May ११, २०२१ १८:११ Asia/Kolkata
  • सीरीज़ : ये रिश्ता क्या कहलाता है..!!

तहरीर : भारत और इस्राइल की दोस्ती.. (पार्ट 1) लेखक : सय्यद इब्राहीम हुसैन (दानिश हुसैनी)

अब ये कौन जानता था कि सैकड़ों हज़ारों साल की मुसीबत और ग़ुलामी की ज़ंजीरों से लगभग एक ही समय और एक ही साथ आज़ाद हो रही दो अलग क़ौमें किसी दिन एक ही साथ मिलकर उनपर एहसान करने वालों उनको मुहब्बत देने वालों, मुसीबत में उनका बचाव करने वालों और उनकी भटकती ठोकर खाती ज़िंदगी को पनाह देनें वालों की ही शामत बुला देंगीं!

 

वैसे अब इस बात से क्या फ़र्क़ पड़ता है कि इसे एहसान फ़रामोशी कहा जाए या फिर उससे भी कुछ ज़्यादा ग़लत क्यूंकि अब ये हो रहा है और खुलेआम हो रहा है , दिखा दिखा कर हो रहा है जता जता कर हो रहा है और न सिर्फ़ ऐसा ग़लत कार्य धर्म को बदनामी दिलाने के साथ ही धर्म सेवा के नाम पर अच्छा समझ कर किया और करवाया जा रहा है बल्कि इसके विरुध्द बोलने वालों को सज़ाएं यातनाएं भी दी जा रही हैं!

जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ ख़ुद के मज़लूम होने का दावा करने वालीं दो अलग अलग क़ौमों यहूदी और हिंदू क़ौम के बारे में कि जिनके इरादों और विचारों में अब भूतकाल के भूत ने जन्म ले लिया है और अब इन दोनों क़ौमों ने अपने पुरखों के आंसुओं का बदला लेने का पक्का इरादा कर लिया है!

 

वैसे मैं अपनी इस सीरीज़ में उनके भूतकाल के भूत के बारे में बाद में बात करूँगा लेकिन फ़िलहाल अपने क़लम को आज से कुछ दहाई पहले ले चलते हुए इस सीरीज़ को शुरुआत से शुरू करता हूँ!

 

बात है सन् 1947 और 1949 की जब जवाहर लाल नेहरु की नेतृत्व वाली सरकार ने ब्रटिश सरकार के अरब मुसलमानों के सिर थोपे हुए नाजाएज़ इस्राइल को राष्ट्र मानने से लगातार दो बार इनकार करते हुए उसके विरुध्द वोटिंग की!

 

और फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु का रवैय्या ठीक हिन्दुस्तान और पकिस्तान के बंटवारे की तरह से ही गाँधी की मौजूदगी तक ही एक सा रहा और महात्मा के जाते ही प्रधानमंत्री नेहरु ने सन् 1950 में ना सिर्फ़ एक नाजएज़ राष्ट्र को स्वीकृति और 1951 में मुंबई में इस्राइली काउंसिल को जगह दी बल्कि 1953 में काउंसिल को काउन्सिलेट के तौर पर अपग्रेड भी कर दिया!

 

जबकि ध्यान रहे कि मिस्टर नेहरु उन्हीं महत्मा गाँधी की वजह से एक आज़ाद देश के प्रधानमंत्री थे कि जिन्होंने इसी इस्राइल पर दुसरे विश्व युध्द में हुए ज़ुल्म में उनसे सहानूभूति भी जताई थी और फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर इस्राइल की जमकर आलोचना भी की थी और हमेशा फ़िलिस्तीन का समर्थन करते रहे थे!

 

फ़िलिस्तीन के सिलसिले में महात्मा उस समय के एक प्रकाशनीय 'हरिजन' में लिखते हैं कि “अपने देश के लिए यहूदियों का विलाप मुझे प्रभावित नहीं करता है क्योंकि फिलिस्तीन और अरब का ताल्लुक वैसा ही है, जैसा इंग्लैंड का इंग्लिश और फ्रांस का फ्रैंच से...इसलिए यहूदियों को अरबों पर थोपना गलत और अमानवीय है”

 

बल्कि महात्मा सिर्फ़ यहीं नहीं रुके और उन्होंने इसी कड़ी में आगे भी लिखा कि “बाइबिल की अवधारणा वाला फिलिस्तीन भौगोलिक रूप से अलग है. वो उनके दिलों में है...इसलिए ब्रिटिश बंदूक के साथ वहां प्रवेश करना ग़लत है और एक धार्मिक कृत्य को हथियारों के आधार पर नहीं किया जा सकता”

 

अब ये अलग बात है कि गांधी की मानता ही कौन है और अगर इतनी ही मान होती तो बंटवारा ही क्यूँ होता या फिर आज एन आर सी से मुसलमानों को बाहर ही क्यूँ रखा जाता और जेल रह चुकी गोडसे को सम्मान देने वाली एक फ़र्ज़ी साध्वी को संसद में जगह ही क्यूँ दी जाती?

