Sep ०८, २०१९ १५:५८ Asia/Kolkata

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का कारवां,  इस्लामी कैलेन्डर के पहले महीने अर्थात मुहर्रम की दूसरी तारीख को कर्बला पहुंचा तो उस समय यह स्थान एक मरूस्थल था।

इस जगह इमाम हुसैन और उनके परिजनों और साथियों को अत्याधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। शत्रुओं ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों के लिए पानी बंद कर दिया और इस पूरे क्षेत्र में पानी की एक मात्रा स्रोत, फुरात नदी पर यजीदी सेना तैनात हो गयी। उनका उद्देश्य था कि इस प्रकार से वे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के इन्कार को हां में बदल दें किंतु यह उनकी कल्पना थी। कर्बला के इस तपते रेगिस्तान में कई दिनों तक भूखे व प्यासे रह कर इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने अपने खून से त्याग व बलिदान व सत्यवाद की ऐसी गाथा लिख दी जिस से रहती दुनिया तक लोग प्रेरणा लेते रहेंगे।

 

दसवीं मुहर्रम की रात, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों के सांसारिक जीवन की अंतिम रात थी और उसे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों ने ऐसी रात बना दी जिसका उदाहरण संभवतः मानव इतिहास में नहीं मिलेगा। यह रात इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मोहलत में मांगी थी अन्यथा यज़ीदी सेना तो नौ मुहर्रम को ही हमला आरंभ कर रही थी। शत्रु से मिली एक रात की मोहलत को इमाम हुसैन और उनके साथियों ने युद्ध की तैयारी में नहीं बल्कि, ईश्वर की उपासना में गुज़ारा।  

दसवीं मुहर्रम अर्थात आशूर की सुबह, नमाज़ के बाद इमाम हुसैन ने अत्याधिक अर्थपूर्ण भाषण दिया। इस भाषण में धैर्य व संयम की भावना कूट-कूट कर भरी नज़र आती है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा हे सरदारो की संताने! धैर्य व संयम रखो कि मृत्यु एक पुल के अतिरिक्त कुछ नहीं है जो दुख व पीड़ा से तुम्हें सदैव रहने वाले स्वर्ग तक पहुंचा देती है तुम में से किसे यह पसन्द नहीं है कि वह जेल से महल में पहुंचा दिया जाए और यही मृत्यु तुम्हारे शत्रुओं के लिए महल से यातना गृह जाने की तरह है।

 

इस प्रकार के विश्वास का स्रोत ईश्वर पर ईमान और उसका फल धैर्य व संयम है। इसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी छोटी सी सेना की पंक्तियां ठीक की और शत्रु की सेना पर एक नज़र डाली और दुआ के लिए अपने हाथ उठाए और कहाः

हे ईश्वर दुखों और कठिनाइयों में मेरा सहारा और अप्रिय घटनाओं में मेरी एकमात्र आशा तू ही है। इन कठिन परिस्थितियों में मैं केवल तेरी सेवा में शिकायत करता हूं और अन्य किसी से आशा नहीं रखता तूही मेरी सहायता करेगा और दुख की बदली हटाएगा और शांति के तट पर मुझे पहुंचाएगा।

 

आशूरा की सुबह को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की इस दुआ  में उनके प्रतिरोध व संघर्ष के कारणों को देखा जा सकता है। निश्चित रूप से ईश्वर पर भरोसा, कठिनाइयों को सरल और दुखों के पहाड़ को हल्का बना देता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम देख रहे थे कि शत्रु अपनी पूरी शक्ति से युद्ध के लिए तैयार है यहां तक कि वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बच्चों तक पानी भी नहीं पहुंचने दे रहा है और आक्रमण के लिए घात लगाए बैठा है। इन परिस्थितियों में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम न केवल यह कि युद्ध आरंभ करने वाला नहीं बनना चाहते थे बल्कि वे यथासंभव शत्रु के सैनिकों को समझाना और उन्हें सही मार्ग दिखाना भी चाहते थे ताकि वह सत्य व असत्य को पहचान लें। यह सब इस लिए था कि यदि शत्रु की सेना में कोई ऐसा हो जो अज्ञानता के कारण सेना में शामिल हुआ हो तो उसके हाथ इस महान ईश्वरीय मार्गदर्शक के खून से न रंगने पाएं। इसी लिए जब युद्ध की तैयारी पूरी हो गयी और दोनों ओर के सैनिक पंक्तियों में खड़े हो गये तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम घोड़े पर सवार हुए और अपने शिविरों से आगे बढ़ कर ऊंची आवाज़ में यजीदी सेनापति उमर साद के सैनिकों को इस प्रकार संबोधित कियाः

