Jul ०७, २०२० १५:५८ Asia/Kolkata
  • बड़ी सौदेबाज़ी के बाद लद्दाख़ में पीछे हटने पर तैयार हुआ ड्रैगन, चीन के सुपर पॉवर बनने के रास्ते में रुकावट नहीं बनेगा भारत

सोमवार को भारतीय मीडिया में यह ख़बर आई कि चीनी सेना ने गलवान घाटी में उस जगह से पीछे हटना शुरू कर दिया है, जहां 15 जून को चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच पिछले पांच दशकों में सबसे ख़तरनाक झड़प हुई थी।

मीडिया रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि भारतीय सेना भी गलवान में अपने बेस कैंपों में लौट गई है।

कहा जा रहा है कि दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की प्रक्रिया में रविवार को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीत हुई बातचीत ने अहम भूमिका अदा की है।

हालांकि सूत्रों का कहना है कि दोनों देशों के बीच कई दौर की ख़ुफ़िया बातचीत के बाद, सीमा पर तनाव करने और चीनी सैनिकों के विवादित क्षेत्रों से पीछे हटने पर सहमति बनी है।

यहां सवाल यह है कि चीन ने किस मक़सद से लद्दाख़ में विवादित क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा किया था और तनाव को इस हद बढ़ा दिया था?

मई में जब चीनी सेना ने लद्दाख़ में सीमा पर सैनिकों और हथियारों के भारी जमावड़े के बाद, कई इलाक़ों में आगे बढ़ना शुरू किया तो कुछ लोगों ने इसका कारण, चीन द्वारा एलएसी पर मौजूदा स्थिति में बदलाव की कोशिश क़रार दिया।

कुछ दूसरे लोगों का कहना था कि भारतीय सेना ने सीमा पर अपने इलाक़ों में सड़कें और निर्माण कार्य शुरू किए हैं, जिससे चीन भड़क गया और उसने उकसाने वाला यह क़दम उठाया।

हालांकि चीन की विदेश नीति पर नज़र रखने वाले कुछ विशेषज्ञों का शुरू से ही मानना था कि चीनी सेना का भारत की सीमा में घुसने का मक़सद, किसी इलाक़े पर क़ब्ज़ा करना नहीं था, बल्कि बीजिंग यह क़दम उठाकर, अपनी कुछ मांगे मंगवाने के लिए नई दिल्ली पर ज़रूरी दबाव बनाना चाहता था।

दोनों देशों के सैनिकों के बीच 15 जून की झड़प के बाद, जिसमें 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई थी, मोदी सरकार पर भारतीय जनता का अभूतपूर्व दबाव बढ़ा और वह पूरी तरह से बैकफ़ुट पर आ गई।

मोदी सरकार पर बदला लेने और चीन को अपनी सीमा से तुरंत बाहर निकालने के लिए भारी दबाव था। जहां तक बदला लेने की बात थी, तो उसके लिए मोदी सरकार ने मीडिया प्रचार का सहारा लिया और लोगों को यह संदेश दिया कि इस झड़प में भारतीय सैनिकों का पलड़ा भारी रहा है और चीन को अधिक जानी नुक़सान हुआ है।

वहीं सीमा पर चीनी सैनिकों को पीछे हटाने के लिए भारत के पास दो विकल्प थे। बातचीत के ज़रिए चीन को पीछे हटने पर राज़ी किया जाए या सैन्य बल पर उसे पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया जाए।

चीन की सैन्य शक्ति और कोरोना संकट से जूझ रहे भारत ने बातचीत के विकल्प को प्राथमिकता दी और सैन्य स्तर पर बातचीत के साथ-साथ ख़ुफ़िया स्तर पर भी बातचीत की शुरूआत की।

जबसे मोदी सरकार ने चीन की सबसे महत्कांक्षी योजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का विरोध किया और भारत ने 16 क्षेत्रीय देशों की समग्र आर्थिक साझेदारी आरसीईपी से निकलने का एलान किया तो चीन को यह अहसास हो गया कि उसके सुपर पॉवर बनने के मार्ग में भारत सबसे बड़ी रुकावट बन सकता है।

क्षेत्रीय स्तर पर मोदी सरकार की आक्रामक विदेश नीति में नर्मी लाने के लिए चीन ने सोची समझी योजना के तहत लद्दाख़ में तनाव बढ़ाया और नई दिल्ली को अपनी मांगें मंगवाने के लिए मजबूर कर दिया।

अब यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा कि भारत ने चीन की कौन कौन सी मांगे मान ली हैं, जिसके बाद दोनों देशों के बीच सीमा पर तनातनी कम करने के लिए सहमति बनी है। msm

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