Sep ०७, २०१९ १३:३५ Asia/Kolkata

हमने बताया कि मुआविया ने धूर्तता के साथ इस्लामी सत्ता पर अधिकार किया और फिर अपने बाद अपने कुकर्मी बेटे यज़ीद को सत्ता सौंपी यज़ीद ने अपने बुरे कामों और इस्लाम की शिक्षाओं में फेरबदल के अपने अभियान को औपचारिकता प्रदान करने के लिए इमाम हुसैन से आज्ञापालन की प्रतिज्ञा मांगी। 

इमाम हुसैन ने इन्कार किया और यज़ीद ने उनकी हत्या का प्रयास किया तो इमाम हुसैन मदीना नगर से निकल पड़े और अपने कुछ साथियों के साथ कर्बला नामक क्षेत्र में जो आज इराक़ का एक नगर है , फुरात नदी के तट पर पड़ाव डाला , यज़ीद की सेना ने वहां इमाम हुसैन और उनके साथियों को घेर लिया और मानव इतिहास की एक एसी अभूतपूर्व लड़ाई की तैयारी आंरभ हो गयी जिसके दोनों पक्षों में किसी भी प्रकार से कोई समानता नहीं थी।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने  सत्य व असत्य के मध्य अंतर को स्पष्ट करने के लिए जो आंदोलन आंरभ किया था उसके क़दम क़दम पर उनका यही प्रयास था कि  बुराईयों के प्रतीय यज़ीद ने , इस्लाम का जो मुखौटा लगा रखा है उसे नोंच कर इस्लामी समाज के सामने उसका असली रूप प्रकट कर दें।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन जैसा कि ईरान के प्रसिद्ध बुद्धिजीवी मुर्रतुज़ा मुतह्हरी ने कहा है , अचानक घटी घटना का परिणाम नहीं है । अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि चूंकि यज़ीद ने इमाम हुसैन से बैअत की मांग कर ली और इमाम हुसैन ने इन्कार कर दिया इस लिए उनके मध्य संघर्ष हुआ । एसा नहीं है इमाम हुसैन के आंदोलन का बीज उसी दिन पड़ गया था जिस दिन पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी एसे लोग बने जिन्हें पैग़म्बरे इस्लाम ने मनोनीत नहीं किया था और जिन्हें इस्लामी शिक्षाओं का ज्ञान नहीं था। क्योंकि  समाजिक व धार्मिक पथभ्रष्टता जिस पर हम पिछले कार्यक्रमों में विस्तार से चर्चा कर चुके हैं उसी समय से आंरभ हो गयी थी और हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने पैग़म्बरे इस्लाम के बाद जो संघर्ष किया और जिसे उनके पुत्र इमाम हसन ने आगे बढ़ाया वह सब कुछ वास्तव में इमाम हुसैन के इस आंदोलन की भूमिका थी जिसके द्वारा , मानव समाज के सुधार के लिए ईश्वर द्वारा चुने गये इन महापुरुषों ने , यज़ीद और उस जैसे भ्रष्ट शासकों द्वारा इस्लाम के माथे पर लगाए गये कलंक के टीके को , अपने लहू से धो दिया ।

 इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने दूर रहने वाले अपने कुछ साथियों को पत्र लिखकर बुलाया और इस प्रकार से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सेना पूर्ण हो गयी। इमाम हुसैन  , अपने साथ बच्चों को ले आए थे , महिलाओं को लाए थे और बूढ़े भी आप के साथ थे । वास्तव में इमाम हुसैन के आंदोलन का जो उद्देश्य था अर्थात सत्य व असत्य के मध्य अंतर को स्पष्ट करना  वह इसी प्रकार पूर्ण रूप से स्पष्ट हो सकता है । इमाम हुसैन ने यज़ीद के विरुद्ध जो संघर्ष की शैली अपनाई उस से न केवल यह कि यज़ीद के चेहरे से इस्लाम का मुखौटा उतर गया बल्कि यह भी सिद्ध हो गया कि यज़ीद का मानवता से भी कोई संबंध नहीं है । क्योंकि , मानवता जिसे छूकर भी गुज़री होगी वह कभी भी ६ महीने के शिशु की हत्या नहीं करता , वह सत्तर अस्सी वर्ष के बूढ़े का वध नहीं करता और वह कभी भी अपने धर्म के संस्थापक के परिजनों की हत्या , उसके घर की महिलाओं का अपमान नहीं करता किंतु यज़ीद ने यह सब कुछ किया और इस प्रकार से यह सिद्ध हो गया कि यज़ीद न केवल यह कि मुसलमान नहीं था बल्कि मानवता से भी उसका कोई लेना देना नहीं था। इमाम हुसैन का उद्देश्य यही था।

