Jan २१, २०२१ १९:५२ Asia/Kolkata
  • आज की बातः भारत में किसान आंदोलन की ताज़ा स्थिति, सरकार का रवैया और कुछ मीडिया चैनलों की भूमिका

भारत में तीन नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का धरना और आंदोलन शुरू हुए लगभग दो महीने हो गए हैं।

किसान नेताओं और सरकार के बीच कई चरण की बातचीत हो चुकी है लेकिन उसका अब तक कोई नतीजा नहीं निकल सका है। सरकार का कहना है कि वह क़ानूनों को वापस लेने की मांग के अलावा हर मुद्दे पर बात करने के लिए तैयार है और इनमें संशोधन भी किया जा सकता है। भारत के केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने भी समाचार एजेंसी एएनआई से वार्ता करते हुए इस बात को दोहराया है। सरकार के वार्ताकारों का कहना है कि किसानों की हर तरह की चिंता को दूर करने के लिए हर संभव कोशिश की जाएगी। जबकि किसानों का कहना है कि ये क़ानून किसान विरोधी हैं इस लिए इन्हें वापस लिया जाना चाहिए। भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने सरकार के साथ वार्ता समाप्ति पर बाहर आने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि, किसान बिना क़ानून समाप्त कराए दिल्ली से नहीं जाएगा। उधर यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा। शुरुआत में उच्चतम अदालत ने इस पर कोई ख़ास रुख़ नहीं अपनाया लेकिन जैसे जैसे आंदोलन बढ़ रहा है, सुप्रीम कोर्ट पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है और हाल में उसने सरकार को फटकार भी लगाई है और इन क़ानूनों को लागू किए जाने पर अंतरिम रोक भी लगा दी है और साथ ही इस मामले में एक चार सदस्यीय समिति भी गठित कर दी है। इस पर किसानों का कहना है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से संपर्क ही नहीं किया है और कोर्ट ने जो समिति बनाई है उसमें ऐसे लोग भी हैं जो शुरू से ही इन कृषी क़ानूनों के पक्ष में बोलते रहे हैं, ऐसे में इस समिति की क्या विश्वसनीयता रह जाती है। किसान आंदोलन से जुड़े स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव ने इस संबंध में कहा विस्तार से बताया है। कृषी क़ानूनों पर रोक के उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले और आंदोलन में शामिल बच्चों, बूढ़ों व महिलाओं को घर वापस जाने की उसकी सलाह पर प्रतिक्रिया में किसानों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वे इन क़ानूनों पर रोक नहीं चाहते बल्कि वे इन्हें पूरी तरह से वापस लिए जाने की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी किसानों ने कहा कि, न्यायालय भी एक तरह से वही बात कह रहा है जो भाजपा कह रही है।


इसी बीच किसानों ने एलान कर दिया कि वे गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली में बड़ी संख्या में ट्रेक्टरों क साथ रैली निकालेंगे। मोदी सरकार इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई और उसने इस रैली को रुकवाने की गुहार लगाई लेकिन अदालत ने साफ़ शब्दों में कहा है कि गणतंत्र दिवस के दौरान किसे दिल्ली में आने की इजाज़त दी जाएगी, यह सुरक्षा व्यवस्था का मामला है और पुलिस को यह फ़ैसला करना चाहिए। इस तरह इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की सरकार की आशा, निराशा में बदल गई। सरकार ने अदालत से अपील की थी कि वह गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली, ट्रॉली रैली, गाड़ियों के मार्च या किसी और तरीक़े से दिल्ली आने पर रोक लगाने का आदेश दे। वहीं किसान नेता राकेश टिकैत का कहना है कि वह आंदोलनकारी किसान भारतीय हैं इन्हें 26 जनवरी को तिरंगा लेकर देश के गणतंत्र दिवस में भाग लेने का अधिकारी है। इस बीच सरकार ने कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसानों का आंदोलन शुरू होते ही इसके ख़िलाफ़ तरह तरह के हथकंडे अपनाए। कभी इसमें शामिल किसानों को आतंकी कहा गया, कभी इसे पाकिस्तान व कनाडा की फ़ंडिंग से चलने वाला कार्यक्रम बताया गया, गुजरात के उप मुख्यमंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि किसान आंदोलन को देशविरोधियों, आतंकियों, ख़ालिस्तानियों और माओवादियों का समर्थन हासिल है और हाल ही में इस आंदोलन से जुड़े दसियों लोगों को भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने नोटिस भेजा है जिस पर भाजपा की सहयोगी रहे अकाली दल ने कहा है कि केंद्र सरकार, किसानों को डराने की कोशिश कर रही है। अलबत्ता किसान आंदोलन से जुड़े नेताओं ने शुरू से ही बड़ी सतर्कता से काम किया है और सरकार को किसानों के बीच फूट डालने की अनुमति नहीं दी है। भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख गुरनाम सिंह चडूनी इस बारे में प्रतिक्रिया देते हुए कहते हैं।

इस पूरे मामले में कुछ मीडिया चैनलों का रोल भी बड़ा ही नकारात्मक रहा है। इतने संवेदनशील मामले में सही रिपोर्टिंग करने और अन्नदाताओं की बात लोगों तक पहुंचाने के बजाए, कुछ मीडिया चैनल, सत्ता का साथ देते दिखाई दे रहे हैं। इन चैनलों ने शुरू में तो किसानों के आंदोलन को कवरेज ही नहीं दी और जब मामला अधिक गर्म हो गया तो इस आंदोलन की ओर से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश शुरू कर दी। इन चैनलों ने ग़ैर अहम और दूसरे व तीसरे दर्जे की ख़बरों को अधिक कवरेज दी। मिसाल के तौर पर बंगाल चुनाव और तृणमूल कांग्रेस के कुछ सदस्यों के पार्टी छोड़ने के मामले को जितनी कवरेज दी जा रही है, उतनी किसान आंदोलन को नहीं दी जा रही है। मीडिया की इस भूमिका के बारे में वरिष्ठ पत्रकार बिराज स्वैन कहती हैं। वहीं वरिष्ठ पत्रकार गौरव लाहिरी कहते हैं कि इस मामले को मीडिया में जितनी कवरेज मिलनी चाहिए, उतनी नहीं मिल रही है। कुल मिलाकर दिल्ली की सीमाओं पर कड़ाके की ठंड में लगभग दो लाख किसान, कृषि क़ानूनों की वापसी की मांग को लेकर दो महीने से आंदोलन पर बैठे हुए हैं और इस दौरान दर्जनों किसानों की मौत हो चुकी है। अब तक किसानों ने बहुत अधिक संयम का प्रदर्शन किया है लेकिन यह स्थिति हमेशा नहीं रहेगी। सरकार को चाहिए कि हालात अनियंत्रित होने से पहले ही बुद्धिमत्ता से काम लेते हुए किसानों की मांगों को स्वीकार कर ले क्योंकि वह शुरू से ही यह कह रही है कि ये क़ानून किसानों के हित में है लेकिन जब किसान ही इन क़ानूनों को नहीं चाहते तो उसे इन क़ानूनों पर इतनी ज़िद नहीं करनी चाहिए।

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