Feb ०६, २०१९ १६:१६ Asia/Kolkata

ईरान की इस्लामी क्रांति ने इस्लामी समाजों को निष्क्रियता से निकालकर अपनी खोई हुई इस्लामी पहचान को प्राप्त करने के लिए संघर्ष किया। 

इस्लामी उच्च शिक्षाओं को पेश करके उसने मुसलमानों को उनकी वास्तविक इस्लामी पहचान हासिल कराने में सहायक भूमिका निभाई।  इस्लामी क्रांति ने पुनः इस्लामी शिक्षाओं को आदर्श के रूप में पेश किया।

ईरानी जनता एसी स्थिति में इस्लामी क्रांति की 40वीं वर्षगांठ मनाने जा रही है कि जब उनकी क्रांति की गूंज पूरे संसार में सुनाई दे रही है।  इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभिक दिनों में जब स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ईरानी जनता से क्रांति के निर्यात की बात कहा करते थे तो उस समय बहुत से लोग उनकी बात की गहराई और उसके महत्व को समझ नहीं सके थे।  अब क्रांति के चार दशकों के बाद इस क्रांति के समर्थन और विरोधी सब ही इस बात के साक्षी हैं कि बिना किसी रक्तपात के इस्लामी क्रांति ने इस्लामी जगत में अपना स्थान बना लिया है।  इसका मूल कारण यह है कि ईरान की इस्लामी क्रांति का संदेश, मानव जाति की प्रवृत्ति के अनुरूप है।  इस बारे में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि इस्लामी क्रांति और इस्लाम की अवधारणा, बसंत ऋतु के फूल जैसी है।  कोई भी उनका मुक़ाबला नहीं कर सकता।  यह हर जगह खिलते हैं और उनकी सुगंध हर ओर फैलती है।

ईरान की इस्लामी क्रांति ने इस्लामी समाजों को निष्क्रियता से निकालकर अपनी खोई हुई इस्लामी पहचान को प्राप्त करने के लिए संषर्घरत किया।  इस्लामी उच्च शिक्षाओं को पेश करके उसने मुसलमानों को उनकी इस्लामी पहचान हासिल करने में सहायक भूमिका निभाई। इस्लामी क्रांति ने पुनः इस्लामी शिक्षाओं को आदर्श के रूप में पेश किया।  हालांकि लंबे समय से इस्लामी समाज इस वास्तविकता को भूल चुका था।  ईरान की इस्लामी क्रांति उस शासन के मुक़ाबले में निहत्थी सफल हुई जो पूरी तरह से सशस्त्र था और उसे अमरीका जैसी महाशक्ति का पूरा आशीर्वाद प्राप्त था।  इस्लामी क्रांति की सफलता का संदेश पूरे संसार के लिए यह था कि इस्लामी समाज स्वतंत्र रहकर प्रगति कर सकता है।  इसे इस्लामी शिक्षाओं पर अमल करके ही संभव बनाया जा सकता है।

ईरान की इस्लामी क्रांति ने विभिन्न राष्ट्रों विशेषकर लेबनान के शियों को बहुत प्रभावित किया।  इस्लामी क्रांति की सफलता के समय लेबनान में रहने वाले शिया समुदाय की तत्कालीन स्थति इस प्रकार की थी कि उसके भीतर इस्लामी क्रांति के संदेश को हासिल करने की पूरी योग्यता मौजूद थी।  इस्राईल से अरबों की लगाता पराजय, लेबनान के लोगों के बीच इस्राईल का भय, इस्राईल के मुक़ाबले में लेबनान के संघर्षकर्ता गुटों की पराजय और इसी प्रकार की बातें लेबनान की जनता में शत्रु के प्रति घृणा का कारण बन रही थीं।  एसे में लेबनानियों के दिलों में इस्लाम की सफलता की कामना पाई जाती थी।

