कर्बला की घटना, संसार की उन महानतम घटनाओं में से एक है जिसकी याद शताब्दियॉ बीत जाने के बाद आज भी मनाई जाती है और इसके प्रभाव में कोई कमी नहीं आई है।

समय की धूल, इतिहास की हर घटना को धुंधला बना देती है लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, वैसे-वैसे कर्बला की घटना और अधिक स्पष्ट, प्रासंगिक तथा प्रकाशमान होती जा रही है और हर बीतते दिन के साथ अधिक से अधिक लोग इस घटना की ओर आकृष्ट होते जा रहे हैं।

कर्बला की क्रांति और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन एक अभूतपूर्व और बेजोड़ क्रांति है जिसने किसी भी अन्य क्रांति की तुलना में अत्याचारी को अपमानित कर दिया और उमवी शासन के ज़हरीले प्रोपेगंडों को विफल बनाते हुए सबके सामने सच्चाई को उजागर कर दिया। मुहर्रम के इन विशेष कार्यक्रमों में हम मक्के से कर्बला तक की इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की यात्रा के दौरान विभिन्न अवसरों पर उनकी बातों, कथनों और भाषणों के क़ुरआनी आयाम की तरफ़ इशारा करेंगे। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के नाती को जब भी अवसर मिलता वे क़ुरआने मजीद की आयतों की तिलावत करके लोगों की आत्मा को शुद्ध करते और पथभ्रष्ठ लोगों को सीधा रास्ता दिखाते। इस प्रकार वे उन्हें बताते थे कि वे जानते हैं कि वे कहां खड़े हैं? किस लिए आंदोलन कर रहे हैं? और उनके विरोधी मोर्चे में कौन लोग हैं?

 

क़ुरआने मजीद और पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन एक ही वास्तविकता के दो जलवे हैं और इनमें से हर एक ईश्वर की दया, प्रेम और मार्गदर्शन का प्रतिबिंबन है। हम इनमें से जिसका भी चयन करें, दूसरे का रास्ता अपने आप मिल जाता है। क़ुरआने मजीद की गहराइयों में चिंतन-मनन से हम अहले बैत अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के परिजनों तक पहुंचते हैं और अहले बैत की जीवनी और उनके चरित्र या दूसरे शब्दों में उनकी कथनी और करनी पर ध्यान देने से हमें क़ुरआने मजीद की आयतों का व्यवहारिक रूप नज़र आता है।

सृष्टि की जो व्यवस्था है उसमें यह संसार किसी मासूम इमाम अर्थात हर प्रकार से दोषरहित नेता के बिना टिक नहीं सकता और क़ुरआने मजीद की आयतों को इमाम की मदद बिना समझना संभव नहीं है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की मशहूर हदीस, हदीसे सक़लैन इसी वास्तविकता को स्पष्ट करती है। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने सांसारिक जीवन के अंतिम क्षणों में फ़रमाया था। हे लोगो! मैं तुम्हारे बीच दो भारी चीज़ें छोड़े जा रहा हूं, एक ईश्वर की किताब, क़ुरआने मजीद और दूसरे मेरे अहले बैत अर्थात मेरे निकट परिजन। ये दोनों कभी भी एक दूसरे से अलग नहीं होंगे यहां तक कि प्रलय में कौसर नामक हौज़ पर मुझ से आ मिलें।

इमामों के बीच, हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा अलैहिमस्सलाम के छोटे बेटे, सम्मान व स्वतंत्रता के नेता और जेहाद व शहादत के अगुवा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को विशेष स्थान प्राप्त है। वे लगभग छः साल तक पैग़म्बरे इस्लाम के साथ रहे, ईश्वरीय संदेश वहि के केंद्र में उन्होंने क़ुरआने मजीद की दिल में उतर जाने वाली आवाज़ सुनी और क़ुरआनी शिक्षाओं में उनका लालन-पालन हुआ। उनका अस्तित्व क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं में ही ढला था और वे ईश्वरीय आयतों की तफ़सीर या व्याख्या किया करते थे।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की दृष्टि में क़ुरआने मजीद ज्ञान, ईश्वर की पहचान और जीवन के लिए एक महासमुद्र था जिसे पढ़ना और समझना चाहिए। वे कहते थे। ईश्वर की किताब चार स्तंभों पर आधारित है। वाक्य, संकेत, रोचक बिंदु और तथ्य। इसके वाक्य आम लोगों के लिए हैं जबकि संकेत ईश्वर के विशेष बंदों के लिए हैं। क़ुरआने मजीद के रोचक बिंदु, उसके प्रिय बंदों के लिए हैं और उसके तथ्य पैग़म्बरों के लिए हैं। इस आधार पर हर व्यक्ति अपनी समझ के अनुसार क़ुरआने मजीद से लाभान्वित हो सकता है।

इतिहास में है कि अब्दुर्रहमान सिलमी ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के किसी पुत्र को सूरए हम्द की शिक्षा दी। उस बच्चे ने वह सूरा अपने पिता के सामने पढ़ा। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अब्दुर्रहमान को बड़ी संख्या में दीनार और अन्य वस्तुएं उपहार स्वरूप दीं। कुछ लोगों ने उनसे कहा कि सूरए हम्द की शिक्षा के लिए आपने इतना अधिक उपहार दिया। इमाम हुसैन ने फ़रमायाः जो मैंने दिया है वह इस महान कार्य के मुक़ाबले में कुछ भी नहीं है।

