Sep ११, २०१९ १६:३० Asia/Kolkata

आज मोहर्रम की 11 तारीख है।

चौदह सौ वर्ष पूर्व , इराक़ के कर्बला नगर में आज का दिन ऐसी स्थिति में आया कि जब पैगम्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने बहत्तर साथियों और परिजनों के साथ सत्य के मार्ग में शहीद हो चुके थे और अब जले व अधजले शिविरों के पास , भूख व प्यास  से बिलखते हुए बच्चों को संभालती कुछ अकेली रह जाने वाली औरतें ही बची थीं जिन्हें किसी भी समय शत्रु के सिपाही बंदी बनाने वाले थे।

 

दस मोहर्रम को प्रातः काल से दोपहर के थोड़ी देर बाद तक,  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उन के 72 साथी एक एक करके यज़ीद के सिपाहियों के हाथों शहीद हो गये । उन की शहादत के बाद यज़ीदी सेना ने शिविरों पर आक्रमण कर दिया जहॉं अपनों को खोने के दुख में निढाल कुछ महिलाएं , बच्चे और बुखार में तपते इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बड़े बेटे इमाम ज़ैनुल आबेदीन  थे। यज़ीदी सिपाहियों ने सब से पहले तंबुओं में आग लगाई और फिर इस दुखी कारवान को लूटना आंरभ कर दिया। ज़्यादा कुछ था भी नहीं किंतु जो कुछ था, सिपाहियों ने वह सब लूट लिया और हंसते उपहास उड़ाते अपने शिविरों में वापस चले गये । सांझ का अंधेरा छाने लगा और इसी के साथ , अपने भाइयों , पिताओं , और बेटों की हत्या को अपनी आंखों से देखने वाली महिलाएं, डरे सहमे अपने बच्चों  को सीने से लगाए रो रही थीं।

 

फिर शाम आ गयी जिसे इस्लामी इतिहास की सब से भयानक शाम कहा गया है। यह पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के घरवालों के लिए दुखों से भरी रात थी। कर्बला के भयानक मरुस्थल की ठंडी रात पसर रही थी और अरब जगत को मानवता , प्रेम , भाईचारे का पाठ देने वाले पैगम्बरे इस्लाम के  परिजन , खुले आकाश के तले , जले हुए शिविरों की राख के पास बैठे थे । केवल इस लिए कि उन्हों ने अत्याचार को स्वीकार नहीं किया था , केवल इस लिए कि उन्हों ने मानवता , प्रेम व सत्य के संदेश को आगे बढ़ाने का संकल्प किया था।

 

इस अवसर पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन हज़रत जै़नब की ज़िम्मेदारी बहुत बढ़ गयी थी। यद्यपि सत्य व असत्य की इस लड़ाई में इमाम हुसैन और हज़रत अब्बास जैसे उन के कई भाई और दो बेटे शहीद हो चुके थे किंतु भाई के अभियान का अधिक महत्वपूर्ण भाग , उन के ज़िम्मे था और उन्हें अपने दायित्वों का भली भॉंति ज्ञान था इसी लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बाद उन्हों ने उन के शोक में बैठ कर रोने के स्थान पर ,एक टूटा हुआ भाला उठाया और महिलाओं व बच्चों को एक साथ रहने की सिफारिश करने लगीं पूरी रात इसी प्रकार बीत गयी। रात भर उन बच्चों को भी इकटठा गिया गया जो शिविरों में लूटपाट के समय डर के  मरुस्थल में इधर उधर चले गये थे।

 

हालांकि दस मुहर्रम को इमाम हुसैन और उनके सभी 72 साथी शहीद हो चुके थे और दस की रात को इमाम हुसैन के परिजनों के तंबुओं को लूटा जा चुका था किंतु यज़ीदी सेना का कमांडर, उमर सअद, 11 मुहर्रम की दोपहर तक कर्बला में ही रुका रहा। उसने अपने सिपाहियों की लाशें दफ्न कराई और उन पर नमाज़ पढ़ी जब कि इमाम हुसैन और उनके बहत्तर साथियों की लाशें, कर्बला की तपती रेत पर पड़ी हुई थीं। यह उस हुसैन की लाश थी जिनके नाना के ईश्वरीय दूत होने की पुष्टि के बिना कोई व्यक्ति मुसलमान नहीं हो सकता।

 