 

इमाम हुसैन की जीत और यज़ीद की हार का राज़ एक तरह से बेहद साधारण और सामने की चीज़ है किंतु इसके साथ ही यह राज़ बेहद गहरा भी है। यह दुनिया, दुनिया वालों के लिए महत्वपूर्ण होती है किंतु जो लोग इस दुनिया को राही के लिए कुछ देर की पेड़ की छाया समझते हैं उन्हें इस दुनिया की सुन्दरता लुभाती नहीं और न ही उसकी कोई चीज़ उन्हें डराती है। ईश्वर के खास बंदे, दुनिया को सराय समझते हैं और मौत को हमेशा रहने वाले परलोक में जाने का पुल और अपने ईश्वर से निकटता का माध्यम समझते हैं इस लिए इन लोगों को दुनिया वालों के लिए सब से अधिक डरावनी चीज़ यानी मौत से, डराया नहीं जा सकता। कर्बला में इमाम हुसैन और उनके साथियों की जीत की एक सब से बड़ी वजह यह थी कि उन्हें इस संसार से कोई मोह नहीं था और इस संसार की सब से डरावनी चीज़ से उन्हें डर नहीं लगता था बल्कि वह मौत को गले लगाने के लिए व्याकुल दिखायी देते हैं।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथियों की इस भावना को उनके एक एक काम से समझा जा सकता है किंतु इस भावना का सब से अच्छा प्रदर्शन स्वंय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भतीजे और इमाम हसन अलैहिस्सलाम के बेटे हज़रत क़ासिम की ज़बान से हुआ। कर्बला की घटना के समय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बेटे क़ासिम की आयु मात्र 13 साल की थी। वास्तव में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला में अपने साथ आने वाले हरेक को यह आज़ादी दी थी कि वह जहां चाहे चले जाएं किंतु जब कोई इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का साथ छोड़ने पर तैयार नहीं हुआ तो इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने खुल कर कह दिया कि कर्बला सब लोग मारे जाएगें। सारे लोगों ने कहा कि अल्लाह का शुक्र है कि उसने हमें इस लायक़ समझा कि हम आप के साथ मौत को गले लगाएं, यह हमारे लिए खुशखबरी है।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम  के साथी और कर्बला के जियाले अपनी जान न्योछावर करने की बात कर रहे थे और उन्ही के साथ एक कोने में एक 13 साल का बच्चा भी चुपचाप बैठा यह सब देख और सुन रहा था। इस बच्चे ने सोचा कि इमाम हुसैन कह रहे हैं कि यहां पर उपस्थित सब लोग मारे जाएंगे तो कहीं मैं बच्चा होने की वजह से उनमें शामिल न हुआ तो क्या होगा? हज़रत क़ासिम के मन में यह सवाल किसी तूफान की तरह उठ रहा था इसी लिए वह उठे और अपने चचा इमाम हुसैन के पास गये और उनसे पूछा कि क्या, क़त्ल होने वालों में मेरा भी नाम है?  ईरान के प्रसिद्ध लेखक शहीद मुर्तुज़ा मुतह्हरी ने लिखा है कि यह सुन कर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम रोने लगे लेकिन उन्होंने अपने भतीजे के सवाल का जवाब नहीं दिया। हज़रत क़ासिम ने फिर अपना सवाल दोहराया तो इमाम हुसैन ने कहा कि मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूंगा किंतु उससे पहले तुम मुझे एक सवाल का जवाब दो, मौत तुम्हारी नज़र में कैसी है? तो हज़रत क़ासिम ने कहा कि चचा, मौत मेरी नज़र में शहद से ज़्यादा मीठी है। और यदि आप मुझे यह बताएं कि मैं भी कल मारा जाऊंगा तो यह मेरी लिए बहुत बड़ी खुशखबरी होगी। इमाम हुसैन ने कहा कि हां मेरे भाई की निशानी! कल तुम भी मारे जाओगे लेकिन बहुत कड़ी परीक्षा के बाद।

 