इन परिस्थितियों में जब ईरानी जनता ने अत्याचारियों के मुक़ाबले में सफलता अर्जित की तो लेबनान के शियों में भी अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का साहस बढ़ा।  यही कारण है कि ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के कुछ समय के बाद इमाम खुमैनी की शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए 80 के दशक में लेबना में हिज़बुल्लाह का गठन हुआ।  सन 1985 में हिज़बुल्लाह के आधिकारिक मेनिफेस्टो में स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि इमाम खुमैनी ही क्रांति लाने के मुख्य कारक हैं और हम उनकी शिक्षाओं का पालन करेंगे।  हिज़बुल्लाह ने इस्राईल का मुक़ाबला करते हुए उसे कई बार परास्त किया और दक्षिणी लेबनान से इस्राईल को निकाल बाहर किया।  हिज़बुल्लाह ने इस्राईल के मुक़ाबले में संघर्ष के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और साथ ही लेबनान के राजनीतिक पटल पर भी यह सक्रिय रहा।  उसने अपने प्रयासों से लेबनान की संसद में प्रवेष किया और स्थानीय एवं निकाय चुनावों में भी सफलताएं अर्जित कीं।  वर्तमान समय में हिज़बुल्लाह लेबनान में ऐसी स्थिति मेंपहुंच चुका है कि उसे इस देश की राजनीति का अनेदखा किया ही नहीं जा सकता।  यह सब इस स्थति में है कि जब इससे पहले लेबनान के राजनैतिक पटल पर शियों की कोई विशेष उपस्थिति नहीं थी।

नाईजीरिया भी एसा देश है जो ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रभावित रहा है।  हालांकि भौगौलिक दृष्टि से ईरान तथा नाइजीरिया के बीच लंबी दूरी पाई जाती है किंतु इस्लामी क्रांति के संदेश को वहां स्वीकार किया गया।  नाइजीरिया, अफ्रीका महाद्वीप के अधिक जनसंख्या वाले देशों में से एक है।  नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार नाइजीरिया, इस्लामी जगत के अधिक जनसंख्या वाले देशों में तीसरे नंबर पर है।  नाइजीरिया की जनसंख्या 19 करोड़ है।  यहां की आधी जनसंख्या मुसलमान है।  40 प्रतिशत इसाई हैं और 10 प्रतिशत लोग अन्य धर्मों के अनुयाई हैं।  नाईजीरिया के अधिकांश मुसलमान मालेकी हैं।  दूसरी हिजरी क़मरी में व्यापारियों तथा धर्म प्रचारकों के माध्यम से इस्लाम नाइजीरिया पहुंचा था।  बाद में दसवीं शताब्दी में नाइजीरिया में साम्राज्यवाद के क़दम पड़ते ही वहां पर इसाई धर्म का प्रचार होने लगा और धीरे-धीरे वहां से मुसलमान शासन को अलग-थलग कर दिया गया।

ईरान की इस्लामी क्रांति ने नाइजीरिया के मुसलमानों को आशा की किरण बंधाई।  नाइजीरिया के वरिष्ठ धर्मगुरू हैं आयतुल्लाह ज़कज़की।  जिस समय इस्लामी क्रांति सफल हुई उस समय आयतुल्लाह ज़कज़की अपने देश में धार्मिक गतिविधियां किया करते थे।  स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी से भेंट करने के बाद वे शिया मुसलमन हो गए।  जब वे वापस नाइजीरिया गए तो उन्होंने अपने देश में मुसलमानों को जागरूक बनाने के लिए अथक प्रयास आरंभ किये।  शेख ज़कज़की ने अपने प्रयासों से नाइजीरिया में बहुत बड़े इस्लामी आन्दोलन का आरंभ किया।  पिछले तीन दशकों की उनकी गतिविधियों के कारण नाइजीरिया में शियों की संख्या बढ़कर एक करोड़ हो गई।

नाइजीरिया के मुसलमान जो ईरान की इस्लामी क्रांति से पहले धर्म विरोधी गतिविधियों के मुक़ाबले में लगभग निष्क्रिय थे इसके बाद बहुत ही सक्रिय हो गए।  उनके लिए इस्लामी क्रांति, शुभ संदेश लेकर आई।  वे लोग धर्म की रक्षा के लिए अपनी जान हथेली पर रखकर आगे बढ़ने लगे।  पहल नाइजीरिया क स्कूलों में पढ़ने वाली मुसलमान लड़कियां इस्लामी आवरण या हिजाब नहीं पहन सकती थीं।  उनपर हिजाब पहनने पर प्रतिबंध था।  बाद में उत्तरी नाइजीरिया के लोगों ने प्रयास करके मुस्लिम बाहुल्य प्रांतों के स्कूलों में हिजाब को लागू करवाया।  नाइजीरिया वासियों ने अपने देश मेंइस्लामी क़ानून लागू करवाने के लिए प्रदर्शन आरंभ किये।  अंततः नाइजीरिया के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में इस्लामी क़ानून लागू किये गए।

