इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम लोगों के नेता, ईश्वरीय तर्क और इंसानों के मार्गदर्शक के रूप में अपनी मूल्यवान आयु लोगों को ज्ञान प्रदान करने, समाज को स्मस्थ बुराइयों से दूर करने और लोगों को एक दूसरे से संबंधों को बेहतर बनाने में व्यतीत की।

वे हर बुराई व पथभ्रष्टता के सामने डट जाते थे और जब समाज यज़ीद जैसे भ्रष्ट व्यक्ति के अत्याचार को सहन करने की ओर बढ़ रहा था तो इमाम हुसैन ने न केवल अपने कथनों से बनी उमय्या के अपराध का पर्दा चाक किया बल्कि सत्य की तलवार लेकर उसके मुक़ाबले में उठ खड़े हुए और अपनी शहादत तक संघर्ष करते रहे।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने इस आंदोलन को अच्छाइयों का आदेश देने और बुराइयों से रोकने का नाम दिया था और अपनी बातों व भाषणों में वे निरंतर इस महा दायित्व की याद दिलाते रहते थे। शायद कहा जा सकता है कि अपने आंदोलन के मुख्य उद्देश्य के बारे में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का इससे स्पष्ट वाक्य और कोई नहीं है कि मैं केवल अपने नाना की जाति के सुधार के उद्देश्य से उठ खड़ा हुआ हूं। मैं चाहता हूं कि भलाई का आदेश दूं और बुराइयों से रोकूं और अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम तथा पिता अली इब्ने अबी तालि के चरित्र के अनुसार व्यवहार करूं।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का यह कथन क़ुरआन मजीद की उन शिक्षाओं को चरितार्थ करता है जिनके बारे में कई आयतों में स्पष्ट रूप से आदेश दिया गया है। उदाहरण स्वरूप सूरए आले इमराना की आयत नंबर 104 में कहा गया है। तुममें एक ऐसा गुट होना चाहिए जो लोगों को भलाई का निमंत्रण दे, अच्छे कार्यों का आदेश दे और बुराइयों से रोके और ऐसे ही लोग सफलता प्राप्त करने वाले हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने भी अपने आंदोलन का उद्देश्य भलाई का आदेश देना और बुराइयों से रोकना बताया था।

अपने आंदोलन के आरंभ से लेकर शहादत तक इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का लक्ष्य अत्याचारियों से संघर्ष था और उन्होंने अपने सभी भाषणों में धर्म को सुरक्षित रखने, भलाई का आदेश देने और बुराइयों से रोकने को अपनी क्रांति का आधार बताया था। जब हुर बिन यज़ीद रियाही की कमान में यज़ीद की सेना इमाम हुसैन के सामने आ खड़ी हुई और उन्हें कूफ़ा वासियों के विश्वासघात का पता चल गया तो वे उठे और एक भाषण दिया जिसमें उन्होंने कहा कि क्या तुम नहीं देखते कि सत्य पर अमल नहीं हो रहा है और असत्य से रोका नहीं जा रहा है। इन परिस्थितियों में मोमिन के लिए आवश्यक है कि वह उठ खड़ा हो और ईश्वर से मुलाक़ात अर्थात शहादत की ओर बढ़े।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि इन परिस्थितियों में क़ुरआने मजीद सभी को समाज के सुधार का आदेश देता है क्योंकि अगर समाज में सुधार न हो और न्याय स्थापित न हो तो लोग ईमान व कल्याण तक नहीं पहुंच सकेंगे और व्यक्तिगत व मामूहिक बुराइयों से भरे हुए समाज में लोगों को किस तरह सुधारा जा सकता है? इमाम हुसैन ने अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम का यह कथन बयान किया कि जो भी यह देखे कि कोई अत्याचारी शासक ईश्वर द्वारा हराम की गई बातों को हलाल बना रहा है, ईश्वर की प्रतिज्ञाओं को तोड़ रहा है, पैग़म्बरे इस्लाम की सुन्नत या परंपरा का विरोध कर रहा है और ईश्वर के बंदों के साथ दुश्मनी और पाप कर रहा है तथा वह व्यक्ति कथन या व्यवहार के माध्यम से उस स्थिति को बदलने की कोशिश न करे तो निश्चित रूप से ईश्वर उसे पीड़ादायक दंड देगा, अतः सचेत हो जाओ और जान लो कि वे अर्थात यज़ीदी शैतान का अनुसरण कर रहे हैं। उन्होंने ईश्वर के हराम को हलाल और हलाल को हराम बना दिया है और मैं इस स्थिति को बदलने के लिए सबसे उचित हूं।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने, जिन्होंने मदीने से निकलने और यज़ीद के ख़िलाफ़ अपने आंदोलन के लिए विभिन्न आयामों को दृष्टिगत रखा था, मरवान बिन हकम से बहस के बाद उसी रात अर्थात 28 रजब वर्ष 60 हिजरी को अपने परिजनों, कुछ रिश्तेदारों और साथियों के साथ मदीना छोड़ने का फ़ैसला किया। उन्होंने मदीने की गलियों से अपने छोटे से कारवां के साथ गुज़रते हुए अपनी स्थिति को हज़रत मूसा के समान बताय जो फ़िरऔन और उसके लोगों के अत्याचारों के चलते रात के अधंकार में मरुस्थल की ओर निकल गए थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इस स्थिति को बयान करने के लिए सूरए क़सास की 21वीं आयत की तिलावत की जिसमें कहा गया हैः तो मूसा उस शहर से चिंतित और (ईश्वरीय सहायता की) प्रतीक्षा करते हुए निकल खड़े हुए। उन्होंने कहा, हे मेरे पालनहार! मुझे इस अत्याचारी जाति (के लोगों) से मुक्ति दे।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम छः दिन में मदीने से मक्के की यात्रा पूरी करके 3 शाबान सन साठ हिजरी को मक्के में दाख़िल हुए। वहां भी उन्होंने हालात पर गहरी नज़र डाल कर अपनी स्थिति की तुलना हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से की और सूरए क़सस की 22वीं आयत की तिलावत की जो हज़रत मूसा की दुआ पर आधारित है। आयत में कहा गया हैः और जब मूसा ने मदयन का रुख़ किया तो कहा आशा है कि मेरा पालनहार सीधे रास्ते की ओर मेरा मार्गदर्शन करेगा।