 इमाम हुसैन के 13 साल के भतीजे की सोच, मौत के बारे में इस प्रकार थी तो फिर विदित सी बात है जिस सेना में एसे सिपाही हों उसे यज़ीद और उसके सैनिकों, तलवारों की झंकार और भालों की चमक से कैसे डराया जा सकता है? कर्बला की घटनाओं का वर्णन करने वाली प्रसिद्ध किताब में जिसे " मक़तल" कहा जाता है, लिखा है कि हज़रत क़ासिम मुहर्रम की दस तारीख को इमाम हुसैन के पास जाते हैं और उनसे रणक्षेत्र में जाने की अनुमति मांगते हैं। इमाम हुसैन अपने 13 साल के भतीजे के मुंह से यह शब्द सुन कर उन्हें लिपटा लेते हैं और दोनों एक दूसरे को पकड़ कर रोते हैं। हज़रत क़ासिम इमाम हुसैन के हाथ पैर बार बार चूमते और अनुमति मांगते हैं लेकिन इमाम हुसैन इन्कार करते हैं, हज़रत कासिम का आग्रह बढ़ता जाता है तो अन्नतः इमाम हुसैन उन्हें अनुमति देते हैं किंतु साफ साफ उनसे यह नहीं कह पाए कि जाओ कासिम मैं तुम्हें अनुमति देता हूं।

 

इमाम हुसैन ने जब अपने भतीजे का आग्रह देखा तो अचानक अपनी बांहे फैला दी और कहा कि आयो कासिम मैं तुम्हें विदा कर दूं। हज़रत क़ासिम इतने छोटे थे कि न उनके क़द व काठी के अनुसार कवच था और न ही ढाल। यज़ीद की सेना में मौजूद रावी कहता है कि हमने अचानक देखा कि एक बच्चा घोड़े पर सवार हुआ और हमारी तरफ बढ़ने लगा। उसके सिर पर लोहे की टोपी के बजाए पगड़ी बंधी थी और पैरों में भी विशेष प्रकार के जूते नहीं थे। बच्चा इतना सुंदर था जैसे चांद का टुकड़ा हो। इस इतिहासकार का कहना है कि उस बच्चे की आंखों से आंसू बह रहे थे। वह हमारे सामने आया और परंपरा के अनुसार अपना परिचय करायाः जो मुझे नहीं पहचानते वह जान लें कि मैं पैगम्बरे इस्लाम के नवासे हसन का बेटा हूं।  यह जो तुम्हारे बीच फंसे हुए हैं वह अबूतालिब के बेटे अली के पुत्र हुसैन और मेरे चचा हैं।

 

हज़रत क़ासिम लड़ना आरंभ करते हैं, इमाम हुसैन के कान , रणक्षेत्र से आने वाली आवाज़ों पर लगे हैं अचानक ही हे चचा! की आवाज़ सुनायी दी। रावी कहता है कि हमें पता ही नहीं चल पाया कि यह आवाज़ सुनने के बाद हुसैन अब घोड़े पर सवार हुए और कब रणक्षेत्र में पहुंच गये। वह एक बाज़ की तरह उन लोगों पर झपटे जो क़ासिम को घेरे उनका सिर काटने की तैयारी कर रहे थे, इमाम हुसैन को इस तरह से अपनी ओर तलवार लहराते बढ़ते देख कर उनमें भगदड़ मच गयी। हज़रत कासिम घोड़े से गिर गये थे और लगभग दो सौ सैनिक उन्हें घेरे थे जब उन पर इमाम हुसैन ने हमला किया तो वह इधर से उधर भागने लगे, उनके की घोड़ों की टापों के तले 13 साल के हज़रत क़ासिम का बदन टुकड़े टुकड़े हो गया। रावी कहता है कि  चारों तरफ धूल उड़ रही थी आंखों को कुछ सुझाई नहीं दे रहा था जब धूल हटी तो हमने देखा कि हुसैन, क़ासिम के सिर झुकाए बैठे हैं और कासिम, पीड़ा और दर्द से ज़मीन पर एड़िया रगड़ रहे हैं। हमने सुना कि हुसैन कह रहे हैं कि प्यारे भतीजे! मेरे लिए बहुत कठिन है कि तू मुझे पुकारे लेकिन तेरा चचा तेरी मदद को न पहुंच पाए, मेरे लिए कितना कठिन है कि मैं तेरे पास एसे समय में पहुंचूं कि जब मैं तेरे लिए कुछ भी न कर पाऊं।

 

हज़रत क़ासिम शहीद हो गये लेकिन शहीद होने से पहले उन्होंने बता दिया कि हुसैन के साथ जो लोग कर्बला में थे वह मौत को कैसा समझते थे, निश्चित रूप से ईश्वर से लौ लगाने वाले एसे ही होते हैं, उनमें बड़े और छोटों का भी अंतर नहीं रहता, सब एक तरह से सोचते, एक तरह से जीते और मरते हैं और मर के भी हमेशा ज़िंदा रहते हैं। (Q.A.)    

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