 

खैर इसके बाद 1956 में इस्राइल के विदेश मंत्री’ स्वेज़ नहर के मामले में पहली बार भारत आए और फिर 1962 के चीन युध्द में प्रधानमंत्री नेहरु ने इस्राइल के प्रधानमंत्री बेन गुरियान को मदद के लिए पत्र लिखा जिसके जवाब में बेन गुरियान ने हथियार से भरा जहाज़ रवाना किया!

 

वैसे अब ये बात भी सोचने वाली है इस्राइल और भारत तो एक ही समय में आज़ाद हुए बने तो फिर भला जब भारत जैसे अधिक संसाधन और जनता वाले देश में हथियार नहीं थे तो फिर भला उस वक़्त के  छोटे से क्षेत्रफल और छोटी सी आबादी और सीमित संसाधनों वाले इस्राईल के पास इतनी पर्याप्त मात्रा में हथियार कैसे कहाँ से आए थे और क्यूँ थे?

 

लेकिन बहरहाल मदद हुई और ये मदद सिर्फ़ चीन युद्ध ही नहीं बल्कि 1971 के पकिस्तान के विरुध्द युध्द में भी जमकर की गयी जबकि रिश्ते अब भी सार्वजनिक नहीं थे!

 

इसके बाद 1968 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रिसर्च एंड एनालाईसिस विंग (रॉ) की नींव रखी तो उन्होंने उस वक़्त के रॉ चीफ़ “आर एन काव” को इस्राईली ख़ुफ़िया एजेंसी मुसाद की मदद लेने को कहा था!

जबकि भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के उस समय के फ़िलिस्तीन की आज़ादी के नेता पैलेस्टाइन लिब्रेशन फ्रंट के चेयरमैन यासिर अराफ़ात से संबंध इतने अच्छे थे कि अरफ़ात इंदिरा को मुस्लिम वोटर्स के वोट दिलाने की ख़ातिर भारत में रैलियाँ करने को भी तैयार रहते थे!

खैर फिर आख़िरकार 1992 में भारत ने इस्राइल से अपने सम्बन्ध सार्वजनिक किये और पी वी नरसिंहा राव की अगुवाई वाली सरकार ने इस्राईल से खुले तौर पर ऐसे राजनैतिक सम्बन्ध बनाए कि उसके बाद भारत इस्राईली हथियारों के निर्यात का सबसे बड़ा बाज़ार बन गया!

 

वैसे सैकड़ों हज़ारों साल की ज़ंजीरों से आज़ाद हुईं दो अलग अलग क़ौमों का एक साथ आकर अपने दुश्मन से बदला लेने की तय्यारियों और कोशिशों की ये कहानी इतनी सादी भी नहीं है कि इसी तहरीर समेटा जा सके इसीलिए मैं इस रिश्ते के कुछ अनछुए पहलु अगली तहरीर में बयान करने की कोशिश करूँगा!

 

अलबत्ता गुमनामी और दोयम दर्जे के टैग के तीर का शिकार मुझ जैसे हर इंसान के डरे सहमे से हुए सवाल अब भी अधूरे हैं कि आख़िर एक लोकतान्त्रिक देश का किसी तानाशाही या क्रूर प्रणाली और असंविधानिक तंत्र का साथ देना उसकी मदद करना किस तरह से जायज़ है?

 

आख़िर संविधान की गद्दी पर बैठा एक ज़िम्मेदार इंसान कैसे बेगुनाहों को क़त्ल करने उनकी संपत्तियों को नाजएज़ तरह से क़ब्ज़ा करने वाले इंसानियत के दुशमन को सपोर्ट कर सकता है?

और वो भी तब जबकि संप्रुभता के सम्मान का वचन देने वाला वो व्यक्ति अपना रोल मॉडल गाँधी जैसे निष्पक्ष महात्मा को मानता हो?

