Feb २६, २०२० १०:०० Asia/Kolkata
  • दिल्ली में हिंसक झड़पें, क्या सरकार भीड़ को भीड़ से लड़वाकर हालात सामान्य करना चाहती है?!

दिल्ली के कुछ इलाक़ों में भारी तनाव और टकराव के चलते इस प्रकार के हालात हो गए हैं जैसे वहां कोई युद्ध लड़ा गया हो।

मुख्य रूप से उत्तर पूर्वी इलाकों में हिंसा की घटनाएं हो रही हैं जिनमें एक पुलिस कांस्टेबल सहित कम से कम 10 लोग मारे जा चुके हैं।

उपद्रवी उन टीवी चैनलों के पत्रकारों पर हमले कर रहे हैं जो उपद्रवियों की इच्छा के विपरीत हालात की तसवीर दिखाना चाहते हैं। उपद्रवी भीड़ ने रिपोर्टिंग करने गए एनडीटीवी के तीन रिपोर्टरों और एक कैमरापर्सन पर हमला कर दिया। एनडीटीवी अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए मशहूर है।

इसके अलावा जेके 24*7 न्यूज के संवाददाता आकाशा नापा को भी कवरेज के दौरान गोली लगी। अख़बार जनसत्ता के मुताबिक आकाश को दंगा प्रभावित इलाका मौजपुर में करवेज करने के दौरान गोली लगी।  

बीते रविवार से उत्तर पूर्वी दिल्ली के इलाकों में नागिरकता संशोधन कानून को लेकर दो गुटों के बीच झड़पें हो रही हैं। रविवार को स्थिति काफी गंभीर हो गई और दोनों पक्षों के उपद्रवियों ने भीषण हिंसा की, कई दुकानों और गाड़ियों को आग लगायी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है।

कहा यह जा रहा है कि एक समूह सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करना चाह रहा था और दूसरा समूह इसके समर्थन में प्रदर्शन कर रहा था लेकिन हक़ीक़त यह है कि सीएए के समर्थन में प्रदर्शन करने वाले दरअस्ल प्रदर्शन करने के बजाए सीएए विरोधियों का प्रदर्शन ताक़त के बल पर रोकने की कोशिश में लग गए।

यानी जो काम प्रशासन और पुलिस का है वह भीड़ ने संभालने की कोशिश की जिसके चलते हालात बिगड़ गए।

सीएए के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के चलते केन्द्र सरकार निश्चित रूप से परेशान है क्योंकि यह मुद्दा अब अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भी नियमित रूप से उठाया जा रहा है। अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा की ख़बरों की कवरेज के साथ ही साथ ही अमरीकी मीडिया में सीएए क़ानून को लेकर पैदा होने वाले विवाद और इस मामले में जारी प्रदर्शनों और हिंसक झड़पों की ख़बरें छायी रहीं। खुद भारतीय मीडिया का भी यही हाल रहा जो भारत सरकार के लिए निश्चित रूप से चिंता का विषय है क्योंकि मोदी सरकार लोकतंत्र के ज़माने एक लोकतांत्रिक देश के राष्ट्रपति का शाही अंदाज़ में स्वागत करके इस सफ़र को यादगार बनाने की कोशिश में थी मगर प्रदर्शनों और हिंसक झड़पों के चलते कहीं न कहीं सरकार की किरकिरी ज़रूर हुई।

भारत सरकार सीएए के मामले में अपने फ़ैसले पर अड़ी है और प्रदर्शनकारियों को यह आभास है कि उनके लिए करो या मरो की स्थिति है। इस गतिरोध को समाप्त करने के लिए अगर सरकार यह समझती है कि ताक़त का इस्तेमाल करके या समानान्तर प्रदर्शन नहीं बल्कि अपने समर्थकों से प्रदर्शनकारियों पर हमले करवाकर वह कोई नतीजा हासिल कर सकती है तो यह ख़तरनाक खेल है क्योंकि यह जनता को जनता से लड़ाने वाली नीति है और यह नीति हालात को बेक़ाबू कर सकती है।(AH)

नोटः लेखक के विचार से पार्स टुडे हिंदी का सहमत होना अनिवार्य नहीं है।

 

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