Feb ०६, २०१९ १४:१८ Asia/Kolkata

ईरान के संविधान की 11वीं धारा में पवित्र क़ुरआन की उस आयत का वर्णन है जिसमें कहा गया है कि समस्त मुसलमान एक राष्ट्र हैं और इस्लामी गणतंत्र ईरान का यह दायित्व है कि वह मुस्लिम राष्ट्रों को एकजुट करने और उनको एक प्लेटफ़ार्म पर लाने के लिए एक परिपूर्ण या संपूर्ण नीति बनाए और कोशिश करे ताकि इस्लामी जगत की सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक एकता व्यवहारिक हो सके।

ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन की विभिन्न आयतों में मुसलमानों से एकता का अह्वान किया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम और अन्य ईश्वर दूतों और महापुरुषों ने भी हमेशा पवित्र क़ुरआन का अनुसरण करते हुए अपनी कथनी और करनी से मुसलमानों के बीच एकता की रक्षा की है। उदहारण स्वरूप पवित्र क़ुरआन के सूरए आले इमरान की आयत संख्या 103 में आया है और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रहो और आपस में मतभेद पैदा न करो और अल्लाह की अनुकंपाओं को याद करो कि तुम लोग आपस में दुश्मन थे और उसने तुम्हारे दिलों में प्रेम पैदा कर दिया तो तुम उसकी अनुकंपाओं से भाई भाई बन गये और तुम नरक के किनारे पर थे तो उसने तुम्हें निकाल लिया और अल्लाह इसी प्रकार अपनी निशानियां बयान करता है कि शायद तुम मार्गदर्शन पाने वाले बन जाओ।

जैसा कि आप जानते हैं कि पूरे इतिहास के दौरान साम्राज्यवादी शक्तियां और फ़िरऔन जैसे लोग, लोगों के बीच हमेशा से मतभेद फैलाने के प्रयास में रहे हैं ताकि सरलता से अपने साम्राज्यवादी लक्ष्यों तक पहुंच सकें। वे इस्लामी जगत पर वर्चस्व जमाने और मुसलमानों को महा इस्लामी संस्कृति व सभ्यता से रोकने के अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मुसलमानों के बीच मतभेद और उनको आपस में लड़ाने को बेहतरीन साधन समझते थे। इसीलिए उन्होंने वहाबी जैसे अवास्तविक और ढोंगी मत का आधार रखकर समस्त मुसलमानों को काफ़िर और अधर्मी क़रार दिया ताकि उनकी हत्या और उनके जनसंहार का औचित्य पेश कर सकें।  उसके बाद हिंसा की संस्कृति फैलाकर इस्लामी संस्कृति का दमन किया और राष्ट्रों, जातियों और देशों के इतिहास को बदलने का प्रयास किया। उन्होंने स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए राष्ट्रों को प्रेरित करके पिट्टु सरकारों के विरुद्ध खड़ा कर दिया ताकि जब भी मुसलमान दूसरों की ओर भाईचारे के लिए हाथ बढ़ाएं उन्हें अपने पूर्वजों की याद आए और उनके दिलों में द्वेष और मतभेद की आग भड़क उठे।

इस्लामी गणतंत्र ईरान ने अपने गठन के आरंभ से ही इस महत्वपूर्ण विषय पर बहुत अधिक ध्यान दिया। इस्लामी क्रांति के महान नेता इमाम ख़ुमैनी ने मुसलमानों के बीच एकता और एकजुटता को इस्लामी क्रांति के मुख्य कार्यक्रमों में से एक क़रार दिया। उन्होंने इस्लामी क्रांति की सफलता से 15 साल पहले ख़ुरदाद 1343 हिजरी शम्सी में घोषणा की कि हमारा कार्यक्रम, इस्लाम का कार्यक्रम है, मुसलमानों की एकता है, मुस्लिम देशों की एकता है, समस्त मुस्लिम पंथों और मतों से भाईचारा और पूरी दुनिया में समस्त इस्लामी सरकारों से एकता है।

 

इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गिय इमाम ख़ुमैनी के इस्लामी जगत की एकता पर बल और मुसलमानों की आकांक्षाओं को सही अर्थों में व्यवहारिक करने के प्रयास से मुस्लिम देश एक दूसरे से निकट हुए और इस्लामी पंथों के बीच समरस्ता के विभिन्न नमूने व्यवहारिक हुए।