इमाम हुसैन का आंदोलन, इस्लामी इतिहास की सबसे अहम घटनाओं में से एक है। इस आंदोलन के परिणाम स्वरूप ही कर्बला की महान घटना समाने आई। सन 61 हिजरी के मुहर्रम महीने की दसवीं तारीख़ अर्थात आशूरा को इस आंदोलन का चरम बिंदु संसार के सामने आया। अब तक विभिन्न लेखकों, ज्ञानियों, धर्मगुरुओं और शोधकर्ताओं ने विभिन्न आयामों से कर्बला की घटना पर प्रकाश डाला है और इसकी विभिन्न समीक्षाएं पेश की हैं। इन्हीं में से एक समीक्षा, इमाम हुसैन द्वारा अपने आंदोलन में क़ुरआने मजीद को चरितार्थ करने की है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मदीने में, मदीने से मक्के के रास्ते में, मक्के में, मक्के से कर्बला के रास्ते में और कर्बला में हर स्थान पर विभिन्न अवसरों पर क़ुरआने मजीद का हवाला दिया और वे इस ईश्वरीय किताब से अपने लगाव का उल्लेख करके उपस्थित लोगों और बाद में आने वालों का ध्यान इस बात की ओर मोड़ते थे कि वे क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं के आधार पर ही भ्रष्टाचार और अत्याचार के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए हैं।

 

मुआविया के बाद उसका बेटा यज़ीद, बिना योग्यता व क्षमता के मुसलमानों का शासक बन बैठा। वह अयोग्यता, भ्रष्टाचार व नैतिक पतन में कुख्यात था। यज़ीद ने अपने शासन को मज़बूत बनाने के लिए आदेश दिया कि सभी से उसकी बैअत अर्थात उसके आज्ञापालन का प्रण लिया जाए। जब मदीने में उसका पिटठू वलीद बिन उतबा लोगों से यज़ीद की बैअत न ले सका तो यज़ीद के एक और पिटठू मरवान बिन हकम ने धौंस और धमकी से काम लिया ताकि लोगों से यज़ीद की बैअत लेकर उसके शासन को मज़बूती व वैधता प्रदान कर दे। इसके लिए उसने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत लेने की विशेष कोशिश की क्योंकि वे पैग़म्बर के नाती थे और मदीने के लोगों के बीच उनका विशेष सम्मान व प्रतिष्ठा थी। उसका मानना था कि अगर इमाम हुसैन यज़ीद के प्रति वफ़ादार रहने का प्रण कर लेंगे तो अन्य लोग बड़ी सरलता से यह काम करेंगे। जब वह इस काम के लिए इमाम हुसैन के पास आया तो उन्होंने क़ुरआने मजीद की कुछ आयतों की तिलावत करके अपना रुख़ स्पष्ट कर दिया। इस प्रकार उन्होंने बनी उमय्या के अपराधी और भयानक शासन के चेहरे से नक़ाब हटाने के साथ ही अपने परिवार का परिचय दिया और अहले बैत की योग्यता व सत्यता को स्पष्ट किया। उन्होंने मरवान से कहाः धिक्कार हो तुझ पर, तू तुच्छ है जबकि हम वह परिवार हैं जिसके बारे में ईश्वर ने सूरए अहज़ाब की 33वीं आयत में कहा है कि हे पैग़म्बर के परिजनोः निश्चित रूप से अल्लाह तो यही चाहता है कि तुमसे अपवित्रता को दूर रखे और तुम्हें इस प्रकार पवित्र बनाए कि जिस प्रकार पवित्र बनाने का हक़ है।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यह बात यज़ीद जैसे अत्याचारी व क्रूर शासक के प्रतिनिधि से उसकी आंखों में आंखें डाल कर कही थी वे ज़रा सा भी नहीं घबराए थे। यहां भी उन्होंने क़ुरआने मजीद की इस आयत को चरितार्थ किया कि जो लोग ईश्वर पर सच्चा ईमान रखते हैं वे ईश्वर के अलावा किसी से भी नहीं डरते और न ही वे दुखी होते हैं। इस प्रकार इमाम हुसैन ने सच्चे एकेश्वरवाद का भी प्रदर्शन किया। जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मक्के से कर्बला के लिए निकले तो मक्के के राज्यपाल के लोगों ने उनका रास्ता रोक लिया और पूछा कि आप कहां जा रहे हैं? वापस लौट जाइये। इमाम हुसैन ने उनकी बात नहीं मानी और आगे बढ़ते रहे जिसके कारण दोनों पक्षों के बीच झड़प भी हुई। उन लोगों ने इमाम हुसैन से कहा कि क्या आपको ईश्वर का डर नहीं है कि आप पैग़म्बर के मानने वालों के बीच मतभेद पैदा कर रहे हैं? इमाम हुसैन ने उनके जवाब में क़ुरआने मजीद के सूरए यूनुस की इक्तालीसवीं आयत की तिलावत की। मेरा कर्म मेरे लिए और तुम्हारा कर्म तुम्हारे लिए है। जो कुछ मैं करता हूं तुम उससे विरक्त हो और जो कुछ तुम करते हो उससे मैं विरक्त हूं। इस आयत में पैग़म्बर को आदेश दिया गया था कि जो लोग उनकी पैग़म्बरी को झुठलाते हैं उनसे कह दें कि मेरा कर्म मेरे लिए और तुम्हारा कर्म तुम्हारे लिए। इस तरह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम की तरह ही अपने काल के अनेकेश्वरवादियों का जवाब दिया और यह दर्शा दिया कि उनकी धमकियों से उनके अभियान पर थोड़ा सा भी प्रभाव पड़ने वाला नहीं है। (HN)

 

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Sep ११, २०१८ १५:१८ Asia/Kolkata
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