Oct २७, २०२० १६:३२ Asia/Kolkata
  • आरएसएस को अचानक भारत ही नहीं पूरे इलाक़े को एकजुट करने का ख़याल क्यों आया?

भारत में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के पैत्रिक संगठन आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत के नागपुर में दिए गए हालिया एक घंटे और कुछ मिनट के भाषण पर अगर ध्यान दिया जाए तो एक चीज़ बहुत साफ़ नज़र आती है और वह चीन के ख़तरे का डर और इस डर से निपटने के लिए अपनी पुरानी विभाजनकारी नीतियों से पीछा छुड़ाने की कोशिश।

सत्ता संभालने के बाद भाजपा और उससे जुड़े संगठनों ने बड़े योजनाबद्ध ढंग से पूरे देश में अल्पसंख्यकों और विशेष रूप से मुसलमानों को डराने की कोशिश। इस योजना के तहत कई स्थानों पर मुसलमानों की लिंचिंग की गई। राजधानी दिल्ली सहित कुछ जगहों पर दंगे और सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा की गई। इसी नीति का बखान करते हुए भाजपाई विचार के लोग बार बार गुजरात का हवाला देते हैं कि 2002 के दंगों के बाद वहां कोई दंगा नहीं हुआ यानी मुसलमान सहम कर बैठ गए। इन घटनाओं से अल्पसंख्यक कितना डरे यह तो स्पष्ट नहीं है लेकिन इतना ज़रूर है कि विश्व स्तर पर भारत की बदनामी होने के साथ ही ख़ुद भारत के भीतर आम हिंदू समाज भी इन घटनाओं के विरोध में डटकर खड़ा हो गया।

एनआरसी, सीएए, बाबरी मस्जिद का मामला, तीन तलाक़ का मुद्दा जैसे कई अवसरों पर मुसलमानों को यह एहसास दिलाने की कोशिश की गई कि उनके बस में अब कुछ नहीं है, उन्हें हिंदुत्व की कट्टरपंथी विचारधारा के आगे प्रतिरोध के बजाए समर्पित हो जाना चाहिए। मगर इस बीच मुसलमानों ने सीएए, एनआरसी के ख़िलाफ़ देश व्यापी आंदोलन चलाकर अपनी ताक़त का एहसास दिलाया।

कश्मीर के मामले में भाजपा सरकार ने धारा 370 हटाकर भी अपनी इसी योजना को मज़बूत करने की कोशिश की लेकिन कश्मीरी नेताओं के रुख़ को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि इस मुद्दे को निपटाने में मोदी सरकार कामयाब हो गई है ख़ास तौर पर इसलिए भी कि अब इस मामले में चीन का एक एंगल भी सामने आ गया है।

भारत सरकार देश के भीतर यह बड़ी लड़ाई लड़ने में इतनी व्यस्त थी और विजय पर विजय हासिल करती जा रही थी कि उसे याद ही नहीं रहा कि उसका असली मुक़ाबला देश के भीतर नहीं देश के बाहर है। डोकलाम गतिरोध के बाद ही मोदी सरकार को सचेत हो जाना चाहिए था मगर सच्चाई यह है कि मोदी सरकार और आरएसएस की नींद तब टूटी है जब लद्दाख़ के इलाक़े में चीन के साथ तनाव चरम पर पहुंच गया है और एलएसी पर कई जगहों पर तनाव है।

आरएसएस सरसंघचालक अब हिंदुत्व की परिभाषा का दायरा बढ़ा रहे हैं और हालिया बयान में ख़ुद को बहुलतावादी दर्शाने की कोशिश ही नहीं कर रहे हैं बल्कि ब्रम्ह देश का भूगोल याद करके क्षेत्र के देशों को एकजुट करने की वकालत कर रहे हैं।

सवाल यह है कि दशकों से और विशेष रूप से हालिया वर्षों में एकता व एकजुटता और गंगा जमुनी तहज़ीब पर कट्टरपंथियों की ओर से लगातार जो योजनाबद्ध हमले हुए हैं उनके घाव भरने के लिए क्या इस तरह के दो चार भाषण काफ़ी हैं। देश और फिर क्षेत्र को एक जुट करने और अपना आकार चीन से बड़ा बनाने का ध्येय वर्तमान सोच और वर्तमान बर्ताव के साथ हासिल करना संभव होगा?

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