Oct २५, २०२१ १०:४० Asia/Kolkata
  • भारत में फ़ेसबुक अपने प्लेटफ़ार्म पर हिंसक सामग्री को रोक नहीं पा रहा है या रोकना ही नहीं चाहता?!

फ़ेसबुक के आंतरिक दस्तावेज़ों से यह बात फिर सामने आई है कि सोशल मीडिया का यह प्लेटफ़ार्म बहुत ख़तरनाक रूप से इस्तेमाल हो रहा है और अपनी घोषित नीतियों के अनुसार काम नहीं कर रहा है।

यहां एक अलग बहस यह है कि फ़ेसबुक क्या वाक़ई इस प्लेटफ़ार्म पर आने वाले डाटा की निगरानी करने में नाकाम है या जान बूझ कर वह कई अवसरों पर वित्तीय हितों के कारण अपने नियमों को नज़रअंदाज़ कर देता है।

अमरीकी अख़बार ने फ़ेसबुक के आंतरिक दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए लिखा कि फ़ेसबुक भारत में भ्रामक सूचना, नफ़रत वाले भाषण और हिंसा को लेकर जश्न मनाने वाले कंटेंट को रोक नहीं पा रहा है।

फ़ेसबुक के शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्लेटफ़ॉर्म पर मुस्लिम विरोधी भड़काऊ और भ्रामक सामग्री से भरे हुए समूह और पेज भी बने हुए हैं।

रिपोर्ट बताती है कि फ़ेसबुक के एक शोधकर्ता ने फ़रवरी 2019 में, यह देखने के लिए एक अकाउंट बनाया कि केरल में रहने वाले एक व्यक्ति के लिए सोशल मीडिया वेबसाइट कैसी दिखेगी। उसने तीन हफ़्तों तक अलग-अलग ग्रुप्स से जुड़ने, वीडियो देखने और नये फ़ेसबुक पेजों तक पहुंचने के लिए केवल फ़ेसबुक के एलगोरिदम से मिल रहे सुझावों पर काम किया, इसका नतीजा यह हुआ कि नफ़रत भरे भाषाण, ग़लत सूचनाओं और हिंसा पर ख़ुशी मनाने वाले कंटेंट की बाढ़ आ गई।

फ़ेसबुक पर हालिया समय में बार बार आरोप लग रहे हैं कि वह अपने घोषित नियमों को जान बूझ कर नज़रअंदाज़ कर रहा है।

फ़ेसबुक की एक पूर्व कर्मचारी ने ख़ुलासा किया कि कमाई के लिए फ़ेसबुक का एलगोरिदम ही इस अंदाज़ का बनाया गया है कि वह हिंसा और नफ़रत फैलाने वाली सामग्री को प्रोमोट करता है।

रोयटर्ज़ के अनुसार फ़ेसबुक की पूर्व महिला कर्मचारी फ़्रांसिस हाफ़न ने अमरीकी टीवी चैनल सीबीएस के टाक शो में बात करते हुए दावा किया कि फ़ेसबुक को उपभोक्ताओं की दिमाग़ी हालत या भलाई से कोई मतलब नहीं है वह केवल अपनी कमाई को महत्व देता है।

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