इमाम ख़ुमैनी मुसलमानों के बीच एकता के महत्व और इस्लामी सरकार के गठन में उसके प्रभाव पर विश्वास रखते थे।  उन्होंने इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ में 1348 में दिए अपने भाषण में कहा कि हम इसलिए कि मुसलमानों के बीच एकता को सुनिश्चित बनाएं, इसीलिए कि इस्लामी देश को साम्राज्यवादियों और उनकी पिट्ठु सरकारों के प्रभाव व नियंत्रण से मुक्ति दिलाएं, हमारे पास सरकार गठित करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है, चूंकि मुस्लिम राष्ट्रों की स्वतंत्रता और एकता व्यवहारिक बनाने के लिए हमें अत्याचारी और पिट्ठु सरकारों को उखाड़ फेंकना होगा, उसके बाद हम न्यायप्रिय इस्लामी सरकार का गठन करेंगे जो जनता की सेवा करे, सरकार का गठन मुसलमानों की एकता और व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए है। 

 

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद, ईरान की विदेश और आंतरिक नीति के एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में इस्लामी एकता पर विशेष ध्यान दिया गया। इस्लामी गणतंत्र ईरान का संविधान भी पवित्र क़ुरआन को आधार बनाते हुए सरकार को इस बात का ज़िम्मेदार क़रार देता है ताकि वह मुस्लिम राष्ट्रों के बीच व्यापक एकता और एकजुटता पैदा करने की परिधि में अपनी नीतियां बनाए। ईरान के संविधान की 11वीं धारा में पवित्र क़ुरआन की उस आयत का वर्णन है जिसमें कहा गया है कि समस्त मुसलमान एक राष्ट्र हैं और इस्लामी गणतंत्र ईरान का यह दायित्व है कि वह मुस्लिम राष्ट्रों को एकजुट करने और उनको एक प्लेटफ़ार्म पर लाने के लिए एक परिपूर्ण या संपूर्ण नीति बनाए और कोशिश करे ताकि इस्लामी जगत की सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक एकता व्यवहारिक हो सके।

इस्लामी गणतंत्र ईरान ने जो समस्त वर्गों और जातियों की एकता की छत्रछाया में अस्तित्व में आया है, आरंभ में ही एकता सप्ताह के विषय को पेश किया जो शीया मुसलमानों और सुन्नी समुदाय के बीच एकता का चिन्ह है। एकता सप्ताह की घोषणा और मुसलमानों के बीच धार्मिक मूल्यों के अनुसरण के लिए इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह का प्रयास, मुस्लिम समाय में संयुक्त बिन्दुओं को उजागर करने के लिए था। इस आधार पर 12 रबीउल से 17 रबीउल अव्वल के बीच उन्होंने एकता सप्ताह मनाने की घोषणा की हैं। चूंकि सुन्नी मुसलमानों की रिवायत के हिसाब से 12 रबीउल अव्वल पै़ग़म्बरे इस्लाम (स) के जन्म की तारीख़ है जबकि शीया मुसलमान 17 रबीउल अव्वल को पैग़म्बरे इस्लाम का जन्म दिन मनाते हैं।

 

उसके बाद ईरान और पूरी दुनिया में विभिन्न कार्यक्रम, इस्लामी कांफ़्रेंस और समारोहों का आयोजन करके इस्लामी एकता और भाईचारे को मज़बूत करने के साथ महा इस्लामी सभ्यता की प्राप्ति के लिए भूमि प्रशस्त की गई। ईरान के संविधान में भी इस कार्यक्रम को पेश किया गया है। इस प्रकार से कि इस्लामी धर्मों के अनुयायी पूर्ण स्वतंत्रता के साथ अपने धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करें और अपनी आस्थाओं को व्यक्त कर सकें। वह मतभेद वाले मुद्दों के संबंध में न्यायालय का रुख़ कर सकते हैं जो उनके दृष्टिकोणों और उनके धर्मों के आधार पर आदेश जारी करता है। 

