May २५, २०२० १३:५२ Asia/Kolkata
  • क्या भारत और चीन के बीच सुलगने वाली चिंगारी शोला बन रही है, दोनों के बीच युद्ध की स्थिति में किसका पलड़ा रहेगा भारी?

भारत और चीन के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है। सन् 1962 में दोनों देश एक बड़ा युद्ध लड़ चुके हैं। उसके बाद भी दोनों के बीच सीमाओं पर कई बार झड़पें हुई हैं, लेकिन 1975 के बाद से संयुक्त सीमा पर एक भी गोली नहीं चली है।

इसके नतीजे में एक आम धारणा यह बन गई है कि चीन और भारत के बीच छिटपुट घटनाएं एक साधारण बात है और इनके व्यापक लड़ाई में बदलने की संभावना नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि दोनों देशों के बीच हालिया घटने वाली कुछ घटनाएं स्पष्ट रूप से यह संकेत दे रही हैं कि यह चिंगारी कभी भी शोले में बदल सकती है।

लद्दाख़ में संयुक्त सीमा पर दोनों देश लगातार सैनिकों की संख्या में इज़ाफ़ा कर रहे हैं और बंकर बना रहे हैं। ख़ास तौर से चीन सैन्य चौकियां और बंकरों के निर्माण के लिए आवश्यक मशीनें सीमा पर पहुंचा रहा है। इससे वह यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि इस बार तनाव आसानी से जल्दी ख़त्म होने वाला नहीं है।  

पिछले एक दशक से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) कई रणनीतिक सीमावर्ती क्षेत्रों में भारत की सैन्य तैयारी, तत्परता और राजनीतिक संकल्प का इमतहान लेती रही है। इसलिए वह कब इस नतीजे पर पहुंचती है कि यही शांति भंग करने का सही समय है, कुछ कहा नहीं जा सकता।

इस महीने की शुरूआत से स्थिति अधिक गंभीर होना शुरु हो गई है। 5 मई को लद्दाख़ में पैंगोंग त्सो झील के निकट भारतीय और चीनी सैनिक आपस में भिड़ गए। यह झड़प इसलिए हुई, क्योंकि पीएलए ने क्षेत्र में भारतीय सैनिकों के गश्त करने पर आपत्ति जताई। उसके बाद क़रीब हर रोज़ ही झपड़ें हो रही हैं। इनमें से अधिकांश झड़पें तथाकथित वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हुई हैं, जिसका हर पक्ष अपने हिसाब से अलग-अलग आकलन करता है। 9 मई को 15,000 फ़ीट की ऊंचाई पर तिब्बत के पास नकु ला क्षेत्र में दोनों देशों के सैनिक आ धमके और पत्थरबाज़ी करने लगे। हालांकि इस झड़प में हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया गया, लेकिन एक वरिष्ठ भारतीय सैन्य अधिकारी समेत दर्जनों सैनिक घायल हो गए।

संयुक्त सीमा पर दोनों देशों के बीच लंबे समय तक कथित शांति के बाद, सैनिकों के टकराने की घटनाएं फिर से सामने आने लगी हैं। भारत सरकार का दावा है कि 2016 और 2018 के बीच, चीनी सेना ने 1,025 बार भारतीय क्षेत्रों में प्रवेश किया है।

2017 में डोकलाम में उस वक़्त एक गंभीर टकराव की स्थिति पैदा हो गई थी, जब भारतीय और चीनी सैनिक दो महीने तक एक दूसरे के सामने डटे रहे थे। यह एक ऐसा इलाक़ा है, जिस पर भूटान और चीन दोनों का दावा है। मोदी सरकार द्वारा चीनी सेना के लिए रास्ता छोड़ने के बाद, यह टकराव किसी तरह से टल गया था।

1988 में तिब्बत के घटनाक्रमों पर नई दिल्ली ने अर्थपूर्ण मौन धारण कर लिया था, जबकि अगर देखा जाए तो उस समय विश्व मंच पर दोनों देशों की ताक़त लगभग बराबर थी। विश्व बैंक के अनुसार, उस वर्ष चीन के 312 बिलियन डॉलर की तुलना में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 297 बिलियन डॉलर था। भारत ने रक्षा पर 10.6 बिलियन डॉलर ख़र्च किया था,  तो चीन का ख़र्च 11.4 बिलियन डॉलर था।

लेकिन उसके बाद से दोनों देशों के बीच शक्ति के संतुलन में बहुत तेज़ी से बदलाव हुआ। 2018 में 13.6 ट्रिलियन के साथ चीन की जीडीपी भारत की जीडीपी 2.7 ट्रिलियन डॉलर से पांच गुना अधिक है। 2019 में चीन का रक्षा बजट 261.1 बिलियन डॉलर था, जबकि भारत ने रक्षा पर केवल 71.1 बिलियन डॉलर ख़र्च किए।

कोरोना वायरस महामारी के दौरान, वैश्विक शक्ति संतुलन में काफ़ी तेज़ी से बदलाव हो रहा है। अमरीका जहां अपनी वैश्विक भूमिका को बचाने के लिए हाथ-पैर मार रहा है, वहीं चीन का प्रभाव तेज़ी से बढ़ रहा है, यहां तक कि अमरीका के पारम्परिक सहयोगी पश्चिमी देश भी चीन की ओर देखने लगे हैं।

ऐसी स्थिति में दोनों देशें के बीच टकराव से सबसे अधिक लाभ अमरीका को हो सकता है। नई दिल्ली में मोदी सरकार का झुकाव क्योंकि वाशिंगटन और तेल-अवीव की ओर अधिक है, इसलिए इस बात की संभावना है कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद एक बड़े युद्ध में बदल जाए। msm

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