Mar २६, २०२० २०:०३ Asia/Kolkata
  • भारत को क्या चाहिए मास्क या हथियार? मोदी मास्क ख़रीदने के बजाए करोड़ों डॉलर के हथियार ख़रीद रहे हैं

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कोरोना वायरस संकट से निपटने की शैली की आलोचनाओं के बीच उनकी सरकार ने इस्राईल से करोड़ों डॉलर के हथियारों के समझौते को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है।

जिस देश में 1.3 अरब लोग स्वास्थ्य आपातकाल या लॉकडाउन और फ़ेस मास्क जैसी बुनियादी चीज़ों की कमी का सामना कर रहे हैं, वहां सरकार द्वारा करोड़ों डॉलर हथियारों पर ख़र्च करने से लोगों की चिंताओं में वृद्धि होना वाजिब है।

इस्राईल और भारत के बीच 11 करोड़ 60 लाख डॉलर का समझौता हुआ है, जबकि कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई में फ्रंटलाइन पर अपनी सेवाएं देने वाले डॉक्टर मास्क और अन्य सुरक्षात्मक उपकरणों की कमी की शिकायत कर रहे हैं। इससे यह सच्चाई सामने आ जाती है कि मोदी सरकार इस वैश्विक महामारी से निपटने के लिए कितनी तैयार है, जो अब भारत में तेज़ी से अपने पैर पसार रही है।

सोमवार को महामारी के एक विशेषज्ञ भारतीय डॉक्टर ने कहा था कि देश में 55 प्रतिशत या लगभग 71 करोड़ 50 लाख लोग वायरस से संक्रमित हो सकते हैं औरन मई तक लगभग 30,000 मौतें हो सकती हैं।

महामारी के तेज़ी से बढ़ते प्रभाव और विश्व अर्थव्यवस्था पर इसके असर के बीच पहले से ही संकट का सामना कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था इस मोड़ पर भारी सैन्य ख़र्चों को सहन कर पाएगी, इसमें संदेह है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक राजनीति के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर अचिन विनायक ने मोदी सरकार के इस फ़ैसले को बहुत ही असाधारण और निंदनीय बताया है।

उनका कहना है कि भारत सरकार को 1.3 बिलियन आबादी वाले देश में तेज़ी से फैल रही कोरोना वायरस महामारी के बहुत ही भंयकर ख़तरे से निपटने के लिए एक एक रुपये की ज़रूरत है। यूरोप और अमरीका की तुलना में यहां लोग बहुत ही घनी आबादी वाले शहरों और क़स्बों में रह रहे हैं। यहां तक कि चीन और एशिया के अन्य देशों की तुलना में भारत में आपात स्थिति से निपटने के लिए चिकित्सा व्यवस्था बेहद कमज़ोर है।

गुरुवार को हस्ताक्षर किए गए हथियारों का यह समझौता मूल रूप से फ़रवरी 2018 से संबंधित है, और यह इस्राईली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए हथियारों के कई समझौतों का एक हिस्सा है।

हालांकि भारत के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि भारतीय सेना को हथियारों की बेहद ज़रूरत है और इससे सैनिकों का आत्मविश्वास बढ़ेगा।

लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद का कहना है कि गंभीर और एक बड़े संकट के समय हथियारों को प्राथमिकता देना बीजेपी सरकार द्वारा भारत को एक सुरक्षा राज्य में बदलने की व्यापक योजना का हिस्सा है।

उनका कहना था कि यह स्पष्ट है कि मोदी के पास इस संकट से निपटने के लिए कोई उपाय नहीं है, हमारे डॉक्टरों के पास पर्याप्त मात्रा में सुरक्षात्मक उपकरण नहीं हैं, हमारे पास विशेषज्ञों द्वारा सलाह के अनुसार कोरोना के मामलों के टेस्ट करने की क्षमता नहीं है।

इसी प्रकार, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नेता कविता कृष्णन का कहना था कि सरकार ने अभी तक महामारी से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले ग़रीबों और मज़दूरों के लिए किसी तरह के राहत पैकेज की घोषणा नहीं की है, जो हर दिन कमाते और खाते हैं, इसके बजाए सरकार हथियार ख़रीदने में अधिक दिलचस्पी दिखा रही है।

उनका कहना था कि हर रोज़ कमाकर खाने वाले मज़दूरों को अचानक अपने गांवों की ओर लौटने के लिए मजबूर कर दिया गया, जो जाते हुए शायद वायरस के संक्रमण को भी अपने साथ ले गए हों और इस तरह से गांव में रहने वालों के जीवन को भी जोखिम में डाल दिया गया।

हालिया वर्षों में भारत और इस्राईल के संबंधों में काफ़ी मज़बूती देखने में आई है, ख़ासकर मोदी और नेतन्याहू के शासनकाल में। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि हथियारों का व्यापार इन संबंधों का आधार है या मुसलमानों की दुश्मनी या दोनों? msm

 

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