 

वैसे सवाल तो ये भी है कि अगर वो व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से ऐसा कर भी रहा है तो भला उसे एक पूरे तंत्र की सहायता क्यूँ और कैसे प्राप्त है?

 

भला भूतकाल का बदला लेने की बात करने वालों खून की नदियाँ बहाने की वकालत करने वालों को एक लोकतान्त्रिक ताने बाने में सहायता कैसे प्राप्त है?

 

क्या लोकतान्त्रिक और राजशाही ताने बाने में कोई अंतर नहीं है?

 

आख़िर किस बात का बदला लेने की बात हो रही है? आख़िर कौन है वो असली दुश्मन?

 

क्या इन सभी का इशारा मुस्लिम समुदाय की तरफ़ नहीं है?

 

अगर है तो आख़िर मुसलमानों ने यहूदी और हिन्दू समाज के साथ ऐसा क्या ग़लत कर दिया है?

क्या इस्लाम 2200 साल पहले मौजूद था कि उसने ही यहूदियों को येरुशलम से बाहर किया?

 

क्या पचहत्तर लाख यहूदी जानें मुसलमानों ने ली हैं?

 

क्या मुग़ल साम्राज्य में हिन्दू समाज पर अत्याचार होते थे?

 

क्या मुग़लों ने हिन्दू बिरादरी को बंधक बना कर रखा हुआ था?

 

क्या हिन्दू समाज को मुसलमानों से भी ज़्यादा किसी और धर्म ने प्यार और सम्मान दिया है?

 

आख़िर ऐसा हुआ क्या है?

 

आख़िर भारत और इस्राइल की इस गहरी दोस्ती का राज़ क्या है?

 

क्या इस्राइल का भारत की आज़ादी में कोई किरदार रहा है?

क्या इस दोस्ती की असली वजह मुसलमानों को नीचा दिखाना नहीं है?

 

क्या इस दोस्ती का इरादा मुसलमानों की हालत फ़िलिस्तीयों जैसी करना नहीं है?

 

अगर नहीं है तो भारत इस्राइल को किस काम में रोल मॉडल बनाता है?

 

अगर है तो क्या मुहम्मद अली जिन्ना सही नहीं थे?

 

अगर है तो क्या 22 करोड़ की आबादी को ठिकाने लगाना इतना आसान है?

 

अगर है तो फिर मुसलमानों का भविष्य क्या है?

 

क्या कश्मीर, गुजरात और दिल्ल्ली सिर्फ़ एक ट्रेलर था?

 

क्या बाबरी मस्जिद विध्वंस में लिप्त आरोपियों समेत कपिल मिश्रा जैसों को खुली छूट देने और बाबरी मस्जिद जैसा एक तरफ़ा फ़ैसला सुनाने और दुनिया की आँखों में धूल झोंकने वाले एक धूर्त तंत्र से इससे कम की उम्मीद की जा सकती है?

 

वो भी तब कि जब हिन्दू और यहूदी समाज की आपस में बड़ी बड़ी कांफ्रेंसें हो रही हों!

 

क्या इन सारे सवालों के जवाब हमें व्हाट्सेप और सोशल मीडिया यूनिवर्सिटी से मिल सकते हैं?

 

क्या इन सावालों के साथ ही सवाल करने वाले का गला घोटा नहीं जाएगा?

 

बल्कि सच तो ये है कि व्हाट्सेप यूनिवर्सिटी या फिर फ़र्ज़ीवाड़े को असलियत का चेहरा देते टीआरपी की आंच पर अपनी रोटियां सेंकते किसी भी तंत्र को ज्ञान का स्रोत बना लेना ना सिर्फ़ व्यक्तिगत रूप से हानिकारक है बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी कष्टदायक है!

 

वैसे मेरे रीडर्स को इधर उधर भटकने की ज़रूरत नहीं है क्यूंकि मैंने आप के साथ के सहारे साप्ताहिक या हर 15 दिन में इस सीरीज़ में एक अध्याय जोड़ने की ठानी है!

 

और अगर ज़िंदगी और सच बोलने पर त्योरियां चढ़ा लेने वालों ने मौक़ा दिया और मेरे लिए आपकी दुआएं बनी रहीं तो मेरी ये सीरीज़ इन सभी सवालों के जवाब देकर नफ़रती इरादों को उनकी क़ब्रों में दफ़न कर के जाएगी!

 

नोटः लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं, इनसे पार्स टुडे का सहमत होना ज़रूरी नहीं है।

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