Feb ०६, २०१९ १६:५१ Asia/Kolkata

आज कल पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की प्यारी बेटी, हज़रत फ़ातेमा सलामुल्लाह अलैहा का शहादत दिवस मनाया जा रहा है।

यह पैग़म्बरे इस्लाम की वही बेटी हैं जिन्हें वह अपने पिता की माता और अपने जिगर का टुकड़ा कहा करते थे। पैग़म्बरे इस्लाम कहते थे कि हे फ़ातेमा! निश्चित रूप से ईश्वर तुम्हारे क्रोध  से क्रोधित और तुम्हारी प्रसन्नता से प्रसन्न होता है।

 

हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) पैग़म्बरे इस्लाम की वह बेटी थीं जिन्हें उनके पिता, मानवरूप में फरिश्ता कहा करते थे और कहतेः हे फातेमा! ईश्वर ने तुम्हें चुन लिया और उसने तुम्हें पवित्र बनाया, तुम्हें पूरी दुनिया की महिलाओं  पर वरीयता प्रदान की । इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि जो भी फ़ातेमा से श्रद्धा रखेगा वह स्वर्ग में मेरे साथ होगा और जो उनसे दुश्मनी रखेगा उसका ठिकाना नर्क है। इतिहास में लिखा है कि जब भी हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) अपने पिता के पास जाती थीं वह खड़े होकर उनका स्वागत करते, उनका माथा चूमते और उनका हाथ पकड़ कर उन्हें उस जगह बिठाते जहां वह स्वंय बैठे होते और जब भी किसी यात्रा से वापस आते तो सब से पहले अपनी बेटी के पास जाते और उनका गला चूमते और कहते कि मुझे फ़ातेमा से स्वर्ग की सुगंध महसूस होती है। इसी प्रकार यात्रा पर जाने से पहले पैग़म्बरे इस्लाम सब से अंत में अपनी बेटी से मिलते जब लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम से यह पूछा कि आप किसे सब से ज़्यादा चाहते हैं ?तो वे हमेशा यही जवाब देते, अपनी बेटी फ़ातेमा को।

 

पैग़म्बरे इस्लाम की यह  प्यारी बेटी ऐसी दशा में शहीद हुई कि न तो उनकी क़ब्र का पता था और न ही अभी तक निश्चित रूप से यह पता चल पाया कि शहीद होने के बाद उन्हें दफ़्न कहां किया गया था?  किसी को यह नहीं मालूम कि उन्हें मस्जिदे नबी में दफ़्न किया गया, उनके पिता के पास या फिर कहीं और?

 

पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की इस बेटी पर , पैग़म्बरे इस्लाम की शहादत के कुछ ही दिनों बाद इतने दुखों के पहाड़ तोड़े गये कि नबी की इस प्यारी बेटी को यह कहना पड़ा कि बाबा! आप के बाद मुझ पर इतनी मुसीबत पड़ी कि अगर दिनों पर पड़ती तो वह रात बन जाते। हज़रत फ़ातेमा पर हर तरह के अत्याचार किये गये। पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के मात्र दस दिनों के भीतर पहले खलीफा ने , फ़दक नामक बाग से हज़रत फातेमा के मज़दूरों को भगा दिया और यह बाग दूसरे को दे दिया। इसकी जब सूचना हज़रत फातेमा को हुई तो उन्होंने अपने इस अधिकार के लिए मस्जिदुन्नबी जाने का फैसला किया।

 

 

जब लोगों को यह पता चला कि पैग़म्बरे इस्लाम की बेटी लोगों से बात करना चाहती हैं तो सब लोग मस्जिदे नबी में एकत्रित हो गये। मस्जिद में हज़रत फातेमा के प्रवेश के लिए एक तरफ पर्दा लगा दिया गया था। हज़रत फातेमा कई महिलाओं के साथ मस्जिद में गयीं और जब वह मस्जिद में प्रविष्ट हुईं तो लोगों को , पैगम्बरे इस्लाम की याद आ गयी। स्वंय हज़रत फातेमा , भी अपने पिता के स्वर्गवास के बाद पहली बार उनकी मस्जिद में आयी थीं, पैग़म्बरे इस्लाम की खाली जगह पर उनकी नज़र पड़ी तो उन्हों ने एक दर्दभरी आह खींची , उनकी आह में ही इतना दर्द था कि मस्जिद में उपस्थित लोग ज़ोर ज़ोर से रोने लगे। हज़रत फातेमा ने अपने पिता की शैली में  इस प्रकार से भाषण से शुरु कियाः ईश्वर की समस्य कृपाओं पर हम उसके आभारी हैं , उस ईश्वर के आभारी हैं जिसकी अनुकपांओं को गिनना संभव नहीं है और जिसका बदला नहीं दिया जा सकता और जिसकी सीमा का अनुमान नहीं है।

