Feb २६, २०२० १६:५२ Asia/Kolkata
  • दिल्ली जो एक शहर था आलम में इन्तेखाब ... हिन्दू हो ? बच गये , इंडियन एक्सप्रेस की खौफनाक रिपोर्ट, जल रहा है भारत का दिल

भारत का दिल जल रहा है, दिल्ली में दंगाई खुले आम घूम रहे हैं, कोर्ट तक कह रही है कि पुलिस ने अपनी पेशेवराना ज़िम्मेदारी नहीं निभाई...

कई सौ साल पहले की बात है  कहते हैं  उर्दू के प्रसिद्ध शायर मीर तक़ी मीर जब दिल्ली के हालात खराब होने के बाद लखनऊ गये और वहां किसी मुशाअरे में जब शामिल हुए तो उनकी पोशाक और तौर तरीका देख कर कुछ लोग हंसने लगे जिस पर उन्होंने पूरी कविता कह दी । कविता के आखिर में उन्होंने कहा कि दिल्ली जो दुनिया का एक चुना हुआ शहर था, जहां दुनिया के चुने हुए लोग रहते थे, जिसे बर्बाद कर दिया गया और लूट कर वीरान कर दिया गया, हम उसी उजड़े  इलाके के रहने वाले हैं।

मीर तक़ी मीर के ज़माने में दिल्ली के हालात चाहे जिन वजहों से बिगड़े हों फिलहाल तो दिल्ली न जाने कितने मीर जैसे लोगों को, यह कहने पर मजबूर कर रहा है कि " हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के "  आज दिल्ली के कई फोटोज़ को देख कर, " उजड़े दयार" की कल्पना हो रही है। दिल्ली का यह हाल उसके अपने ही कर रहे हैं। हिंसा में 20 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और हाई कोर्ट ने कहा है कि वह सन 1984 को दोहराने की अनुमति नहीं देगा।

 

     इंडियन एक्सप्रेस की एक सुर्खी है " हिन्दू हो बच गये " इस सुर्खी के अंतर्गत इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार शिव नारायन पुरोहित राज दंगाइयों का शिकार होते होते बच गये। वह अपनी रिपोर्ट में लिखते हैः

" उस समय दोपहर के एक बजे थे। नार्थ ईस्ट दिल्ली के करावल नगर के पास बीच सड़क पर एक बेकरी शाप के कुछ सामान और फर्नीचर अधजली हालत में पड़े थे और मैं उस दुकान का फोन नंबर लिखते वक्त अचानक रुक गया। 40 साल का एक नौजवान मेरे पास आया और उसने पूछाः कौन हो तुम? यहां क्या कर रहे हो? ... मैंने बताया कि मैं एक पत्रकार हूं। उस के बाद उसने मुझ से कहा कि मुझे अपनी नोटबुक दो ... उसने नोटबुक उलट – पलट कर देखा और उसमें कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला, उसमे केवल कुछ फोन नंबर थे और उस जगह के बारे में आंखों देखी हालत लिखी हुई थी। उसने मुझे धमकी दी कि तुम यहां से रिपोर्टिंग नहीं कर सकते ... उसने मेरी नोटबुक को बेकरी के जले हुए सामान के बीच फेंक दिया।

     उसके बाद लगभग पचास लोगों की भीड़ ने मुझे घेर लिया उन्हें शक था कि मैंने वहां की जाने वाली हिंसा की कुछ क्लिप अपने मोबाइल फोन से रिकार्ड कर ली हैं। उन्होंने मेरे फोन की जांच की और कोई भी वीडियो या फोटो मेरे मोबाइल में नहीं मिला, लेकिन उन्होंने मेरा मोबाइल लौटाने से पहले उसमें मौजूद सारे वीडियो और फोटो डिलीट कर दिये। फिर उन्होंने पूछा, तुम यहां क्यों आए हो? ... क्या तुम जेएनयू से हो? जान बचाने के लिए मुझे वहां से भागने को कहा गया और मुझ से इसी तरह के कई सवाल पूछे गये।

     घटना स्थल से लगभग 200 मीटर की दूरी पर मैंने अपनी बाइक पार्क की थी और मैं उस तरफ जाने लगा। जैसे ही पार्किंग के पास पहुंचा लाठी और राड से लैस दूसरा ग्रुप मेरे पास आ गया। उस ग्रुप में शामिल एक व्यक्ति ने अपना चेहरा छुपा रखा था और उसने मुझ से फिर कहा कि अपना मोबाइल दिखाओ... मैंने उनसे कहा कि मेरे मोबाइल से सभी फोटो और वीडियो डिलीट किये जा चुके हैं। वह दोबारा चिल्लाया, ..." फोन दे " वह मेरे पीछे खड़ा हो गया और उसने मेरी जांघों पर दो डंडे मारे... मैं कुछ देर के लिए चुप हो गया।

      उस भीड़ से कुछ आवाज़ें भी आयीं... तुम्हारे लिए फोन क़ीमती है या ज़िंदगी? मैंने अपना फोन लड़के को दे दिया... वह लड़का शोर मचाता हुआ भीड़ में गुम हो गया।

     कुछ ही क्षणों बाद दूसरी भीड़ मेरा पीछा करने लगी। लगभग 50 साल का एक व्यक्ति मेरे  पास आ और उसने मेरा चश्मा ज़मीन पर फेंका और उसे कुचल दिया। हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र से रिपोर्टिंग करने के कारण उसने मुझे दो थप्पड़ मारे। उन लोगों ने मेरा प्रेस कार्ड चेक किया और बोले, शिव नारायन राज पुरोहित, हां... हिन्दू हो? बच गये लेकिन वह संतुष्ट नहीं हुए वह अच्छी तरह से यक़ीन करना चाहते थे कि मैं सच में हिन्दू ही हूं। उन्होंने मुझ से कहा, बोलो जय श्रीराम... मैं चुप था, उन्होंने मुझे आदेश दिया कि ज़िंदगी बचानी है तो जल्दी से यहां से भाग जाओ... उनमें से एक ने कहा कि एक और भीड़ आ रही है आप के लिए, मैं बाइक की चाबी निकालने के लिए अपना बैग चेक कर रहा था । हर एक मिनट मुझ पर भारी था । तभी उनमें से एक ने कहा कि जल्दी करो वह लोग छोड़ेंगे नहीं । आखिरकार मुझे बाइक की चाभी मिली और मैं वहां से चल पड़ा।

     इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार शिव नारायन राज पुरोहित बच गये बहुत खुशी की बात है लेकिन  दंगाइयों की भीड़ में फंसने वाला हर कोई इतना सौभाग्यशाली नहीं होता! या यूं कहें कि हर कोई "शिव नारायन राज पुरोहित " नहीं होता। Q.A.

 

 

 

 

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