Jun १३, २०२१ २०:५३ Asia/Kolkata
  • 30 साल पहले नरसिम्हा राव का प्रधान मंत्री के पद की शपथ लेने पहले, 90 मिनट की बैठक में भारत का इतिहास बदलने वाला फ़ैसला

ये वे निर्णायक 90 मिनट थे जिनसे 1991 में भारत के अपनी अर्थव्यवस्था को उदारवादी बनाने के ऐतिहासिक फ़ैसला लेने का रास्ता साफ़ हुआ। राव को बताया गया कि विदेशी मुद्रा भंडार के तौर पर 2500 करोड़ रूपये बचे हैं जिससे सिर्फ़ 3 महीने के आयात का भुगतान हो सकता है।

30 साल पहले कॉन्ग्रेस पार्लियामेन्ट्री पार्टी ने पीवी नरसिम्हा राव को सर्वसम्मति से प्रधान मंत्री के तौर पर नामित किया। सेन्ट्रल हॉल में बैठक के बाद, राव अर्जुन सिंह के साथ सीधे राष्ट्रपति भवन पहुंचे ताकि सरकार बनाने का दावा पेश करें।

वह दिन 20 जून 1991, एक अहम फ़ैसले का भी साक्षी था। नामित प्रधान मंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आईएमएफ़ के विवादित क़र्ज़ को क़ुबूल करने को रज़ामंदी दी, इस तरह देश के आर्थिक उदारवाद का रास्ता समतल हुआ। यह ऐतिहासिक घटना बहुत ही डरामाई अंदाज़ में घटी।

बड़ी तादाद में कॉन्ग्रेस के नेता और मंत्री पद के उम्मीदवार राव के तीन मूर्ति लेन वाले आवास पर इकट्ठा हुए, जब उन्हें राष्ट्रपति की ओर से निमंत्रण मिला। उस वक़्त दोपहर के 2 बजे थे। राव सबसे पहले 10 जनपथ गए सोनिया का आशीर्वाद लेने।

लौटते वक़्त नरसिम्हा राव को कैबिनेट सचिव नरेश चंद्रा का संदेश मिला जिसमें उन्होंने तुरंत मुलाक़ात का निवेदन किया था। नरेश चंद्रा ने कहा कि इसमें विलंब नहीं हो सकता। मीटिंग में वित्त सचिव और वरिष्ठ अधिकारी फ़ाइलों के साथ मौजूद थे। वित्त सचिव ने 90 मिनट तक व्याख्यान दिया और सभी पार्टी के नेता तीन मूर्ति लेन पर राव के लौटने का उत्सुकता से इंतेज़ार कर रहे ते।

ये वे निर्णायक 90 मिनट थे जिनसे 1991 में भारत के अपनी अर्थव्यवस्था को उदारवादी बनाने के ऐतिहासिक फ़ैसला लेने का रास्ता साफ़ हुआ। राव को बताया गया कि विदेशी मुद्रा भंडार 2500 करोड़ रूपये बचा है जिससे सिर्फ़ 3 महीने के आयात का भुगतान हो सकता है। इस वजह से वित्त मंत्री, तस्करों के क़ब्ज़े से ज़ब्त किए गए 47 टन सोने को जो एसबीआई के तहख़ाने में रखे हुए थे, गिरवी करने पर बाध्य हुए। रेटिंग एजेंसियों ने भी भारत की साख को ‘ख़तरनाक’ स्तर पर रखा था। विदेशी क़र्ज़ कुल जीडीपी का 22 फ़ीसदी और आंतरिक लोक क़र्ज 56 फ़ीसदी था।

अधिकारियों ने बताया था कि छायी हुयी राजनैतिक अस्थिरता के बीच उन्होंने वॉशिंगटन में आईएमएफ़ से 20 महीने की मुद्दत के लिए आपात स्थिति के लिए 23 लाख डॉलर क़र्ज़ के लिए बातचीत शुरू की थी। इसके लिए आईएमएफ़ ने लिखित और ग़ैर लिखित शर्त लगायी थी। तब कैबिनेट सचिव ने कहा कि अब यह राजनैतिक नेतृत्व की ज़िम्मेदारी है कि वह फ़ैसला करे कि वह बातचीत को आगे बढ़ाना चाहता है या नहीं। राव ने कुछ स्पष्टीकरण मांगा, तफ़सील पूछी। वह डटे हुए थे। उन्होंने कैबिनेट सचिव को बातचीत को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। यह, नरेश चंद्रा के साथ 10 मिनट की अलग मीटिंग के बाद हुआ। यह सब राव के प्रधान मंत्री के तौर पर शपथ लेने से पहले हुआ।

इसका राजनैतिक स्तर पर कड़ा विरोध हुआ। ज़्यादातर कॉन्ग्रेसी नेताओं को नेहरू की ओर से बनाए गए ढांचे को हटाने की ओर से संदेह था। रंगराजन कुमारमंगलम और हरीश रावत ने चेतावनी दी थी कि ऐसा करने से कॉन्ग्रेस अगला चुनाव हार जाएगी। विपक्ष में बैठी भाजपा में अलग अलग विचार थे। उस वक़्त भापजा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी और प्रभावी लोगों के एक समूह का यह दावा था कि आईएमएफ़ की शर्तों का भारत की संप्रभुता पर गहरा असर पड़ेगा।

26 जून को राव ने अलग अलग तौर पर वी पी सिहं, एल के आडवाणी, हरकिशन सिंह सुरजीत और चंद्रशेखर को बताया कि भारत आईएमएफ़ की शर्तों को मान रहा है। अगले दिन प्रधान मंत्री और वित्त मंत्री ने विपक्षी नेताओं को बताया कि क़र्ज़ लेने के अलावा कोई चारा नहीं था। आडवाणी, जॉर्ज फ़र्नान्डिस, मधू दंडवते, सुर्जीत और यशवंत सिन्हा ने कहा कि उन्हें सब्सिडी जैसी सुविधा के ख़त्म किए जाने की शर्त पर आपत्ति थी।

4 जुलाई 1992 को आईएमएफ़ के प्रमुख मिशेल कैम्डीसस ने शर्तों के लागू होने पर संतोष जताया था।

(साभार जनसत्ताः वरिष्ठ पत्रकार व लेखक पी रमन के विचार)

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