 

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने अपने भाषण के आरंभ में ईश्वर का गुणगान किया और समाज के मार्गदर्शन के लिए पैग़म्बरे इस्लाम ने जो दुख उठाए हैं उनकी ओर संकेत किया और फिर कहा कि हे लोगो! जान लो! मैं फातेमा हूं और मेरे पिता , मुहम्मद हैं। मैं जो भी कह रही हूं वह शुरु से लेकर आखिर तक , सही है। मैं न फालतू बात करती हूं न गलत काम । इसके बाद हज़रत फातेमा ज़हरा ने अपने पति और चचेरे भाई हज़रत अली अलैहिस्लाम और पैगम्बरे इस्लाम के मध्य संबंध पर बात की और लोगों के सामने हज़रत अली अलैहिस्सलाम का अधिकार स्पष्ट किया।

 

हज़रत फातेमा ज़हरा ने अपने प्रसिद्ध भाषण में कहा कि मैं उसी हस्ती की बेटी हूं जिसने तुम सब को दुर्भाग्य से बाहर निकाला और तुम्हारे लोक परलोक को बचा लिया। तुम्हारा जीवन ऐसा था कि न तुम्हारे पास स्वच्छ पीने का पानी था और ठीक से खाना। तुम्हारा सांसारिक जीवन निर्धनता, दुखों और भाइयों की हत्या में गुज़रता था। तुम सब पथ भ्रष्ट व मूर्तिपूजा करने वाले थे और उन्होंने तुम्हे ईश्वर से परिचित कराया और सब से अच्छा धर्म तुम्हारे सामने पेश किया। पैग़म्बरे इस्लाम ने तुम्हें मानवता की परिपूर्णता तक मार्गदर्शन किया। इस दुनिया में किसी ने भी उनकी भांति मानवता की सेवा नहीं की। जब तक वह तुम्हारे बीच थे , अत्याधिक दुख सहन किये और इस मार्ग में वह अली ही थे जो हमेशा उनके साथी और सहायक रहे। कभी जब तुम सब शांति के साथ अपने कामों में व्यस्त रहते तो उस समय अली , धर्म की रक्षा के लिए अजगर के सामने स्वंय को डाल देते। अन्ततः पैगम्बरे इस्लाम और अली के संघर्ष से , इस्लाम धर्म स्थापित हुआ और तुम सब इस गौरव और सम्मान तक पहुंचे।

 

हज़रत फातेमा ज़हरा ने इसके बाद कहा कि जब तक पैगम्बरे इस्लाम जीवित थे यह सब हरेक के लिए गौरव था किंतु उनके जाते ही, तुम्हारे मध्य क्या घटना घटी है? मेरे पिता की स्वर्गवास के बाद , मिथ्याचार तुम लोगों में बढ़ने लगा है और शैतान ने तुम पर क़ब्ज़ा कर लिया। तुम लोग सब कुछ भूल गये हो मानो , तुम्हारे लिए इस्लाम का मात्र नाम रह गया है और इस्लामी की सच्चाई को तुम सब भूल चुके हो।

 

अपने ऐतिहासिक भाषण में हज़रत फातेमा ने वह सब कुछ कहा जो ज़रूरी था। भले ही वह अपने पति हज़रत अली अलैहिस्सलाम को उनका हक़ नहीं दिला पाई लेकिन सच्चाई को तो इतिहास के माथे पर क़यामत तक के लिए लिख दिया। फदक का वह बाग़ जो हज़रत फातेमा से छीन लिया गया था , मात्र एक बहाना था , हज़रत फातेमा फदक नहीं बल्कि अपने और अपने पति के अधिकार के लिए गयी थीं। कहा जाता है कि अगर हज़रत फातेमा ने इस प्रकार से उनके हक़ के लिए आवाज़ नहीं उठायी होती तो शायद बाद में भी हज़रत अली को उनका हक़ न मिलता।

