इमाम हुसैन कर्बला में अपने आंदोलन के माध्यम से दुनिया में त्याग, बलिदान, शौर्य, सच्चाई पर मर मिटने और असत्य के सामने सिर न झुकाने के प्रतीक बन गए हैं।

पूरे इतिहास में किसी भी स्थान पर इतनी सुंदरता व वैभव के साथ शुद्ध रूप में सामने नहीं आया था। इमाम हुसैन अपने आंदोलन के हर उतार-चढ़ाव में क़ुरआने मजीद के ध्वजवाहक और रास्ता भटक जाने वालों के लिए मार्गदर्शन का प्रकाशमान चिराग़ हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ज़ियारत का एक वाक्य है कि निश्चित रूप से मैं गवाही देता हूं कि आप ईश्वर की किताब की तिलावत करने वाले थे।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उस घराने में पैदा हुए और पले बढ़े थे जो क़ुरआन मजीद की शिक्षाओं का केंद्र था। उनकी दृष्टि में क़ुरआने मजीद ज्ञान, ईश्वर की पहचान और जीवन के लिए एक महासमुद्र था जिसे पढ़ना और समझना चाहिए। क़ुरआने मजीद ज्ञान व बुद्धि पर बल देता है ताकि मानव समाज से अज्ञान व निश्चेतना समाप्त हो जाए। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आले व सल्लम के नाती इमाम हुसैन कहते थे कि निश्चेतना मनुष्य और मानव समाज को लगने वाली सबसे बुरी बीमारी है। निश्चेतना को सभी व्यक्तिगत व सामाजिक बुराइयों की जड़ बताया गया है क्योंकि निश्चेत व्यक्ति भौतिक जीवन के विदित रूप के अलावा कुछ नहीं देखता। क़ुरआन मजीद निश्चेतना को बर्बादी और पतन का मुख्य कारण बताते हुए सूरए आराफ़ की आयत नंबर 179 में कहता है। निश्चित रूप से हमने जिन्नों और मनुष्यों की एक बड़ी संख्या को नरक के लिए बनाया है (क्योंकि) उनके पास हृदय (तो) हैं लेकिन वे उनके माध्यम से (सत्य को) नहीं समझते। और उनके पास आंखें (भी) हैं किन्तु उनके द्वारा (सत्य को) नहीं देखते और उनके पास कान हैं मगर वे उनसे (सत्य को) नहीं सुनते। ऐसे ही लोग चौपायों की भांति बल्कि उनसे भी अधिक पथभ्रष्ट हैं (और वस्तुतः) यही लोग निश्चेत हैं।

 

निश्चेतना के शिकार समाज को जगाने की ज़रूरत होती है और सत्य व कल्याण के मार्ग पर चलना, तथ्यों व सत्य की पहचान के बिना संभव नहीं है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने क़ुरआने मजीद और ईश्वरीय कथन के प्रकाश से लोगों को चेतना, जारगरूकता और पवित्र जीवन की ओर आमंत्रित किया। वे क़ुरआने मजीद को ईश्वर का अमर चमत्कार और उसका स्पष्ट व प्रकाशमान तर्क बताते थे और इसके लिए सूरए अनआम की आयत क्रमांक 157 को उदाहरण के रूप में पेश करते थे जिसमें कहा गया है कि तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे पास स्पष्ट तर्क आ चुका है।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के क्रोध व प्यार दोनों का मानदंड क़ुरआन ही था और क़ुरआन की पवित्र सुगंध को उनके हर काम में महसूस किया जा सकता था। उनका व्यवहार और शिष्टाचार क़ुरआने मजीद की आयतों को चरितार्थ करता था और वे अपने व्यवहार से क़ुरआन की शिक्षाओं को जीवित करे थे और उन्हें समाज में प्रचलित करते थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की दृष्टि में किसी समाज की प्रगति, सुरक्षा व समृद्धि का सबसे अहम कारक उसके शासकों की भूमिका को समझते थे और कहते थे कि इस्लामी शासक की पहली शर्त ईमान और ईश्वरीय क़ानूनों का पालन है, जैसा कि ईश्वर ने सूरए निसा की 105वीं आयत में कहता है। (हे पैग़म्बर!) निश्चित रूप से हमने इस किताब को सत्य के साथ आप पर उतारा है ताकि ईश्वर ने जो कुछ आपको दिखाया और सिखाया है उसके आधार लोगों के बीच फ़ैसला करें और कदापि विश्वासघात करने वालों की ओर से शत्रुता न करें।

