Sep ०८, २०१९ १५:४३ Asia/Kolkata

कर्बला के तपते हुए मरुस्थल में इतिहास रचने की तैयारी की जा रही है।

यह बात वर्ष 61 हिजरी क़मरी की है। पैगम्बरे इस्लाम के नाती अपने परिवार और कुछ गिने चुने साथियों के साथ उमवी शासक यज़ीद के सिपाहियों के घेरे में हैं । कई दिनों से किसी ने पानी नहीं पिया क्योंकि शत्रुता की सेना ने फुरात नदी पर सिपाहियों को तैनात कर दिया था । बड़े तो बड़े बच्चे भी प्यास से तड़प रहे थे और इस शौर्य गाथा की लालिमा बढ़ा रहे थे।

 

 

कर्बला में जिन लोगों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का साथ दिया वे सब इतिहास के अभूतपूर्व लोग हैं। क्योंकि उन्हों ने सत्य और असत्य की लड़ाई में सत्य का साथ दिया जब कि उन्हें ज्ञान था कि सत्य का साथ देने की दशा में मौत अपनी बाहें पसारे उन की प्रतीक्षा कर रही है किंतु उन्हों ने संसार के चार दिनों के जीवन को परलोक के अनन्त जीवन के लिए छोड़ दिया क्योंकि उन्हें इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के इस कथन की सत्यता पर विश्वास था कि अपमान के साथ जीवन की तुलना में सम्मान के साथ मरना अच्छा हो ता है। 9 मुहर्रम को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथी सम्मान के साथ मरने की तैयारी कर रहे थे।

 

 कर्बला के रणक्षेत्र में जो लोग इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथ थे वे केवल साहस व पौरुष की ऊंची चोटियों पर ही नहीं थे बल्कि वे अत्याधिक धार्मिक और सत्य के समर्थक थे इसी लिए उन्हों ने हर दशा में सत्य का साथ देने का निर्णय लिया वह सब एक से बढ़ कर एक थे किंतु उन में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भाई और उन की छोटी सी सेना के सेनापति हज़रत अब्बास का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। कर्बला में जब उन की शहादत हुई तो उन की आयु 34 वर्ष थी। ज्ञान व महानता में उन का मुख्य रूप से नाम लिया जाता है।  हज़रत अब्बास बच्चों के लिए पानी लाने के दौरान शहीद हुए। उन की शहादत के बाद उन की बहन जै़नब ने कहा हे मेरे भाई तुम्हारे होते हुए जो आंॅखे चैन से सोती थीं और वे जागेंगी और तुम्हारे डर से जिन आखों में नीदं नहीं आती थी अब वह चैन से सोएगीं। हज़रत अब्बास ने वीरता के साथ साथ आज्ञापालन का ऐसा प्रदर्शन किया जिस का उदाहरण इतिहास में नहीं मिलता क्योंकि कमज़ोर का धैर्य और है और अब्बास जैसे वीर के लिए  संयम करना और है।

 

कर्बला की महान हस्तियों में एक नाम हज़रत अली अकबर का भी है । वे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पुत्र थे वे अत्याधिक अच्छे व्यवहार वाले थे। उन का व्यवहार व बात चीत की शैली पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम से मिलती जुलती थी। जब हज़रत अली अकबर ने अपने पिता इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से रणक्षेत्र जाने की अनुमति ली और रणक्षेत्र की ओर चले तो इमाम हुसैन ने आकाश की ओर हाथ उठाकर दुआ की : हे ईश्वर तू साक्षी रहना इन लोगों से लड़ाई के लिए ऐसा युवा जा रहा है जो रंग रूप और बात चीत और चाल ढाल में पैगम्बरे इस्लाम की भांति है हमें जब कि पैगम्बरे इस्लाम का दर्शन करना होता हम उसे देख लिया करते थे ।

 

 हज़रत अली अकबर रणक्षेत्र में गये और कुछ देर लड़ने के बाद घावों से चूर होकर घोड़े से गिर गये । उन की आयु इतिहास के अनुसार 18 वर्ष थी। उन्हों ने अपने पिता इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की गोद में दम तोड़ा और जब उन के शव को शिविर में लाया गया था  उनकी मां उम्मे लैला और फूफी हज़रत जै़नब सहित शिविर की महिलाओं में कोहराम मच गया । 18 वर्ष के कड़ियल जवान का शव तो अपरिचितों का  भी कलेजा चीर देता है। यह तो उन के अपने थे । 

 

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के 72 साथी सत्य के मार्ग में अपने प्राण न्योछावर करके अमर हो गये। यद्यपि इमाम हुसैन ने उन से दसवीं मुहर्रम की रात में ही कह दिया था कि वे स्वतंत्र हैं रात के अंधरे का लाभ उठाते हुए किसी भी ओर निकल सकते हैं किंतु उन के साथियों ने उत्तर दिया यदि हमें सत्तर बार मारा जाए और हर बार जला कर हमारी राख उड़ा दी जाए और फिर जीवित किया जाए तो भी हम आप का साथ नहीं छोडेंगें। सत्य का प्रभाव ऐसा ही होता है विशेषकर उस समय जब सत्य का रखवाला भी सामने हो । इसी लिए तो इमाम हुसैन ने कहा था जैसे साथी मुझे मिले न मेरे नाना पैगम्बरे इस्लाम को मिले और न मेरे पिता अली को मिले। इमाम हुसैन अलैहिस्लाम ने नौवीं मुहर्रम की शाम कहा था कि मैंने अपने साथियों से अधिक वफादार, साथी नहीं देखे और अपने परिजनों से अधिक भले और एक दूसरे का ख्याल रखने वाले नहीं देखे।

 

 