अत्याचार के विरुद्ध खड़े होना उन सबसे महत्वपूर्ण दायित्वों में से एक है जिनके पालन का ईश्वर ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को आदेश दिया था। ईश्वर ने अपने पैग़म्बर हज़रत मूसा से कहा कि वे अपने ज़माने के अत्याचारी शासक फ़िरऔन की भ्रष्टता और ज़ुल्म के समक्ष चुप न बैठें बल्कि लोगों को उसके अत्याचारों से बचाने के लिए उठ खड़े हों। सूरए ताहा की 24वीं आयत में कहा गया है। हे मूसा! फ़िरऔन की ओर जाओ कि निश्चित रूप से वह उद्दंडी हो गया है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने भी समाज पर छाई हुई ख़ामोशी को तोड़ दिया और अपने आंदोलन का एक अहम लक्ष्य अपने समय के फ़िरऔन के अत्याचार और भ्रष्टता के ख़िलाफ़ जेहाद बताया। उन्होंने पीड़ित व अत्याचारग्रस्त लोगों के बचाव की संस्कृति, ईश्वर की प्रसन्नता के लिए जेहाद और समाज में न्याय की स्थापना के लिए संघर्ष, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम से सीखा था। जब वे धूर्तता और पथभ्रष्टता का शिकार लोगों के समर्थन में और मानव समाज से अनेकेश्वरवाद की समाप्ति के लिए उठ खड़े हुए तो उन्होंने कहाः मैं ईश्वर के धर्म की मदद, उसकी शिक्षाओं को सम्मानीय बनाने और उसके मार्ग में जेहाद के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हूं ताकि संसार में ईश्वर का नाम सबसे ऊंचा रहे।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने आंदोलन का एक अन्य अहम लक्ष्य समाज में न्याय की स्थापना बताया था। ईश्वर द्वारा दुनिया में पैग़म्बरों को भेजने का एक बड़ा उद्देश्य न्याय की स्थापना है। क़ुरआने मजीद की अनेक आयतों में न्याय पर बल दिया गया है। उदाहरण स्वरूप सूरए नह्ल की आयत क्रमांक 90 में कहा गया हैः निश्चित रूप से ईश्वर न्याय लागू करने का आदेश देता है। इसी तरह सूरए यूनुस की 47वीं आयत में कहा गया हैः हर समुदाय के लिए एक पैग़म्बर है तो जब उनका पैग़म्बर आ जाता है तो उनके बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला किया जाता है और उन पर कोई अत्याचार नहीं होता।

न्याय इस्लामी शिक्षाओं का अटल भाग है जिसमें जीवन के सभी मामले शामिल हैं यहां तक कि माता-पिता द्वारा बच्चों के बीच न्यायपूर्ण व्यवहार पर भी बल दिया गया है किंतु इसका सबसे बड़ा व अहम कारण सामाजिक न्याय और शासन की ओर से लोगों के अधिकारों का सम्मान है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कूफ़े के प्रतिष्ठित लोगों को संबोधित करते हुए एक पत्र में लिखा था कि सच्चे नेता का दायित्व और विशेषता क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं के अनुसार शासन और न्याय स्थापित करना है। उन्होंने पत्र में लिखा थाः मुझे अपनी जान की सौगंध! इमाम (अर्थात समाज का नेता) क़ुरआन की शिक्षाओं का पालन करने वाले और न्याय स्थापित करने वाले के अतिरिक्त कोई नहीं होता। इस प्रकार हम देखते हैं कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन का एक उद्देश्य लोगों को न्याय की स्थापना के मार्ग में संघर्ष के लिए आमंत्रित करना था क्योंकि अगर न्याय न हो तो मानवता तबाह हो जाती है और ईश्वरीय व धार्मिक शिक्षाओं की समाप्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। (HN)

 

Sep ११, २०१८ १५:४१ Asia/Kolkata
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