आयतुल्लाह ज़कज़की

 

इस समय नाइजीरिया के मुसलमान पहले कि तरह निष्क्रिय न रहकर धार्मिक मामलों में बहुत सक्रिय हैं।  इस्लामी क्रांति की सफलता के साथ ही नाइजीरिया में जो आन्दोलन आरंभ हुआ उसने लोगों को शिया मत समझने में बहुत मदद की।  वहां पर अब शिया मत के बारे में शोध किये जा रहे हैं।  जहां पर इससे पहले शिया मत को कम ही लोग जानते थे वहां पर बहुत ही कम समय में शिया मुसलमानों की संख्या लाखों तक पहुंच चुकी है।

सन 1979 में जब ईरान में इस्लामी क्रांति सफल हुई उससे बीस वर्ष पहले से इमाम ख़ुमैनी ज़ायोनी शासन को अवैध ही कहा करते थे।  उनका कहना था कि इस्राईल, मध्यपूर्व में कैंसर के रूप में मौजूद है।  उनका कहना था कि इस्राईल के विरुद्ध संघर्ष इसलिए है क्योंकि यह पूरे इस्लामी जगत के लिए गंभीर ख़तरा है अतः इसका मुक़ाबला किया जाना चाहिए।  इस्राईल से मुक़ाबला, इस्लामी क्रांति के मौलिक सिद्धांतों में से है।  स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने पवित्र रमज़ान के अन्तिम जुमे को "क़ुदस दिवस" के रूप में घोषित किया।  इस प्रकार उन्होंने मुसलमानों को फ़िलिस्ती के विषय से भलिभांति अवगत कराने का प्रयास किया।

इमाम ख़ुमैनी का कहना था कि फ़िलिस्तीन का मामला अरब जगत या सुन्नी शिया का मामला नहीं है बल्कि यह इस्लाम का मामला है जो मुसलमानों के लिए सबसे अधिक महत्व रखता है।  इसीलिए उनका कहना था कि सारे मुसलमान एकजुट होकर फ़िलिस्तीन संकट के समाधान के लिए प्रयास करे।  इसके बाद से फ़िलिस्तीनी संघर्षकर्ताओं ने अपनी रणनीति बदल दी और इस्राईल के विरुद्ध संघर्ष को सबसे ऊपर रखा।  एक फ़िलिस्तीनी नेता का कहना है कि ईरान की इस्लामी क्रांति ने फ़िलिस्तीनी आन्दोलन के सामने एेसा मार्ग प्रशस्त किया कि फिलिस्तीन संकट को इस्लामी दृष्टिकोण से देखा जाए। 

 

ईरान की इस्लामी क्रांति ने हिजाब, अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, धर्म तथा राजनीति के बीच संबन्ध और इस्लामी सरकारों के गठन जैसी भावना को इस्लामी जगत में जागृत किया।  इसने इस्लामी जागरूकता आन्दोलन को भी बहुत प्रभावित किया।  लिबरलिज़्म और कम्यूनिज़्म के चरम के काल में बहुत कम ही लोग एसे थे जो धर्म की ओर झुकाव रखते थे और बहुत से लोग इस बारे में शंका ग्रस्त थे कि क्या कोई इस्लामी क्रांति भी आ सकती है।  इस्लामी क्रांति ने यह सिद्ध कर दिया कि वास्तविक शक्ति तो ईश्वर के पास ही है।  उससे सहायता लेकर अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए प्रयास किये जा सकते हैं।

जब मुसलमानों ने इस्लामी क्रांति की वास्तविकता को देखा तो उसके बाद से इस्लामी जागरूकता की गति उससे कही अधिक तेज़ हो गई जिसके बारे में पहले सोचा जाता था।  इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद दबे-कुचले राष्ट्रों में पिट्ठू सरकारों के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस पैदा हुआ।  इसी के साथ वंचित राष्ट्रों में अपनी स्थिति को परिवर्तित करने की आशा बढ़ी।  ट्यूनीशिया, लीबिया, मिस्र, बहरैन और यमन के राष्ट्रों ने पिट्ठू सरकारों के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की।  हालांकि इन आन्दोलनों को सफलताएं नहीं मिल सकीं किंतु इस्लामी राष्ट्रों के बीच उत्पन्न होने वाली जागरूकता एसी महापूंजी है जिसने एकल इस्लामी समाज के दृष्टिकोण को अधिक सुदृढ़ किया है।

 

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