मुहर्रम की नौ तारीख, कर्बला में बेहद महत्वपूर्ण है इस दिन यह स्पष्ट हो चुका था कि युद्ध होगा और इस युद्ध में इमाम हुसैन की तरफ के सब लोग मारे जाएंगे। एक असमान युद्ध की तैयारी पूरी हो गयी थी। नौ मुहर्रम को शिम्र यज़ीदी सेना के कमांडर, उमर सअद के लिए शासक का पत्र लेकर आया जिसमें युद्ध को परिणाम तक पहुंचाने का आदेश था।

 

नौ मुहर्रम को ही शिम्र ने हज़रत अब्बास और उनके भाइयों को सुरक्षा पत्र दिया जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। नौ मुहर्रम की शाम, यज़ीदी सेना में हलचल बढ़ गयी और उमर सअद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से युद्ध के लिए तैयार हो गया। उसने अपने सिपाहियों को हमले के लिए तैयारी का आदेश दिया। वह अपने सिपाहियों के मध्य गया और पुकार कर कहने लगा! हे ईश्वर के सिपाहियो! घोड़े पर सवार हो जाओ मैं तुम्हें स्वर्ग की खुशखबरी देता हूं। कूफा नगर के सिपाही घोड़े पर सवार होकर हमले की तैयारी करने लगे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने शिविर के सामने बैठे थे। उन्होंने हज़रत अब्बास को बुला कर कहा कि भाई जाओ और जाकर देखो कि दुश्मन के सिपाहियों में यह हलचल क्यों है? हज़रत अब्बास, ज़ुहैर बिन क़ैन और हबीब इब्ने मज़ाहिर सहित बीस सिपाहियों के साथ दुश्मन की सेना से निकट हुए। उन्होंने पूछा कि क्या बात है? तुम लोग क्या चाहते हो जो इतने आगे आ गये हो? सिपाहियों ने कहा कि सेनापति का आदेश है कि या तुम लोगों से आज्ञापालन की प्रतिक्षा ली जाए या फिर युद्ध आंरभ कर दिया जाए। हज़रत अब्बास ने कहा कि ठहरो मैं इमाम हुसैन को सूचना देता हूं, सिपाही रुक गये हज़रत अब्बास इमाम हुसैन के पास गये और उन्हें पूरी बात बतायी। इसपर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अगर उन्हें युद्ध कल तक टालने पर तैयार कर सकते हो तो एसा करो और उनसे एक रात की मोहलत मांग लो ताकि हम अपने ईश्वर की जी भर का उपासना कर सकें। हज़रत अब्बास ने यज़ीदी कमांडर उमर साद तक इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का संदेश पहुंचाया।इमाम हुसैन और उनके साथियों को एक रात की मोहलत दे दी गई लेकिन सिपाहियों ने इमाम हुसैन और उनके साथियों के शिविरों को चारों तरफ से घेर लिया। यह विडंपना थी कि अरब के अज्ञानता के अंधकार में डूबे जिन लोगों को ज्ञान का प्रकाश पैगंबरे इस्लाम ने दिया था और स्वर्ग व नर्क से परिचित कराया था कर्बला में वही लोग, पैग़म्बरे इस्लाम के धर्म का नाम लेकर उनके अत्याधिक प्रिय नवासे और उनके परिजनों को मारने के लिए भूखे भेड़ियो  की तरह घेरे हुए थे। कुछ दशकों में समाज में इतना बड़ा बदलाव यह सिद्ध करता है कि शक्ति , धन और पद का लोभ और अज्ञानता , इन्सान को कितनी आसानी से बदल देती है।   

 

 

इन हलात में इमाम हुसैन के 72 साथियों और परिजनों ने मानवता की लाज रख ली।  इमाम हुसैन और उनके साथियों के लिए मौत कोई एसी चीज़ नहीं थी जिससे डरा जाए बल्कि बांहे फैलाए वे मौत का स्वागत करने के लिए तैयार थे इसी लिए दुश्मनों के घेरे में कई दिनों से भूखे प्यासे इन लोगों ने नवीं और दसवीं मुहर्रम की रात, ईश्वर की उपासना में गुज़ारी। यज़ीदी सेना में मौजूद इतिहासकारों के कहना है कि पूरी रात इमाम हुसैन और उनके साथियों के शिविरों से मख्खियों की भिनभिनाहट जैसी आवाज़ आ रही थी क्योंकि वे सब ईश्वर की उपासना कर रहे थे।  

 

 

हमारा सलाम हो कर्बला के तपते मरुस्थल में सत्य व मानवता के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले इमाम हुसैन के 72 साथियों पर जिन्हों ने अपनी जान देकर मानवता की लाज रख ली वे स्वंय तो अमर हुए ही अपने साथ सच्चाई को भी अमर कर गये अन्यथा चौदह सौ वर्षों के बाद भी हर वर्ष विशेषकर मुहर्रम में  उन्हें क्यों याद किया जाता ? यह उन के बलिदान का प्रभाव है जो संसार ने सत्य के लिए हंसते मुस्कराते जान देने का ढंग ढब सीख लिया। उन्हों ने इमाम हुसैन की सत्यता और उन के महान अभियान को उस समय पहचाना जब यज़ीद के भय से कोई उन से अपना साधारण सा संबंध होने को भी स्वीकर नहीं कर रहा था। सच में यदि इमाम हुसैन के 72 साथियों ने यह सिद्ध कर दिया कि अंधकार कितना भी हो, प्रकाश की ओर से निराश नहीं होना चाहिए। कर्बला के शहीदों ने बहुत कुछ सिखाया है मानव समाज को, कर्बला से हम बहुत कुछ सीख चुके हैं और बहुत कुछ सीखना अभी भी बाक़ी है। (Q.A.)  

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