May २९, २०२० १३:२० Asia/Kolkata
  • भारत और चीन के बीच चल क्या रहा है? वह सच्चाई जिसे भारतीय मीडिया कभी नहीं बताएगा

इस महीने की शुरूआत में हिमालय की ऊंचाईयों पर स्थित पैंगौंग झील पर भारतीय और चीनी सैनिकों में हाथापाई हुई और लात घूंसों के आदान-प्रदान ने कई सैन्य अधिकारियों को अस्पताल तक पहुंचा दिया तो भारतीय सेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवणे को कोई ख़ास चिंता नहीं हुई।

उन्होंने कहाः दोनों देशों की 4,000 किलोमीटर लम्बी सीमा पर कभी कभार इस तरह की छोटी-मोटी घटनाएं घटती रहती हैं।

लेकिन एक हफ़्ते बाद ही जनरल नरवणे को क्षेत्रीय राजधानी लेह में 14वीं बटालियन के मुख्यालय की और दौड़ना पड़ा, क्योंकि इस बार सबकुछ ठीक नहीं था, बल्कि कुछ गंभीर हो रहा था।

भारतीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, चीनी सैनिक कई बिंदुओं पर अपरिभाषित सीमा को पार करके 3 से 4 किमी तक भारत की सीमा में घुस आए। उन्होंने भारतीय सेना की चौकियों और पुलों को नष्ट कर दिया और वहां खाई खोदकर टैंट लगा दिए। यह चढ़ाई गलवान और श्योक नदियों के संगम, हॉट स्प्रिंग्स तथा पैंगोंग झील के इलाक़ों में की गई है।

हालांकि सच्चाई यह है कि चढ़ाई करने वाले चीनी सैनिकों की सही संख्या और क़ब्ज़ा किए गए इलाक़े को लेकर अभी तक काफ़ी अनिश्चितता बनी हुई है। भारतीय सेना के पूर्व कर्नल अजय शुक्ला का अनुमान है कि इस चढ़ाई में तीन चीनी ब्रिगेड शामिल हैं और प्रत्येक ब्रिगेड में सैकड़ों नहीं बल्कि हज़ारों सैनिक हो सकते हैं, वे उत्तराखंड के पास दक्षिण में सैकड़ों किलोमीटर अंदर तक घुस गए हैं।

यह तस्वीर चीनी सेना की आक्रमकता को दिखाती है और उसकी एक हमलावर सेना की छवि पेश कर सकती है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करने वाले सैनिकों के समर्थन के लिए उनके पीछे सैनिकों की एक बड़ी संख्या होने की संभावना है।

जनरल नरवणे की पेशानी पर चिंता की लकीरों का उभरना और प्रधान मंत्री मोदी की परेशानी बिल्कुल सही है, इसलिए कि इस बार यह एक सामान्य हाथापाई नहीं है। इस बार गलवान घाटी के पश्चिम में उस क्षेत्र में यह घटनाएं घट रही हैं, जिसपर इससे पहले कभी चीन ने अपना दावा नहीं ठोंका था। हालांकि 1962 के युद्ध में चीनी सेना ने इस घाटी पर क़ब्ज़ा कर लिया था, जिसे बाद में वापस लौटा दिया गया। उन कई बड़े क्षेत्रों के विपरीत, जिन्हें आज भी भारत अपना बताता है, लेकिन उन पर चीन का क़ब्जा है। 25 मई को चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने दावा किया था कि "गलवान वैली चीन का इलाक़ा है।"

मोदी सरकार चीन की इस घुसेपैठ को सीमा पर दो देशों के सैनिकों के बीच एक सामान्य टकराव दिखाने की नाकाम कोशिश कर रही है, जिसका भारतीय मीडिया भरपूर समर्थन कर रहा है और जनता तक सच्चाई नहीं पहुंचने दे रहा है।

इसकी गंभीरता का अंदाज़ा दोनों देशों के बीच अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की लगातार दो बार मध्यस्थता की पेशकश से भी होता है। उन्होंने यह भी कहा है कि दोनों देशों के बीच तनाव को लेकर उनकी पीएम मोदी से बात हुई, जो काफ़ी नाराज़ थे।

उधर चीन के राष्ट्रपति शी जिन-पिंग ने चीनी सेना से सैनिकों के प्रशिक्षण को व्यापक करने और युद्ध के लिए तैयार रहने का आदेश दिया है।

हालांकि नई दिल्ली का कहना है कि वर्तमान संकट के समाधान के लिए मध्यस्थता की ज़रूरत नहीं है और उसकी सीधे बीजिंग से बात चल रही है, लेकिन यह भी वास्तविकता है कि गतिरोध को ख़त्म करने के लिए डिवीज़न कमांडर स्तर पर हुई कई दौर की वार्ता विफल रही हैं।

मोदी सरकार के हालिया कई फ़ैसलों से चीन काफ़ी नाराज़ है, इसलिए इस बार वह आसानी से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। चीन मोदी सरकार पर भरपूर दबाव बनाकर उसे इन फ़ैसलों पर पुनर्विचार करने पर मजबूर करने की नीति पर आगे बढ़ रहा है। msm

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