इमाम ख़ुमैनी के बाद आयतुल्लाहिल  उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने भी इस्लामी एकता और एकजुटता पर विशेष रूप से ध्यान दिया। उन्होंने नेतृत्व संभालने के आरंभिक दिनों में ही मतभेदों को दूर करने की ओर संकेत किया और कहा कि जब हम एकता का नारा देते हैं, तो उसमें दो महत्वपूर्ण बिन्दु हमारे ध्यान का केन्द्र होना चाहिए। इन दो बिन्दुओं में से एक, मतभेदों और विरोधाभासों, झगड़ों और उल्लंघनों को दूर करना है जो शताब्दियां पहले से आज तक मुसलमानों के बीच पाए जाते हैं। यह विरोधाभास हमेशा से मुसलमानों के लिए हानिकारक रहे हैं। दूसरा बिन्दु यह है कि एकता को सेवा और इस्लाम को मज़बूत करने की दिशा में होन चाहिए। यदि मुस्लिम धर्मगुरु मानते हैं कि पवित्र क़ुरआन सूरए निसा की आयत संख्या 64 में कहता है कि और हमने किसी ईश्वरीय दूत को नहीं भेजा है मगर इसलिए कि ईश्वरीय आदेश से उसका अनुसरण किया जाए और काश जब उन लोगों ने अपनी आत्मा पर अत्याचार किया था तो आपके पास आते और स्वयं भी अपने पापों के लिए क्षमा याचना करते और ईश्वरीय दूत भी उनके पक्ष में क्षमा याचना करते तो ईश्वर को बड़ा ही प्रायश्चित स्वीकार करने वाला और दयालु पाते। अर्थात ईश्वरीय दूत केवल इसीलिए नहीं आए थे कि नसीहत करें, बातें करें, लोगों को भी अपना काम करना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए बल्कि इसलिए आए ताकि उनका अनुसरण किया जाए, समाज और जीवन का मार्गदर्शन करें, व्यवस्था गठित करें और मनुष्यों को जीवन के सही लक्ष्यों की ओर ले जाएं, इसीलिए इस्लाम को मज़बूत करने की ओर क़दम बढ़ना चाहिए, इस्लामी समाज और मुस्लिम देशों में इस्लाम की मज़बूती एक संभव काम है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई हमेशा अपने बयानों और भाषणों में इस्लामी एकता के विषय पर विशेष ध्यान देते हैं। उन्होंने इस संबंध में व्यवहारिक क़दम उठाते हुए धर्मों की एकता परिषद या धर्मों को एक प्लेटफ़ार्म पर लाने वाली परिषद का गठन करके इस्लामी एकता कांफ़्रेंस के निसंकोच समर्थन करके इस आवश्यकता और इसके महत्व को सिद्ध किया। इस्लामी धर्मों की एकता परिषद का संदेश, इस्लामी धर्मों और मतों के बीच पायी जाने वाली सोच को मज़बूत करना और अन्य पंथों व धर्मों के बारे में जानकारी के स्तर को बढ़ाना तथा परस्पर सम्मान को मज़बूत करना और मुसलमानों के बीच एकता की प्राप्ति के लिए मुसलमानों के बीच इस्लामी भाईचारे के रिश्ते को मज़बूत करना है।

 

एक वैश्विक व ग़ैर सरकारी संगठन के रूप में इस्लामी एकता के लिए 1369 हिजरी शम्सी में वर्ल्ड अहलेबैत परिषद का भी गठन किया गया। यह परिषद समस्त मुसलमानों विशेषकर पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के अनुयायियों के बीच एकता और दुनिया भर के मुसलमानों के समर्थन की ज़िम्मेदारी अदा करती है।

निसंदेह इस्लामी एकता या मतभेदों में मुस्लिम वरिष्ठ धर्मगुरुओं के फ़त्वे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। यदि वरिष्ठ धर्मगुरु या मुफ़्ती, दूसरे मुस्लिम भाईयों के कार्यक्रमों में शामिल होने के वैध होने जैसे फ़त्वे दें तो मुसलमानों में एकता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

इस्लामी गणतंत्र ईरान के वरिष्ठ नेता और शीया मुसलमानों के वरिष्ठ धर्मगुरु और नेता के रूप में आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई का सुन्नी मुसलमानों की जमाअत में शीया मुसलमानों के शामिल होने और इसी प्रकार पै़ग़म्बरे इस्लाम की पत्नी पर आरोप लगाने सहित सुन्नी भाइयों के प्रतीकों के अनादर के हराम होने पर आधारित फ़त्वों का इस्लामी जगत विशेषकर सुन्नी धर्मगुरुओं ने व्यापक स्तर पर स्वागत किया जो शीया और सुन्नी मुसलमानों के बीच अधिक एकता, समरस्ता और प्रेम का कारण बना है।

अंत में यह कहा जा सकता है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान पिछले चालीस वर्षों के दौरान इस्लामी धर्मों और पंथों के बीच सच्चाई से प्रयास कर रहा है और उसने हमेशा से रणनैतिक मुद्दे के रूप में इस्लामी एकता और समरस्ता को दृष्टिगत रखा है। (AK)

 

 

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