Sep १८, २०२१ १९:३३ Asia/Kolkata
  • शंघाई सहयोग संगठन में ईरान की स्थाई सदस्यता, किसको कितना फ़ायदा? अमेरिका और पश्चिमी देशों की इस संगंठन को लेकर क्या है चिंता? अफ़ग़ान जनता को भी एससीओ से है आशा!

शंघाई सहयोग संगठन द्वारा इस्लामी गणतंत्र ईरान की पूर्ण और स्थाई सदस्यता पर मुहर लगाया जाना इस संगठन के द्वारा हालिया वर्षों में पारित किए जाने वाले प्रस्तावों में से यह सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव गिना जाएगा। इससे पहले शंघाई सहयोग संगठन ने भारत और पाकिस्तान की पूर्ण और स्थाई सदस्यता पर सहमति जताई थी।

शंघाई सहयोग संगठन में इस्लामी गणतंत्र ईरान की पूर्ण और स्थाई सदस्यता पर पूर्ण रूप से सहमति के बाद इस संगठन के सदस्य देशों के नेताओं द्वारा जिस गर्मजोशी के साथ ईरान का स्वागत किया गया और बधाई दी गई वह ईरान को क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्राप्त विशेषाधिकार और स्थिति को बयान करता है। साथ ही इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि शंघाई सहयोग संगठन में ईरान की पूर्ण और स्थाई सदस्यता इस संगठन की स्थिति को और मज़बूत करेगा। इससे पहले ईरान इस संगठन की बैठकों में पर्यवेक्षक सदस्य के रूप में भाग लेता रहा है। ताजिकिस्तान की राजधानी दोशंबे में शंघाई सहयोग संगठन के 21वें शिखर सम्मेलन में ईरान को पूर्ण और स्थाई सदस्यता पर मुहर लग गई। ईरान के शामिल होते ही अब इस संगठन के स्थाई सदस्यों की संख्या 9 हो गई है जो भूगोलिक तौर पर दुनिया के एक बड़े भाग को कवर करता है।

इस बारे में आज़रबाइजान में ईरान के पूर्व राजदूत और क्षेत्रीय मामलों के जानकार मोहसिन पाक आईन का मानना है कि शंघाई सहयोग संगठन का क्षेत्रीय देशों में ईरान जैसे आर्थिक रूप से समृद्ध और शाक्तिशाली देश, जो पूर्वी एशिया और पश्चिम एशिया के साथ-साथ उत्तर से दक्षिण के बीच सेतु के रूप में माना जाता है, को जोड़ना स्वयं इस संगठन की स्थिति को मज़बूत बनाता है। शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का गठन शुरू में सुरक्षा उद्देश्यों के लिए और इसकी चुनौतियों का समाधान करने के लिए किया गया था, जिसमें उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के शंघाई सीमा पर पहुंचने और चीन और रूस और पश्चिम के बीच बढ़ती क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के बारे में चिंताएं शामिल थीं, लेकिन धीरे-धीरे यह संगठन आर्थिक सहयोग के क्षेत्र में भी पूरी तरह सक्रिय हो गया। हालांकि अभी भी शंघाई संगठन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य और लक्ष्य अपने सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करना है, लेकिन पश्चिम की संवेदनशीलता को रोकने के लिए, इसने अभी तक औपचारिक रूप से सैन्य गतिविधियों को अंजाम नहीं दिया है। हालांकि, पश्चिम में कुछ वर्गों का यह अनुमान है कि एससीओ नाटो जैसे सैन्य परिसर के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

सुरक्षा मुद्दों और क्षेत्र में शांति और सुरक्षा स्थापित करने में मदद के लिए शंघाई के सदस्यों के सहयोग की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, 21वें शिखर सम्मेलन का फोकस अफ़ग़ानिस्तान का मुद्दा था और इसके विकास पर ध्यान देना था। आर्थिक समस्याओं को हल करने और अफ़ग़ानिस्तान की स्वतंत्रता और सुरक्षा को मज़बूत करने के साथ-साथ निर्माण परियोजनाओं को लागू करने में मदद करना शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के नेताओं के मुख्य विषय थे, जिन्हें अफ़ग़ानिस्तान के साथ क्षेत्रीय सहयोग और अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसियों को मज़बूत करने के लिए एक अच्छे मंच के रूप में देखा जाता है। हालांकि, यह संगठन अमेरिकी हस्तक्षेप के कारण अफ़ग़ानिस्तान में जारी राजनीतिक उथल-पुथल के कारण पैदा हुई असुरक्षा, अशांति और अराजकता के प्रभावों का मध्य एशिया पर पड़ने वाले असर के परिणामों को लेकर चिंतित है।

वरिष्ठ राजनीतिक टीकाकार अली असग़र ज़रगर इस संबंध में कहते हैं कि दो प्रमुख पूर्वी शक्तियों के नेतृत्व में शंघाई सहयोग संगठन, किसी तरह संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिम के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है जो अफ़ग़ानिस्तान सहित विभिन्न क्षेत्रों में दोनों पक्षों के बीच तनाव और चुनौतियों को हवा दे सकता है। वहीं अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान शासन को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा अभी तक मान्यता न दिए जाने के कारण शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में तालेबान को आमंत्रित नहीं किया जा सका। यह ऐसी स्थिति में है कि जब अफ़ग़ानिस्तान शंघाई सहयोग संगठन का पर्यवेक्षक सदस्य भी है और यह अफ़ग़ानिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण बनाता है। लेकिन सबसे पहले, तालेबान को एक समावेशी सरकार बनाने और अफ़ग़ान लोगों के नागरिक अधिकारों पर ध्यान देने की अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करना होगा ताकि क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का मार्ग प्रशस्त हो सके। दूसरे, शंघाई संगठन पर प्रभाव रखने वाले देशों को इस संगठन के प्लेटफ़ार्म का इस्तेमाल करके अफ़ग़ानिस्तान में अपने हितों को साधने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। तीसरे, हाल के वर्षों में इस देश को जो सबसे ज़्यादा और गंभीर नुक़सान पहुंचा है उसका मुख्य कारण अफ़ग़ानिस्तान में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और छद्म युद्धों को बढ़ावा दिया जाना है।

इसलिए, अफ़ग़ानिस्तान की जनता उम्मीद करती है कि शंघाई सहयोग संगठन सहित सभी क्षेत्रीय संगठन इस देश के जनहित में शांति, स्थिरता, सुरक्षा स्थापित करने और अफ़ग़ानिस्तान की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को हल करने में मदद करेंगे। ग़ौरतलब है कि शंधाई सहयोग संगठन एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है जिसकी स्थापना 15 जून सन 2001 में की गई थी। इसके गठन का उद्देश्य, क्षेत्र में अमरीका और नेटों के प्रभाव का मुक़ाबला करना है। जून सन 2017 को भारत और पाकिस्तान भी शंघाई सहयोग संगठन के आधिकारिक सदस्य चुने गए थे। ताजिकिस्तान की राजधानी दोशंबे में शंघाई सहयोग संगठन के 21वें शिखर सम्मेलन में ताजिकिस्तान, क़िरक़ीज़िस्तान, क़ज़ाक़िस्तान, तुर्कमनिस्तान, पाकिस्तान, उज़बेकिस्तान और बेलारूस के राष्ट्राध्यक्षों ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त रूस, चीन, भारत और मंगोलिया के राष्ट्राध्यक्षों ने इसमें आनलाइन हिस्सा लिया। (RZ)

 

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