Jan १७, २०२० १८:०२ Asia/Kolkata
  • मलेशिया से भारत का टकराव, आख़िर भारत क्या हासिल करना चाहता है? दिल्ली की बदला लेने वाली नीति से उसे कितना फ़ायदा और कितना नुक़सान?

मलेशिया के प्रधानमंत्री ने हाल में कश्मीर समेत कई मुद्दों पर भारत की आलोचना की है। इसके बाद भारत ने पलटवार करने के लिए व्यापारिक प्रतिबंधों का इस्तेमाल किया है। भारतीय कूटनीति के लिए इसके क्या मायने हैं?

मई 2018 में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद से मिलने मलेशिया पहुंचे थे, तब महातिर मोहम्मद को मलेशिया का प्रधानमंत्री बने महीना भर भी नहीं बीता था, मोदी शांगरी-ला संवाद में भाग लेने सिंगापुर जा रहे थे और उन्होंने रास्ते में मलेशिया में रुककर महातिर मोहम्मद को सरकार बनाने की बधाई दी थी। इस मौक़े पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था कि मलेशिया को "हम अपनी पूर्वी एशिया की नीति में प्राथमिकता देते हैं।" लेकिन इसके डेढ़ साल के अंदर हालात नाटकीय ढंग से बदल गए हैं। महातिर मोहम्मद ने सार्वजनिक रूप से भारत सरकार के कई क़दमों की कड़ी आलोचना की है और उनके बयानों से नाराज़ अब भारत ने भी बदला लेने की ठान ली है।

हाल ही में मोहम्मद ने भारत के नए विवादित नागरिकता क़ानून की आलोचना की और कहा कि इस क़ानून की वजह से लोग मर रहे हैं और शांतिपूर्ण तरीक़े से प्रदर्शन करने वालों के विरुद्ध दमनात्मक कार्यवाही की जा रही है। उन्होंने सवाल किया कि आख़िर इसे लाने की ज़रूरत ही क्या थी? इसके पहले मलेशियाई प्रधानमंत्री ने कश्मीर में उठाए गए भारत सरकार के क़दमों की भी निंदा की थी और कहा था कि भारत ने कश्मीर पर आक्रमण कर उसे कब्ज़े में ले लिया है। जानकारों का मानना है कि भारत सरकार ने बदले की नीति अपनाते हुए कई तरीक़ों से व्यापार का इस्तेमाल कर मलेशिया को जवाब देने की ठान ली है। मलेशिया विश्व में ताड़ के तेल के सबसे बड़े उत्पादकों और निर्यातकों में से है और भारत उसका सबसे बड़ा ग्राहक रहा है। ताड़ के तेल का इस्तेमाल खाना पकाने वाले तेल, जैविक ईंधन, नूडल्स और पिज्ज़ा इत्यादि से लेकर लिपस्टिक बनाने तक में किया जाता है। अनुमान है कि 2019 में जनवरी से अक्टूबर के बीच भारत ने मलेशिया से 44 लाख मीट्रिक टन से भी ज़्यादा ताड़ का तेल ख़रीदा है।

ताड़ का तेल

इस बीच भारत के केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर ताड़ के तेल के आयात को "मुक्त" से "प्रतिबंधित" श्रेणी में डाल दिया है। इससे भारत ने मलेशिया से ताड़ के तेल के आयात को आधिकारिक रूप से बैन तो नहीं किया है पर इसका असर तेल के ख़रीदारों और विक्रेताओं पर देखने को मिल रहा है। भारतीय मीडिया का कहना है कि, भारत में आयातकों ने मलेशिया से ताड़ के तेल का आयात बंद कर दिया है, जिससे मलेशिया को भारी नुक़सान होने की आशंका है। साल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कई मीडिया संगठनों को बताया कि उनके लगभग सभी सदस्यों ने मलेशिया की जगह इंडोनेशिया से तेल लेना शुरू कर दिया है। यह तेल उन्हें थोड़ा महंगा भी पड़ रहा है, फिर भी वे तेल इंडोनेशिया से ही ले रहे हैं। दूसरी ओर मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने प्रतिबंधों की पुष्टि करते हुए कहा है कि वे इससे चिंतित ज़रूर हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें जो ग़लत लगता है, वह उसके ख़िलाफ़ बोलते रहेंगे।

इस बीच जहां भारतीय मीडिया मोदी सरकार के इस क़दम की प्रशंसा करती हुई नज़र आ रही है और इसे अमेरिका द्वारा अपने विरोधियों की ख़िलाफ़ की जाने वाली कार्यवाहियों की तरह बता रही है, वहीं जानकारों का मानना है कि भारत की बदला लेने वाली नीति से स्वयं भारतीय व्यापारियों और विशेषकर आम जनता को नुक़सान पहुंच रहा है। उनका कहना है कि भारत की हमेशा से नीति रही है कि वह अपने विरोधियों से वार्ता के माध्यम से आपसी मतभेदों का समाधान करता आया है और इस नीति ने हमेशा भारत को लाभ ही पहुंचाया है। जानकार यह भी कहते हैं कि बदले की भावना वाली नीति थोड़े समय के लिए तो अच्छी लगती है पर लंबे समय तक के लिए यह नीति दूसरे को नुक़सान पहुंचाने के साथ-साथ स्वयं को भी नुक़सान पहुंचाने लगती है। (RZ)

 

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