 

 हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में अपने पति हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपने पास बुलाया, हज़रत अली की आंखों से आंसू जारी था इसी दशा में वह हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) के पास पहुंचे तो उन्होंने  हज़रत अली अलैहिस्सलाम से कहा: मेरा जीवन बस कुछ ही क्षणों तक है, कुछ वसीयत करना चाहती हूं। हज़रत अली ने कहा : जो दिल में है वह कह दो । यह कह कर हज़रत अली अलैहिस्सलाम, उनके सामने बैठ गये। हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) ने कहाः आप ने कभी मुझ से झूठ नहीं सुना और न ही बुराई देखी है और जब से मैंने आप के साथ संयुक्त जीवन आरंभ किया, आप की किसी बात का विरोध मैंने नहीं किया। हज़रत अली  ने कहाः ईश्वर की सौगंध, तुम्हें मुझ से अधिक पता है, तुम इससे कहीं बेहतर, ईश्वर से डरने वाली  महान व प्रतिबद्ध हो कि मैं तुम में कमी निकालूं, तुम से दूरी मेरे लिए बहुत भारी है, तुम्हें खो देना मेरे लिए ऐसा दुख है कि उससे बड़ा, उससे अधिक पीड़ादायक और दुखदायी मेरे लिए कोई दुख नहीं है। ईश्वर की सौगंध ! यह एेसा दुख है कि जिसका शोक मनाने की ताक़त मुझ में नहीं रही और कोई भी चीज़ इसकी क्षतिपूर्ति नहीं कर सकती।  यह कहते-कहते हज़रत अली अलैहिस्सलाम की आंखें फिर छलक आयीं और फिर दोनों रोने लगे   फिर हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहाः फ़ातेमा जो कहना चाहती हो कहो मैं तुम्हारी हर बात का पालन करूंगा। हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) ने कहाः " जिन लोगों ने मेरे साथ अन्याय किया है और मेरे अधिकारों का हनन किया है उन्हें मेरी जनाज़े पर मत आने देना, वह मेरे दुश्मन और पैग़म्बरे इस्लाम के दुश्मन हैं, वह मेरी नमाज़े मैयत में भी भाग न लें, एे अली जब रात को आंखें सो जाएं तब आप मुझे दफ़्न करिएगा।"

 

हज़रत फातेमा ज़हरा के दर्द को उनकी वसीयत से समझा जा सकता है। यह इस्लाम की सब से महान आदर्श महिला की संक्षिप्त जीवनी है जिसने अपने कुछ दिनों के जीवन में रहती दुनिया तक के लिए उदाहरण स्थापित कर दिया।

 

 इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) की महानता का वर्णन करते हुए कहते हैंः इस्लाम ने हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) को महिलाओं के आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी जीवन शैली, उनका संघर्ष, उनका ज्ञान, उनकी भाषण की क्षमता, उनका बलिदान, उनकी पतिव्रता, उनका मातृत्व, उनका दांपत्य जीवन, उनका पलायन और सभी राजनीतिक, क्रांतीय और सैन्य क्षेत्रों में प्रभावशाली उपस्थिति यह सब कुछ वह चीजें हैं जिनकी वजह से बड़े बड़े व महान पुरुष भी उनके सम्मान में शीश नवाने  पर विवश हो जाते हैं। उनकी उपासना, उनकी दुआएं, उनकी किताब, उनका आध्यात्म और उनकी पवित्रता सब कुछ इस बात का सूबूत है कि वह हज़रत अली अलैहिस्सलाम और पैगम्बरे इस्लाम के समान थीं, स्त्री होना यह है। इस्लाम महिलाओं का जो आदर्श चाहता है वह यह है।

हम हज़रत फ़ातेमा जह़रा (स) के शहादत दिवस पर एक बार फिर आप सब की सेवा में संवेदना प्रकट करते हैं। और आशा करते हैं कि विश्व भर की सभी महिलाएं उन्हें आदर्श बना कर विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाएंगी और अच्छे समाज का निर्माण करेंगीं। (Q.A.)

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