Sep ११, २०१९ १६:३३ Asia/Kolkata

आज मोहर्रम की 12 तारीख है।

पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों के ऋद्धा रखने वाले आज के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उन के बहत्तर साथियों का फातेहा मनाते हैं क्योंकि दसवीं मुहर्रम को यज़ीद के सिपाहियों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उन के साथियों को शहीद करने के बाद उन के सिर काट लिए थे और 11 मोहर्रम को उन के परिजनों को बंदी बनाकर कूफा नगर की ओर चले गये थे। शहीदों का सिर , भालों पर लगाकर खुशियों मनाते हुए जा रहे थे और कर्बला की गर्म रेत पर शहीदों के बिना सिर के शव पड़े हुए थे ।

 

दो मुहर्रम को जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने कारवान के साथ कर्बला नामक इस भूमि पर उतरे थे तो सब से पहले उन्हों ने इस भूमि को वहां के स्थानीय कब़ीले बनी असद से ख़रीद लिया था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को ज्ञात था कि उन्हें इसी स्थान पर शहीद किया जाएगा इसी लिए वे चाहते थे कि उन्हें उन की संपत्ति में दफन किया जाए। बनी असद नामक  क़बीले से भूमि ख़रीदने के बाद , इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उन स्थानीय किसानों से कुछ बातें कहीं थीं जिन में यह भी था कि मेरे मरने के बाद मुझे और मेरे साथियों को दफन कर देना । इसी लिए जब यज़ीदी सिपाही इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों को बंदी बनाकर कूफे की ओर चले गये तो  बनी असद के पुरुष, कबीले की महिलाओं द्वारा शर्म दिलाने पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उन के साथियों को दफन करने पर तैयार हुए और रणक्षेत्र में जाकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उन के भाई हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम को अलग अलग क़ब्रों में तथा अन्य शहीदों को एक ही कब्र में दफन कर दिया।

 

 उधर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों का कारवान 12 मोहर्रम को इराक़ के कूफा नगर पहुंचा जहां तमाशा देखने वालों की भीड़ थी। यह वही जगह थी जहां कभी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पिता हज़रत अली , मुसलमानों द्वारा शासक चुने जाने के बाद , लोगों का मार्गदर्शन करते थे और जहां कभी हज़रत ज़ैनब को अत्याधिक प्रेम व श्रद्धा से देखा जाता था किंतु आज के दिन वे छोटे छोट बच्चों और एक बीमार भतीजे के साथ इस स्थिति में कूफे पहुंची थीं कि उन के सिर पर चादर नहीं थी और हाथ पीठ पर बंधे हुए थे और लोग उत्सुकता के साथ देख रहे थे।

 

कूफा वही नगर था जहां के लोगों ने हज़ारों पत्र लिखकर यज़ीद के विरुद्ध इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से सहायता मांगी थी किंतु यह सारे दुख अब हज़रत ज़ैनब के लिए कोई अर्थ नहीं रखते थे। क्योंकि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बाद उन के महान संदेश को लोगों तक पहुंचाने की भारी ज़िम्मेदारी उन की थी। कारवान कूफे की गलियों से गुज़र रहा था और महिलाओं और बच्चों की यह दशा देखकर बहुत से लोग रो रहे थे कि अचानक अली की बेटी ज़ैनब ने गरज कर  कहा चुप रहो! सन्नाटा छा गया, बंदी थीं तो क्या हुआ, थीं तो अली की बेटी , आवाज़ में कूफे के शासक रहे अली के स्वर की खनक थी , सब लोग चुप हो गये तो हज़रत जैनब ने बोलना आंरभ कियाः

"  धन्य है ईश्वर और सलाम हो पैग़म्बरे इस्लाम और उन के परिजनों पर हे कूफा वासियो! हे धूर्त व धोखेबाज़ लोगो! तुम लोग रो रहे हो? तुम्हारे आंसू सूख जाएं , तुम्हारी चीख पुकार कभी बंद न हो , तुम लोग तो उस महिला की भांति हो जिस ने बड़ी मेहनत से बुनाई की और फिर उस के धागे धागे को खींच लिया। तुम लोगों ने अपनी सौगंध को ख़राब कर दिया। क्या बड़बोले पन , घंमड , भ्रष्टाचार , दासियों की चापलूसी और कटाक्ष के अतिरिक्त भी कुछ तुम लोगों मे है ? तुम लोग रो रहे हो ? हां रोओ , ईश्वर की सौगंध तुम्हें रोना ही चाहिए , खूब रोओ और कम हंसो कि तुम्हारे भाग्य में कलंक व अपमान लिख दिया गया है ऐसा कंलक जो कभी भी मिटने वाला नहीं है तुम इस कंलक को किस प्रकार धोओगे कि तुम ने अंतिम ईश्वरीय दूत के पौत्र और स्वर्ग के युवाओं के सरदार की हत्या की है?  उस की हत्या की है जो समस्याओं में, कठिनाइओं में तुम्हारे लिए शरणदाता था। उस की हत्या की है जो स्पष्ट प्रमाण और तुम्हारी बोलने वाली ज़बान था। पापों केा कितना बड़ा बोझ तुम ने अपने कांधों पर उठा लिया है । ईश्वर की कृपा से दूर रहो , बर्बादी तुम्हारा भाग्य बने , तुम्हारे प्रयासों का अंत निराशा पर हो तुम्हारे हाथ टूट जाएं  धिक्कार हो तुम पर!  तुम्हें ज्ञात है कि तुम ने पैगम्बरे इस्लाम के कलेजे को कैसे छलनी किया है? और पर्दे में रहने वाले कैसे कैसे लोगों को बेपर्दा किया है ? तुम्हें पता है कि तुम ने किस का खून बहाया है ? यह जो ढील मिली है उस पर इतराओ मत कि ईश्वर उतावला नहीं होता और उस के पास  सदैव प्रतिशोध का अवसर रहता है और वह घात लगाए है।"

