Feb १४, २०२० १७:१२ Asia/Kolkata
  • दिल्ली की हार से बीजेपी-आरएसएस के ख़ैमे में क्यों छाई है उदासी? मोदी के प्रशंसक माने जाने वाले लोगों ने क्यों पहनाया केजरीवाल को जीत का सेहरा?

भारत की राजधानी दिल्ली में आप की जीत से एक बात तै हो गई है कि विधानसभा चुनाव में वोटरों ने केवल स्थानीय मुद्दों पर वोट दिया है। इस देश की सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी की लाख कोशिशों के बाद भी शाहीन बाग़ चुनावी मुद्दा नहीं बन सका और न ही आरएसएस का हिन्दू-मुस्लिम कार्ड।

8 फ़रवरी को भारत की राजधानी दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव और उसके बाद 11 फ़रवरी को आए चुनाव के परिणामों ने भारत की राजनीति में एक भूचाल सा ला दिया है। वैसे एक ओर जहां भारतीय मीडिया इस हार-जीत को बहुत सामान्य सी बात के तौर पर पेश कर रहा है वहीं दूसरी ओर भारतीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि जिस प्रकार बीजेपी ने दिल्ली के विधानसभा के चुनाव को लड़ा और इस राज्य के मुख्यमंत्री अरविंद केजरिवाल को हर संभव हराने का प्रयास किया उससे यह बात साफ़ है कि दिल्ली का चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत ही विशेष चुनाव था। दिल्ली के चुनाव में मिली हार के बाद से जिस तरह अमित शाह से लेकर कई बड़े बीजेपी के नेताओं के बयान आए हैं उससे भी यह साफ दिख रहा है कि, बीजेपी और आरएसएस में दिल्ली की हार को लेकर कितनी बेचैनी और तिलमिलाहट है।

वैसे तो भारतीय मीडिया दिल्ली में बीजेपी को मिली हार के कई कारण बता रही है। सबसे प्रमुख, बीजेपी का स्थानीय मुद्दों पर ध्यान ना देना। वह केजरीवाल के कामकाज की काट नहीं खोज पाई और केवल ध्रुवीकरण वाले मुद्दों पर ही सारा प्रचार-प्रसार किया। बीजेपी के सांसदो का ग़ैर ज़रूरी बयान देना। आम आदमी पार्टी ने जहां चुनाव की तारीख़ से बहुत पहले पार्टी के उम्मीदवारों के नामों का एलान कर दिया था तो वहीं बीजेपी ने चुनाव प्रचार में बहुत देर कर दी। दिल्ली बीजेपी के संगठन में मज़बूती ना होना। बीजेपी में आतंरिक कलह भी हार की वजह बनी है। बीजेपी नेता बिजेन्द्र गुप्ता, विजय गोयल, मनोज तिवारी और अन्य सांसदों का अलग-अलग तरीक़े से चुनाव प्रचार करना। इन सबसे इतर अगर देखा जाए तो दिल्ली की जनता के साथ-साथ पूरे भारत की जनता भी बीजेपी नेताओं सहित इस देश के ज़्यादातर संचार माध्यमों द्वारा लगातार हिन्दू-मुस्लिम, पाकिस्तान, कथित राष्ट्रवाद और गाय जैसे मुद्दों से तंग आ चुकी है और उसे समझ में आने लगा है कि इन मुद्दों से न तो उनका भला होने वाला है और न ही देश का। यह बात इसलिए भी कही जा सकती है कि जो बीजेपी 2014 में भारत के लगभग 70 प्रतिशत राज्यों में सरकार बना चुकी थी वह अब कुछ ही राज्यों तक सीमित होकर रह गई है।

दूसरी ओर अगर देखा जाए तो आम आदमी पार्टी ने पांच साल राज करने के बाद भी इस बार चुनाव में फिर से लगभग अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराया है। पिछली बार जहां वह 70 सीटों में 67 सीटों पर जीती थी तो इस बार भी आंकड़ा 70 में से 62 पर जीत दर्ज की है। जो अपने आप में अभूतपूर्व है। वहीं बीजेपी के सभी सितारों को प्रचार में उतारने के बावजूद वह दहाई के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच पाई। जानकारों का मानना है कि बीजेपी जो शाहीन बाग़ को चुनावी मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश में थी और अपने स्तर तक उसने उसे मुद्दा बनाया भी लेकिन उसे उससे कोई फ़ायदा नहीं हुआ। इसके पीछे जो कारण बताया जा रहा है वह यह है कि, शाहीन बाग़ में जहां प्रदर्शन करने वालों की अधिक संख्या मुसलमानों की है वहीं इस प्रदर्शन में हिन्दू, सिख और ईसाई धर्म सहित भारत के सभी धर्मों के लोग शामिल हैं। पिछली बार की तुलना में बीजेपी की सीटें बढ़ी हैं लेकिन इतनी नहीं कि वह सरकार बना ले या फिर विधानसभा में मज़बूत विपक्ष बन सके। केजरीवाल ने न केवल योजनाओं की घोषणा की बल्कि उन योजनाओं को ज़मीन पर भी देखा गया और उसी ने वोटरों को लुभाया भी। ज़मीन पर काम करने के कारण हर रैली में केजरिवाल ने अपनी सरकार के काम गिनाए। उनकी यही रणनीति काम आई। काम के कारण मोदी के क़रीबी समझे जाने वाले हिन्दू वोटर भी नाराज़ नहीं हुए और केजरीवाल कांग्रेस के मुस्लिम वोटरों को भी अपनी तरफ़ करने में कामयाब रहे।

कुला मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीति में दिल्ली चुनाव एक बड़ा परिवर्तन लाया है। जहां बीजेपी और आरएसएस लगातार हिन्दू-मुस्लिम, मस्जिद-मंदिर और राष्ट्रवाद-आतंकवाद जैसे मुद्दों को लेकर चुनावी मैदान में उतरते आए हैं वहीं अन्य पार्टियां इसी से मिलते झुलते मुद्दों के सहारे ही चुनाव को लड़ती रही हैं। लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरिवाल ने काम के बल पर वोट मांगकर जीत दर्ज करके अन्य राज्यों की जनता को यह संदेश दिया है कि जो भी पार्टी आम जनता के लिए काम करे राज्य और देश के निर्माण के लिए उसकी नीतियां हों उसी को वोट दें और सत्ता की बागड़ोर उसी के हाथ में थमाएं। इन सभी चीज़ों को देखते हुए पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे बड़े राज्यों में होने वाले आगामी चुनावों में जनता ने अगर सही फ़ैसला लिया तो आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति के साथ-साथ भारतीय राज्यों की भी सूरत बदली हुई दिखाई देगी। (रविश ज़ैदी)

 

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