Sep २९, २०२२ ०८:०९ Asia/Kolkata
  • पूरे भारत में आरएसएस को बैन करने की मांग उठी

भारत के अनेक राजनैतिक दलों और वरिष्ठ नेताओं ने हिन्दु कट्टरपंथी संगठन आरएसएस पर बैन लगाने की मांग की है।

यह मांग केंद्र सरकार द्वारा ग़ैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया और उसके सहयोगियों को प्रतिबंधित किए जाने के बाद सामने आई है।

आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने मांग की है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक जैसे संगठनों पर भी प्रतिबंध लगाया जाए। लालू प्रसाद यादव ने अपने ट्वीट में कहा कि पीएफ़आई की तरह जितने भी नफ़रत और द्वेष फैलाने वाले संगठन हैं, सभी पर प्रतिबंध लगाना चाहिए, जिसमें आरएसएस भी शामिल है, सबसे पहले आरएसएस को बैन करिए, ये उससे भी बदतर संगठन है।

उन्होंने आगे लिखा कि आरएसएस पर दो बार पहले भी प्रतिबंध लग चुका है, सनद रहे, सबसे पहले आरएसएस पर प्रतिबंध लौह पुरुष सरदार पटेल ने लगाया था।

उल्लेखनीय है कि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा था, जिसे साल भर बाद हटाया गया था।

माकपा का मानना है कि पीएफआई चरमपंथी विचारों वाला संगठन है और वह अपने कथित विरोधियों के ख़िलाफ? हिंसक गतिविधियों में शामिल रहा है।

वाम दल ने कहा कि पीएफ़आई और आरएसएस केरल व तटीय कर्नाटक मे हत्याओं और जवाबी हत्याओं में लगे हुए हैं, जिससे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करने की दृष्टि से माहौल ख़राब हो रहा है। इसने आगे कहा कि सनातन संस्था और हिंदु जनजागृति समिति जैसे चरमपंथी संगठन भी हैं, जिनके लोग धर्मनिरपेक्ष लेखकों और हस्तियों की हत्याओं में फंसे हैं, ये सभी ताकतें, चाहे वे चरमपंथी बहुसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करती हों या अल्पसंख्यक समूहों का, उनका मुकाबला सख्त कानूनी कार्रवाई करके किया जाना चाहिए।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि पीएफआई जैसे संगठनों पर प्रतिबंध लगाना समाधान नहीं है, बल्कि बेहतर विकल्प यह होता कि उन्हें राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर उनकी आपराधिक गतिविधियों के खिलाफ सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जाती।

उधर कांग्रेस ने कहा कि वह बहुसंख्यकवाद या अल्पसंख्यकवाद के आधार पर धार्मिक उन्माद में अंतर नहीं करती। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने एक बयान में कहा कि कांग्रेस पार्टी हमेशा से सभी प्रकार की सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ रही है, कांग्रेस की नीति हमेशा से बिना किसी डर के, बिना किसी समझौते के सांप्रदायिकता से लड़ने की रही है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं केरल के पूर्व गृह मंत्री रमेश चेनिथला ने कहा कि केंद्र का पीएफआई को प्रतिबंधित करने का फ़ैसला बेहद अच्छा क़दम है। उन्होंने कहा कि आरएसएस पर भी इसी तरह प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। केरल में बहुसंख्यक सांप्रदायिकता और अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता दोनों का समान रूप से विरोध किया जाना चाहिए. दोनों संगठनों ने सांप्रदायिक घृणा को भड़काया है और इस तरह समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश की है।

केरल से कांग्रेस सांसद कोडिकुन्नील सुरेश ने कहा, ‘हम आरआरएस पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग करते हैं, पीएफआई पर प्रतिबंध लगाना इलाज नहीं है, आरएसएस भी पूरे देश में हिंदू सांप्रदायिकता फैला रहा है. आरएसएस और पीएफआई एक समान हैं, इसलिए सरकार को दोनों को प्रतिबंधित करना चाहिए. सिर्फ पीएफआई को ही क्यों?

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने भी आरएसएस के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा कि हम शांति भंग करने वाले या जो लोग कानून के खिलाफ हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई का विरोध नहीं करते हैं, आरएसएस और अन्य भी उसी तरह शांति भंग कर रहे हैं, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जानी चाहिए, ऐसे किसी भी संगठन को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायक रफ़ीकुल इस्लाम ने कहा कि पिछले कुछ दिनों में पीएफआई के 100 से अधिक सदस्यों को गिरफ्तार किया गया है, मैं पीएफ़आई का समर्थन नहीं कर रहा हूं, लेकिन पीएफआई को पांच सालों के लिए प्रतिबंधित करने का फैसला करने से पहले सरकार को जांच का इंतजार करना चाहिए था।

उन्होंने आगे कहा कि सरकार को केंद्रीय एजेंसियों से नफरती भाषण देने वाले बजरंग दल, विहिप (विश्व हिंदू परिषद) और आरएसएस की भी जांच करवानी चाहिए।

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि उन्होंने हमेशा पीएफआई के दृष्टिकोण का विरोध किया है और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण का समर्थन, लेकिन संगठन पर प्रतिबंध का समर्थन नहीं किया जा सकता है, खासकर कि इस बात के आलोक में कि कैसे मुसलमान अदालतों से न्याय पाने के लिए संघर्ष करते है। (AK)

 

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