Oct २९, २०२० २०:०० Asia/Kolkata
  • अमरीकी अधिकारियों के बयानों में कड़वाहट और झल्लाहट क्यों हैं?...क्या भारत और क्षेत्र के देश अमरीका पर भरोसा कर पाएंगे?

अमरीका में जहां राष्ट्रपति चुनाव अपने चरम पर है वहीं अमरीकी कूटनीति भारत और आसपास के उन देशों में सक्रिय है जिनके चीन से मतभेद हैं और अलग अलग स्तर पर यह कोशिश की जा रही है कि इन देशों को चीन के ख़िलाफ़ मोबिलाइज़ किया जाए। इस बीच एक बात बहुत साफ़ तौर पर नोट की जा रही है कि अमरीकी अधिकारियों के बयानों में हताशा और झल्लाहट है।

अमरीकी वेदश मंत्री माइक पोम्पेयो चीन की सरकार का नाम लेने के बजाए चाइना कम्युनिस्ट पार्टी का नाम लेते हैं और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को चीन का राष्ट्रपति कहने के बजाए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का जनरल सेक्रेट्री कहते हैं। पोम्पेयो ने भारत के वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता को दिए गए इंटरव्यू में यह कहा कि वह चीन की वर्तमान सरकार को चीन की जनता से अलग मानते हैं यानी उसे चीन की क़ानूनी सरकार नहीं समझते। यानी पोम्पेयो का लगता है कि चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ने इस देश को अपने चंगुल में जकड़ लिया है और वह वहां की क़ानूनी सरकार नहीं है।

अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पेयो 28 अक्टूबर को श्रीलंका पहुंचे वहां उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट सरकार को 'हिंसक जानवर' कहा। पॉम्पियो की इस टिप्पणी पर राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे को सफ़ाई देनी पड़ी उन्होंने ट्विटर पर अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पेयो को टैग करते हुए लिखा कि श्रीलंका हमेशा से अपनी विदेश नीति में तटस्थ रुख़ रखता आया है और हम ताक़तवर देशों के टकराव में नहीं उलझेंगे।

भारत में टू प्लस टू वार्ता में अमरीका के विदेश व रक्षा मंत्रियों की भारतीय विदेश व रक्षा मंत्री से कई मुद्दों पर चर्चा हुई और सैटेलाइट की महत्वपूर्ण तसवीरों सहित संवेदनशील जानकारियों के लेनदेन का समझौता हुआ।

अमरीका भारत को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा है कि चीन के साथ जारी ज़ोरदार मुक़ाबले में वह नई दिल्ली को अकेला नहीं छोड़ेगा बल्कि पूरी तरह साथ खड़ा रहेगा।

अमरीका यही आश्वासन बांग्लादेश मालदीप आस्ट्रेलिया, जापान, ताइवान और दक्षिणी कोरिया सहित इस इलाक़े के देशों को देना और उन्हें चीन के मुक़ाबले में उठ खड़े होने पर तैयार करना चाहता है।

पोम्पेयो के बयानों में जिन शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है वह साफ़ ज़ाहिर करते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय पटल पर चीन से अपनी बहुमुखी लड़ाई में अमरीका लगातार कमज़ोर हो रही अपनी स्थिति से अच्छी तरह वाक़िफ़ है इसलिए वह अब मोर्चा बदल कर आमने सामने की लड़ाई के बजाए छद्म युद्ध में चीन को उलझाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। यहां दो बातें समझने की हैं। एक तो यह कि चीन के आसपास जो देश हैं क्या चीन के साथ उनके विवाद इस सीमा तक आगे पहुंच चुके हैं कि चीन से टकरा जाने के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं रह गया है? दूसरी महत्वपूर्ण बात जो इन देशों को समझनी है वह यह है कि मध्यपूर्व के इलाक़े में अमरीका अपने बेहद क़रीबी घटकों सऊदी अरब, इमारात और क़तर के बारे में किस तरह के बयान दे रहा है। क्या वह नहीं कह रहा है कि अमरीका इन देशों की मुफ्त में रक्षा नहीं करेगा बल्कि इसकी क़ीमत वसूलेगा। ट्रम्प अपने बयानों में अपने घटकों का कई बार इस मामले में अपमान भी कर चुके हैं।

यही नहीं यूरोपीय घटकों को भी अब यक़ीन हो गया है कि अमरीका पर भरोसा करने के बजाए उन्हें ख़ुद आगे आकर अपना मिशन संभालना है।

इन हालात में क्या दक्षिणी और पूर्वी एशियाई देश अमरीका पर भरोसा करेंगे?

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