May ३१, २०२० २०:२४ Asia/Kolkata
  • भारत नियंत्रित कश्मीर में मौतें और जासूस कबूतर

भारत नियंत्रित कश्मीर में बिल्कुल आम बातें भी राजनैतिक बन गई हैं जहां झड़पों के चलते सामान्य जीवन बहुत समय से अस्त व्यस्त है।

भारतीय सेना और कश्मीरी अलगाववादियों के बीच झड़पों में मारे जाने वाले कश्मीरियों की लाशें उनके परिजनों को नहीं दी जा रही हैं। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि कोरोना वायरस की वजह से वह लाशें नहीं दे रहे हैं। यह बात जम्मू व कश्मीर के इंसपेक्टर जनरल ने मीडिया से कही।

अधिकारियों के इस रवैए से कश्मीरी परिवारों में गहरा क्षोभ है। हाज़िम शफ़ी बट एक गूंगा किशोर था जिसे उसके गांव के पास ही भारतीय सुरक्षा बलों ने हताहत कर दिया। यह घटना हंदवारा में गत 4 मई को हुई। अधिकारियों ने बट का शव उसके गांव से 35 किलोमीटर दूर दफ़्न करवा दिया। बट को लावारिसों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न कराया गया हालांकि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि वह छापामार था। 14 साल के बट को भारतीय पुलिस के एक बयान में आम नागरिक भी कहा गया है। बट की मां मीमा बेगम अपने आप को संभाल नहीं पा रही हैं।

अप्रैल महीने से ही अधिकारियों ने पुलिस के हाथों मारे गए लोगों के शव उनके परिवारों को देने से इंकार कर दिया है। स्थानीय मीडिया का कहना है कि कम से कम आठ परिवारों को प्रशासन के इस फ़ैसले का दंश झेलना पड़ रहा है। अधिकारी मारे गए लोगों को उनके निवास स्थान से बहुत दूर कहीं ले जाकर दफ़्न करवा रहे हैं।

एक विद्रोही वकील नबी डार को सोनमर्ग के सरकारी क़ब्रिस्तान में दफ़्न कर दिया गया जो उसके पैतृक शहर पुलवामा से 120 किलोमीटर दूर है। डार के अंतिम संस्कार में परिवार के किसी भी सदस्य को शामिल नहीं होने दिया गया।

मानवाधिकार कार्यकर्ता ख़ुर्रम परवेज़ का कहना है कि छापामारों के अंतिम संस्कार में हज़ारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं और सरकार चाहती है कि इस प्रकार की चीज़ें बाहर न जाएं और दुनिया को इनके बारे में पता न चले इसलिए वह कोरोना वायरस का बहाना बनाकर बड़ी ख़ामोशी से अंतिम संस्कार करवा देती है।

इतना ही नहीं अब तो कबूतरों पर भी शक किया जा रहा है। कोई कबूतर सीमा पार करके भारतीय वायु क्षेत्र में चला गया तो भारतीय मीडिया में इस पर हंगामा मच गया क्योंकि कबूतर के पर का रंग कहीं बदला हुआ था और उसके पैर में एक छोटी रिंग थी।

पाकिस्तान नियंत्रित कश्मीर में एक व्यक्ति ने डान अख़बार से बात करते हुए बताया कि कबूतर उसका है और वह भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अपील करता है कि कबूतर लौटा दिया जाए वह जासूस नहीं शांति का दूत है।

यह हालात तब हैं जब कश्मीर में कोरोना वायरस की महामारी फैली हुई है। स्थानीय लोग बीमारी से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उन्हें ढेरों रुकावटों का सामना करना पड़ रहा है।

स्रोतः अलजज़ीरा

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