Jan २६, २०२१ ०८:०५ Asia/Kolkata
  • गणतंत्र दिवस पर भी नज़र आया सरकार का मुस्लिम विरोधी नज़रिया, कारगिल की धार्मिक धरोहरों को किया नज़रअंदाज़, मुसलमानों में रोष...

भारत के 72वें गणतंत्र दिवस की परेड में केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख़ की पहली झांकी दिखाए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।

प्रदेश में कारगिल ज़िले के नेताओं ने स्थानीय प्रशासन पर ‘पक्षपात करने’ और ‘झांकी में उनके धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों’ को नज़रअंदाज करने का आरोप लगाया है।

लद्दाख में बौद्धबहुल्य ज़िला लेह है जबकि मुस्लिम बाहुल्य ज़िला कारगिल है।

कारगिल ज़िले के नेतृत्व ने आरोप लगाया है कि प्रशासन ने झांकी में उनके क्षेत्र की धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को नज़रअंदाज किया है।

नेताओं ने शिकायत करते हुए कहा कि उन्हें इस बात से समस्या नहीं है कि बौद्ध बहुल्य लेह ज़िले के धरोहरों को दर्शाया गया है, बल्कि उन्हें इस बात की तकलीफ है कि कारगिल के प्रतीतों को नज़रअंदाज किया गया है।

लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के मुख्य कार्यकारी काउंसलर फ़िरोज़ अहमद ख़ान ने लद्दाख के उप-राज्यपाल आरके माथुर को पत्र लिखकर ज़िले की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत की अनदेखी पर अपनी पीड़ा व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस जैसे प्रमुख दिन ऐसा करना कारगिल के लोगों को अलग-थलग करना है।

ख़ान ने अपने पत्र द्वारा सरकार से अपील की है कि झांकी में कारगिल ज़िले की धरोहरों को भी शामिल किया जाए।

ज्ञात रहे कि लद्दाख की झांकी में तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग संप्रदाय से जुड़े थिकसे मठ को प्रमुखता से दिखाया गया है। यह लेह ज़िले के थिकसे में एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है।

राजनीतिक एवं प्रशासनिक मामलों को लेकर लेह और कारगिल ज़िले हमेशा एक दूसरे के आमने-सामने रहे हैं। 1979 में कारगिल ज़िला बना था। (AK)

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