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन  हज़रत जै़नब का यह भाषण, अपने भाईयों को खो देने वाली बहन या अपनी बेटों को अपने सामने एड़िया रगड़ कर जाने देते देखने वाली मॉं का भाषण नहीं था यह , उस काल की सोई हुई अंतरात्माओं को जगाने के लिए इमाम हुसैन के महान अभियान के उस चरण का आंरभ था जिस की कमान हज़रत जै़नब के हाथों में थी।

 

इस्लामी इतिहास का अध्ययन करने वालों को भली भॉंति ज्ञान है कि कूफा नगर और यज़ीद की राजधानी शाम में विभिन्न अवसरों पर हज़रत ज़ैनब के भाषणों ने कर्बला के बहत्तर शहीदों के रक्त की लालिमा को कई गुना बढ़ा दिया। और मुसलमानों को यह लगने लगा कि उन्हों ने पैगम्बरे इस्लाम के पौत्रा , इमाम हुसैन का साथ न देकर बहुत बड़ी गलती की इस पाप के बोध ने लोगों में प्रायश्चित की भावना को जन्म दिया और इस भावना को शांत करने के लिए यजीद के शासन में जगह जगह विद्रोह होने लगे।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन हज़रत जै़नब और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बेटे इमाम जै़नुल आबेदीन के भाषणों से इस्लाामी समाज में जो कां्रति अंगडा़ई ले रही थी उस की आहट स्वंय यज़ीद ने भी सुन ली थी। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का बलिदान रंग ला रहा था , अत्याचारी शासक के हाथ से सत्ता की डोर सरक रही थी। विजय इसे कहते हैं , और इस विजय में हज़रत जै़नब के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

 

असत्य के विरुद्ध इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का संघर्ष कर्बला में ही ख़त्म नहीं हुआ वह जारी रहा , उनके बाद उनकी बहन ज़ैनब और पुत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन ने उसे जारी रखा। वैसे एक कथन के अनुसार तीन दशक बाद बारह मोहर्रम की तारीख को ही इमाम हुसैन के बेटे हज़रत इमाम ज़ैनुलआबेदीन 57 वर्ष की आयु में शहीद कर दिये गये। इमाम ज़ैनुलआबेदीन का पूरा जीवन दुखों से भरा था। कर्बला की उन घटनाओं को जिनको  सुन कर आज भी दुनिया भर में इमाम हुसैन के श्रद्धालु अपने आंसू नहीं रोक पाते, इमाम ज़ैनुलआबेदीन ने अपनी आंखों से देखा था, किंतु बेहद तेज़ बुखार और बीमारी की वजह से लड़ने नहीं जा पाए थे। उसके बाद भी समाज में इमाम हुसैन के चाहने वालों और उनके परिजनों के लिए बहुत सी समस्याएं थीं और शासक, उन पर कड़ी नज़र रखते थे इसी लिए इमाम ज़ैनुलआबेदीन ने अपना पूरा जीवन, लोगों को दुआओं और प्रार्थनाओं द्वारा , सही मार्ग दिखाने में व्यतीत किया। यह उनका अपना और बेहद अनोखा तरीक़ा था जिस पर चल कर उन्होंने समाज के मार्गदर्शन का अपना ईश्वरीय कर्तव्य भली भांति निभाया।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का संघर्ष आज भी जारी है। आज भी जब विश्व के किसी भी क्षेत्र में कोई सत्य के लिए बलिदान देता है तो इतिहास की जानकारी रखने वालों को उसके लहु में इमाम हुसैन और उनके बहत्तर साथियों के लहु की लालिमा दिखाई देती है । इमाम हुसैन का संदेश आज भी समाजों में गूंज रहा है , अपमान के साथ जीवन से , सम्मान के साथ मृत्यु भली , जिन राष्टों के कान , इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के संदेश की गूंज सुन लेते हैं वह अत्याचारों से छुटकारा पा लेते हैं और यह क्रम रहती दुनिया तक जारी रहेगा । अत्याचार बढ़ेगा , असत्य , सत्य को पछाड़ने लगेगा , कुछ लोग इमाम हुसैन का अमर संदेश सुनेंगे अत्याचार के यज़ीद का अंत हो जाएगा । इमाम हुसैन के आंदोलन की विजय इसी कभी न समाप्त होने वाले क्रम में निहित है।

 

यह  सब कुछ हज़रत ज़ैनब कि प्रयासों से संभव हुआ।  वह समाज , जिसके सदस्यों के सामने इमाम हुसैन ने आंदोलन आंरभ किया , अपने परिवार को लेकर नगर नगर भटके , और समाज के सदस्य , अपने पैगम्बर के परिजनों की यह दशा देखते रहे और कुछ न कर सके वही समाज इमाम हुसैन के बलिदान के बाद , जाग जाता है , यज़ीद के विरुद्ध इस्लामी जगत के विभिन्न क्षेत्रों में आंदोलन आंरभ होते हैं , इमाम हुसैन और उनके परिजनों के हत्यारों को चुन चुन कर मारा जाता है , सत्ता पर यज़ीद की पकड़ ढीली पड़ जाती है और उसके मरने के बाद , स्वंय उसका बेटा सिंहासन पर बैठने से यह कहकर इनकार कर देता है कि यह सिंहासन पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के रक्त में डूबा है। तो फिर जीत किसकी हुई ? इमाम हुसैन की या यज़ीद की ?

 

 

 

 

 

 

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