ग्यारह मुर्हरम को उमर सअद ने आदेश दिया कि इमाम हुसैन के परिजनों को बंदी बनाया जाए।  यज़ीदी सिपाहियों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों को बंदी बनाना आंरभ किया। औरतों और बच्चों के हाथ पीछे करके बांध दिये गये और उन्हें ऊंटों की नंगी पीठ पर बिठा दिया गया। इन सब को कर्बला के रणक्षेत्र से गुज़ारा गया जहां शहीदों के शव गर्म रेत पर पड़े थे। अपने अपने पतियों, भाइयों बेटों और परिजनों की लाशों को इस तरह से धूप में पड़े देख कर, दुख की मारी महिलाओं और रोते बिलखते बच्चों में कोहराम मच गया। हज़रत ज़ैनब की नज़र अपने भाई इमाम हुसैन की लाश पर पड़ी तो दिल से एक आह निकली और उन्होंने कहाः मैं क़ुर्बान जाऊं उस पर जिसके सिपाहियों को मार डाला गया, क़ुर्बान जाऊं उस पर जिसके तंबुओं की रस्सियां काट दी गयीं, उस पर क़ुर्बान जाऊं जो लापता नहीं है कि जिसकी वापसी की उम्मीद हो, न वह बेहोश है कि उसके होश में आने की उम्मीद हो। मेरी जान क़ुर्बान हो मेरे भाई पर, उस पर जिसे दुखों से भरे दिल और प्यास से सूखे गले के साथ शहीद कर दिया गया, मैं क़ुर्बान जाऊं अपने उस भाई पर जिसकी दाढ़ी खून टपक रहा था।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों को बंदी बना लिया गया और उन्हें ऊंटों की नंगी पीठ पर बिठाया गया गतंव्य था कूफा जहां कभी हज़रत ज़ैनब  के पिता हज़रत अली का शासन था उस के बाद सीरिया जिसे उस समय शाम कहा जाता था, जाना था  , जहां यज़ीद का दरबार था। अरब के तपते मरुस्थल में बंदियों के इस कारवान की पूरी ज़िम्मेदारी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन हज़रत ज़ैनब पर थी।

 

कूफा नगर कर्बला से कुछ ही दूरी पर है इन सब को वहां ले जाया गया, बाज़ारों को सजाया गया और जब इमाम हुसैन का कटा हुआ सिर उमर सअद ने कूफे के शासक और यज़ीद के गर्वनर इब्ने ज़ियाद के सामने पेश किया । इब्ने ज़ियाद ने इमाम हुसैन के सिर को एक थाल में रखवाया और फिर मुस्कराते हुए इमाम हुसैन के होंठ का छड़ी से अपमान करने लगा यह देख कर ज़ैद बिन अरक़म नामक एक वरिष्ठ सहाबी से न रहा गया और वह उठ कर कहने लगेः अपने छड़ी, हुसैन के होंठों से हटा ले कि मैंने अपनी आंखों से देखा है कि पैगम्बेर इस्लाम इन्हीं होठों को किस तरह से चूमते थे। यह सुन कर इब्ने ज़ियाद ने कहा कि अगर तू बूढ़ा न होता तो अभी तेरी गर्दन उड़ा देता। यह सुन कर वह उसके दरबार से निकल गये।

 

कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों को बंदी बना लिया गया विदित रूप से सब कुछ समाप्त हो गया, लड़ाई  ख़त्म हो चुकी थी,  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उन के साथी मारे जा चुके थे , उन के परिवार वालों को बंदी बनाया जा चुका था अब यज़ीद की जीत में बचा ही क्या था?  , यज़ीद ने भी यही समझा , और यही उस की सब से बड़ी गलती थी। उस ने न इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अभियान के पहले चरण को समझा , जो मदीने से उन की यात्रा से आंरभ हुआ और दस मुहर्रम को उन की शहादत के साथ समाप्त हुआ था। और न ही यज़ीद और उस के साथी,  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महान अभियान के इस दूसरे चरण को समझ पाए जो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद आंरभ हुआ था और आज तक जारी है और जिस की कमान , इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन हज़रत ज़ैनब के हाथों में थी और हज़रत ज़ैनब ने इस कर्तव्य को भली भांति निभाया भी।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों को इस लिए बंदी बनाया गया था ताकि अरब वासियों को विश्वास दिलाया जाए कि जिस विद्रोही ने यज़ीद के विरुद्ध विद्रोह किया था उस को पराजित कर दिया गया है और उस के परिवार वालों को बंदी बना लिया गया है। यज़ीद की जीत का ढिंढोरा पीटने के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिवार वालों को विभिन्न नगरों में बंदी बनाकर घुमाया गया किंतु हज़रत ज़ैनब के साहस व सूझबूझ से न केवल यह कि यज़ीद का झूठ खुल गया। बल्कि इमाम हुसैन के महान अभियान का दूसरा और महत्वपूर्ण चरण भी पूरा होने लगा। वास्तव में उमवी शासक यज़ीद की यह समझ में नहीं आया कि जीवन उन के लिए महत्वपूर्ण होता है जिन का सब कुछ इसी संसार में होता है किंतु जो लोग ईश्वर के लिए जीते हैं,  वह बड़ी सरलता के साथ उसकी राह में मर भी जाते हैं और जीत शरीर की नहीं,  उद्देश्यों की हुआ करती है।

 

कर्बला की घटना के बाद , इस्लामी समाज का शासक और अगुवा बनने वाले यज़ीद की वास्तविकता , सब के सामने खुल गयी , पूरे अरब जगत में जगह जगह विद्रोह होने लगे और सत्ता पर यज़ीद की पकड़ ढीली पड़ने लगी , लोगों में भले बुरे की पहचान पैदा हुई , लोग सत्य व असत्य के अंतर को जानने लगे और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की जीत झलकने लगी। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का उद्देश्य यही तो था। (Q.A.)

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