपनी जवानी के काफी समय को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की जीवनी और आंदोलन को जानने में बिताया है। उसने एक किताब लिखी है जिसका नाम है “हुसैन दर अन्दीशये मसीहीयत” यानी “हुसैन ईसाईयत के विचार में”। दुनिया की 17 भाषाओं में इस किताब का अनुवाद हो चुका है। वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के व्यक्तित्व के बारे में कहता है" मैं इमाम हुसैन के बारे में वही छोटा वाक्य कहूंगा जो मैंने अपनी किताब में कहा है। मैं उन्हें धर्मों का रत्न समझता हूं। उन्होंने सबसे पहले बातचीत मोआविया और यज़ीद से आरंभ की परंतु बातचीत की शैली शत्रुओं के मार्गदर्शन में प्रभावी सिद्ध न हुई। वह जानते थे कि वह शहीद कर दिये जायेंगे इसके बावजूद उन्होंने स्वयं को ख़तरे में डाला और 70 व्यक्तियों की सेना लेकर उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद की 70 हज़ार की सेना के मुकाबले में डट गये। वह आगे लिखता है" इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने इस काम से समाज के शरीर में जोश भर दिया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जो आंदोलन किया उसका संबंध शीया, सुन्नी या मुसलमानों से नहीं है बल्कि उसका संबंध हर उस स्वतंत्र इंसान से है जो उनके मार्ग पर ईमान रखता है। अतः विश्ववासी और विचारक जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की जीवनी से परिचित हो जाते हैं तो वे उनसे प्रेम करने लगते हैं।

आन्तवान बारा का इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन के बारे में मानना है कि इमाम हुसैन ने अपने समय के अत्याचारी शासक की बैअत रद्द कर दी और असमंजस में डालने वाली किसी भी बात को स्वीकार नहीं की और उन सबको तुच्छ समझा। यज़ीद के शासन काल में इमाम हुसैन उसके प्रस्ताव को स्वीकार करके पद और धन प्राप्त कर सकते थे और उनके साथ जो कुछ हुआ उससे वह सुरक्षित रह सकते थे परंतु पैग़म्बरे इस्लाम के नाती ने यह बात समझ ली थी कि इस समय की जो गुमराही व पथभ्रष्टता है वह समय बीतने के साथ और अधिक हो जायेगी और भावी पीढ़ियों को बदला हुआ इस्लाम और परिवर्तित वास्तविकता मिलेगी और यह कार्य पैग़म्बरे इस्लाम और उनके काल के लोगों के समस्त प्रयासों के निरर्थक हो जाने का कारण बनेगा। इस बात के दृष्टिगत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीद के काल में आंदोलन करने का निर्णय किया। क्योंकि समस्त एतिहासिक पुस्तकों में यज़ीद को एक अज्ञानी, अधर्मी और धर्मभ्रष्ट व्यक्ति कहा गया है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम यज़ीद के मुकाबले में डट गये और उनके आंदोलन ने ज्वालामुखी की भांति इस्लामी जगत में चेतना उत्पन्न कर दी। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने आंदोलन से पापों में व्यस्त लोगों की आत्मा और आभास को जगाना और पापों की खाई से मुक्ति दिलाना चाहते थे।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन का एक संदेश न्याय, प्रेम और असत्य व अन्याय को स्वीकार न करना है। यह वह संदेश है जिसे हर वर्ष मोहर्रम में दोहराया और उस पर बल दिया जाता है। कर्बला समस्त अच्छाइयों की पाठशाला है। उसमें त्याग, बलिदान, धैर्य, तकवा अर्थात ईश्वरीय भय, ईमान और अन्याय व अत्याचार के मुकाबले में डट जाना जैसे अनगिनत पाठ निहित हैं और इन चीज़ों को आदर्श बनाकर समस्त इंसान और राष्ट्र अपने समय की कठिनाइयों से मुक्ति पा सकते हैं।

मोहर्रम वह महीना है जिसमें इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने थोड़े से वफादार, ईमानदार और निष्ठावान साथियों को लेकर अत्याचारी यज़ीद की बड़ी राक्षसी सेना के मुकाबले में डट गये और कर्बला की भूमि को आज़ादी और स्वतंत्रता की पाठशाला में परिवर्तित कर दिया।

आशूरा की घटना यद्यपि एक दिन में घटी परंतु उसके प्रभाव हमेशा बाकी रहेंगे। कर्बला की घटना तलवार पर खून की विजय की प्रतीक बन गयी। कर्बला की घटना ने इस तरह लोगों के दिलों में प्रभाव डाला कि प्रतिवर्ष मोहर्रम विशेषकर आशूरा को बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है और उस दिन प्रेम, निष्ठा और जेहाद की भावना अपने शिखर पर पहुंच गयी और उस दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों को शहीद कर दिया जाता है। आशूर के दिन न केवल मुसलमान बल्कि ग़ैर मुसलमान भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों के प्रति श्रद्धासुमन अर्तित करते हैं।

 

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Sep ०९, २०१८ १६:२८ Asia/Kolkata
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