शासका का जन आधारित होना और लोगों विशेष कर इस्लामी शासन के कारिंदों द्वारा ईश्वरीय आदेशों का पालन एक अन्य शर्त है जिसकी ओर क़ुरआने मजीद की अनेक आयतों में संकेत किया गया है और उन सरकारों की कड़ी निंदा की गई है जिनमें ईश्वर के अलावा अन्य लोगों या वस्तुओं का आज्ञापालन किया जाता है। इस्लामी शासक पहाड़ की चोटी की तरह होता है, अगर वह भ्रष्ट हो जाए तो फिर आस-पास की सभी चीज़ें गंदी हो जाती हैं और इसी प्रकार अगर शासक सद्कर्मी हो तो उसके अधीन सभी लोग भले हो जाते हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने बारंबार घोषणा की कि वे यज़ीद और उसके शासन में इस्लामी नेतृत्व की कोई भी शर्त नहीं पायी जाती है और यज़ीद तो इस्लाम की विदित बातों का भी पालन नहीं करता है। वह शराब पीता है, हराम काम करता है, खुल कर क़ुरआने मजीद के विरुद्ध शेर कहता है। वह इस्लाम का हितैषी नहीं है। इस समय लोग शैतान का आज्ञापालन करने पर विवश हो गए हैं और उन्होंने ईश्वर का आज्ञापालन छोड़ दिया है। अब धरती में खुल्लम खुल्ला ईश्वर द्वारा हराम की गई वस्तुओं को हलाल और हलाल की गई वस्तुओं को हराम बताया जा रहा है।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर लोगों को ईमान और ईश्वर के भय की ओर मार्गदर्शन करते थे। उन्होंने कर्बला की ओर रवाना होते समय ही यह स्पष्ट कर दिया था कि उनका एकमात्र उद्देशय लोगों का मार्गदर्शन और उन्हें मुक्ति दिलाना है। यही कारण है कि उनका महान आंदोलन, इस्लामी इतिहास की सबसे बड़ी जनघटना है। इस घटना से लोगों के भावनात्मक जुड़ाव ने इसे अमर बना दिया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने जीवन में हर समय विशेष कर उमवी अत्याचारियों से संघर्ष और शहादत के दौरान सत्य और असत्य की पहचान का मानदंड बन गए।

जब इमाम हुसैन यज़ीद से टकराने के लिए तैयार हुए तो उनके भाई मुहम्मद बिन हनफ़िया उनके पास आए और उन्होंने इमाम हुसैन को मदीना छोड़ने से रोकने की कोशिश की। इमाम ने कहाः हे मेरे भाई! ईश्वर की सौगंध अगर मुझे दुनिया में कोई ठिकाना और शरण न मिले तब भी मैं यज़ीद की बैअत नहीं करूंगा। इसके बाद उन्होंने एक वसीयत लिखी और उसमें स्पष्ट रूप से अपने लक्ष्य, मार्ग और गंतव्य के बारे में बता दिया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला की ओर रवाना होने से पहले अपनी जो वसीयत लिखी थी उसमें क़ुरआने मजीद के सूरए हुद की 88वीं आयत का उल्लेख किया था जिसमें कहा गया है। मेरा सामर्थ्य ईश्वर की इच्छा के इतर नहीं है और मैंने उसी पर भरोसा किया है और मैं उसी की ओर उन्मुख हूं।

इस प्रकार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने लोगों के मन में इस सच्चाई को अटल बना दिया कि हर व्यक्ति को अपने दायित्व का पालन करना चाहिए और परिणाम की चिंता नहीं करनी चाहिए। हर एक को न्याय व शांति की स्थापना के मार्ग पर क़दम बढ़ाना चाहिए और इस रास्ते में सृष्टि के रचयिता और मामलों के वास्तविक निर्धारणकर्ता पर भरोसा करना चाहिए। ईश्वर पर भरोसा करने वाले अपने पूरे अस्तित्व से उसके द्वारा निर्धारित बातों को स्वीकार करते हैं क्योंकि ईश्वर किसी के लिए भी अच्छाई के अलावा कुछ नहीं निर्धारित करता, चाहे वह व्यक्ति उस बात को समझ न पाए।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने बचपन में ही अपने नाना से इस्लामी शिक्षाओं को इस तरह से सीख लिया था कि ईश्वरीय शिक्षाएं उनकी रग रग में बस गई थीं। उन्होंने कर्बला के आंदोलन में भी हर जगह अपनी बातों को क़ुरआने मजीद की आयतों के माध्यम से बड़े ही तर्कसंगत ढंग से पेश किया और लोगों को अपनी स्थिति से अवगत कराया। आशूरा की सुबह को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीद की सेना के सामने जो भाषण दिया था उसमें इसका उदाहरण देखा जा सकता है। उन्होंने यज़ीदी सेना से कहा कि वे ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुनें और न्याय के साथ फ़ैसला करे। उन्होंने कहा कि अगर वे लोग न्याय से काम नहीं लेंगे तो भी उनका भरोसा ईश्वर पर है और वे उनके फ़ैसले से नहीं घबराएंगे। इसके बाद उन्होंने क़ुरआने मजीद के सूरए आराफ़ की आयत संख्या 196 की तिलावत की जिसमें कहा गया हैः निसंदेह मेरा अभिभावक (और पालनहार) वह ईश्वर है जिसने (यह) किताब उतारी है और वही भले बंदों की अभिभावकता और मार्गदर्शन करता है।

यह आयत उन आयतों में से है जिनमें पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी को झुठलाने वालों के साथ उनके व्यवहार का उल्लेख किया गया है। इस आयत से पहली वाली आयत में उनसे कहा गया है कि हे पैग़म्बर! आप अनेकेश्वरवादियों के समक्ष डट जाइये और उनसे कहिए कि वे मदद के लिए अपने सहायकों को बुला लें और जो कुछ उनकी क्षमता में उसे कर लें, चाल चलें और मुझे अवसर न दें लेकिन वे भली भांति जान लें कि मेरा भरोसा केवल महान ईश्वर पर है जिसने क़ुरआने मजीद को भेजा है और वह सद्कर्मियों का साथ देता है। पैग़म्बरे इस्लाम के नाती इमाम हुसैन ने भी कर्बला में दुश्मन सेना के सामने स्पष्ट रूप से इसी आयत को चरितार्थ करते हुए कहा कि मेरा भरोसा केवल अनन्य ईश्वर पर है और मैं उसकी राह में मौत से बड़ा गौरव किसी और बात को नहीं समझता। (HN)

 

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Sep ११, २०१८ १५:३२ Asia/Kolkata
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