"हे लोगो! मेरी बातें सुनो और युद्ध और खून बहाने में उतावले मत बनो ताकि मैं तुम्हें समझाने और उपदेश देने के अपने कर्तव्य का पालन कर सकूं और इस यात्रा का उद्देश्य स्पष्ट कर दूं यदि तुम लोगों ने मेरे तर्क को स्वीकार कर लिया और मेरे साथ न्याय के मार्ग पर चल पड़े तो कल्याण का गंतव्य मिल जाएगा और उस समय मेरे साथ युद्ध का कोई कारण नहीं रहेगा और यदि तुमने मेरा तर्क स्वीकार नहीं किया और मेरे साथ न्याय नहीं किया तो तुम सब एक दूसरे के साथ एकजुट हो जाओ और जो भी गलत निर्णय करना हो कर लो और मेरे संदर्भ में उसे व्यवहारिक भी बना लो और मुझे अवसर मत दो किंतु हर दशा में वास्तविकता तुम्हारे सामने होगी। मेरा साथी व मददगार वह ईश्वर है जिसने कुरआन उतारा है और वही भले लोगों की सहायता करता है।"

 

यह एक ईश्वरीय मार्गदर्शक का मानव जाति से प्रेम है जो अत्यन्त संवेदन शील परिस्थितियों में और रणक्षेत्र में कठोर शत्रुओं के सामने  भी छलक उठता है। क्योंकि यह प्रेम उस कर्तव्य का परिणाम है जो ईश्वर ने उस पर अनिवार्य किया है। हालांकि दसवीं मुहर्रम को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पास समय बहुत कम था किंतु उन्होंने अपने शत्रु को समझाने और उसके मार्गदर्शन के लिए बार बार इस प्रकार का भाषण दिया।

वास्तव में कर्बला की पूरी घटना ही मानवता प्रेम और मानवता से घृणा के टकराव को दर्शाती है। इमाम हुसैन को यदि अपनी और अपने प्रियजनों की जान बचानी होती और उन्हें सांसारिक सुख का अवसर उपलब्ध कराना होता तो इसके लिए बस यही काफी था कि वह यज़ीद की बात मान लेते किंतु इस प्रकार वह स्वंय को और अपने परिजनों को बचा लेते किंतु मानवता खत्म हो जाती और इस मानवता को सही मार्ग दिखाने वाला रास्ता भी यज़ीदी बुराईयों के अंधकार में डूब जाता। एक ईश्वरीय दूत के उत्तराधिकारी होने के नाते इमाम हुसैन एसा कभी नहीं कर सकते थे। इसी लिए उन्होंने अपनी जान दे दी।

 

इतिहास में आया है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथियों की शहादत के बाद शत्रुओं ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के शिविरों पर धावा बोलने का निर्णय लिया। यह देख कर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने ऊंची आवाज़ में कहाः हे अबू सुफियान के वंश के अनुयाइयो! यदि धर्म में विश्वास नहीं है और प्रलय से डर नहीं लगता तो कम से कम अपने जीवन में स्वतंत्र तो रहो और अपने मानवीय सम्मान को तो बनाए रखो।

 इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का यह कथन वास्तव में एक सार्वजनिक संदेश और विश्व व्यापी नियम है जो कर्बला के मरूस्थल से पूरे विश्व के लिए दिया गया कि लोगो यदि तुम ईश्वरीय नियमों और शिक्षाओं में विश्वास नहीं रखते तो कम से कम मानवीय सिद्धान्तों का भी ख्याल रखो।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों ने भारी संख्या वाली यजीद सेना से लोहा लिया और एक एक करके शहीद होते गये। उसके बाद सारी तलवारें इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के खून से अपनी प्यास बुझाना चाहती थीं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला के रन में जिस वीरता का प्रदर्शन किया उसका इतिहास सदा साक्षी रहेगा। उन्होंने यजीदी सेना के बहुत से सैनिकों को नर्क भेजा किंतु अन्ततः  असंख्य घावों के कारण उन पर कमज़ोरी छाने लगी। इतिहास में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अंतिम क्षणों का इस प्रकार वर्णन किया गया हैः

हुसैन ने अपनी आंखें खोलीं और आकाश की ओर देखा और अपने सांसारिक जीवन में अंतिम बार अपने पालनहार को इस प्रकार से संबोधित कियाः

हे वह ईश्वर जो बहुत महान है और जिसका आक्रोश बहुत भयानक है और जिसकी शक्ति सब से अधिक है। तेरे निर्णय के आगे शीश नवाता हूं हे पालनहार तेरे अलावा कोई पूज्य नहीं है। हे पुकारने वालों की आवाज़ सुनने वाले सहायक! मेरा तेरे अतिरिक्त कोई पालनहार नहीं है। तेरे आदेश और तेरे निर्णय पर धैर्य व संयम रखता हूं। हरेक को उसके कर्मों पर तौलने वाले पालनहार! मेरे और इन लोगों के मध्य तूही फैसला करना कि तू सब से अधिक अच्छा फैसला करने वाला है। 

इसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपना मुख कर्बला की गर्म रेत कर रख दिया और कहाः ईश्वर के नाम से, ईश्वर की सहायता से, ईश्वर के मार्ग में और उसके दूत के धर्म पर । इतना कहते कहते शिम्र का खंजर उनके गले पर चल गया। अरब जगत को अंधकार से निकालने वाले पैगम्बरे इस्लाम के प्रिय नवासे का सिर तन से जुदा हो गया। कर्बला की जंग हुसैन ने जीत ली।   

टैग्स

कमेंट्स